बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 868, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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याज्ञवल्क्य मन एव सम्राडिति होवाच मनसा वै सम्राट् स्त्रियमभिहार्यते तस्यां प्रतिरूपः पुत्रो जायते स आनन्दो मनो वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं मनो जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते । हस्त्यृषभँ सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति । ६।
[ याज्ञवल्क्य — ] 'तुमसे किसी आचार्यने जो भी कहा है, वह हम सुनें।' [ जनक — ] 'मुझसे जबालाके पुत्र सत्यकामने कहा है कि मन ही ब्रह्म है।' [ याज्ञवल्क्य — ] 'जैसे मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् कहे, उसी प्रकार उस जबालाके पुत्रने 'मन ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है; क्योंकि मनोहीनको क्या लाभ हो सकता है ? किंतु क्या उसने तुम्हें उसके आयतन और प्रतिष्ठा बतलाये हैं?' [ जनक — ] 'मुझे नहीं बतलाये।' [ याज्ञवल्क्य — ] 'हे सम्राट् ! यह तो एक ही पादवाला ब्रह्म है।' [ जनक — ] 'हे याज्ञवल्क्य ! वह हमें आप बतलाइये।' [याज्ञवल्क्य — ] 'मन ही आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है, इसकी 'आनन्द इस रूपसे उपासना करे।' [ जनक — ] 'याज्ञवल्क्य ! आनन्दता क्या है ?' 'हे सम्राट् ! मन ही आनन्दता है' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे राजन् ! मनसे ही स्त्रीकी इच्छा करता है, उसमें अनुरूप पुत्र उत्पन्न होता है, वह आनन्द है ! हे सम्राट् ! मन ही परम ब्रह्म है। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, उसे मन नहीं त्यागता, सब भूत उसका उपकार करते हैं तथा वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है।' 'मैं आपको हाथीके समान हृष्ट-पुष्ट बैल उत्पन्न करनेवाली एक हजार गौएँ देता हूँ' ऐसा विदेहराज जनकने कहा। उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरे पिताका विचार था कि शिष्य को उपदेशके द्वारा कृतार्थ किये बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये' ॥ ६ ॥