बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 872, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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मार्गको जानेवाला पुरुष सम्यक् प्रकारसे रथ या नौकाका आश्रय ले, उसी प्रकार तू इन उपनिषदों (उपासनाओं) से युक्त प्राणादि ब्रह्मोंकी उपासना कर समाहितचित्त हो गया है। इस प्रकार तू पूज्य, श्रीमान्, अधीतवेद और उक्तोपनिषत्क (जिसे आचार्यने उपनिषद्का उपदेश कर दिया है—ऐसा) हो गया है। इतना होनेपर भी तू इस शरीरसे छूटकर कहाँ जायगा?' [जनक—] 'भगवन्! मैं कहाँ जाऊँगा, सो मुझे मालूम नहीं है।' [याज्ञवल्क्य—] 'अब मैं तुझे यही बतलाऊँगा—जहाँ तू जायगा।' [जनक—] 'भगवान् मुझे बतलावें' ॥ १ ॥
| जनको ह वैदेहः । यस्मात् सविशेषणानि सर्वाणि ब्रह्माणि जानाति याज्ञवल्क्यः, तस्मादाचार्यकत्वं हित्वा जनकः कूर्चादासनविशेषादुत्थाय उप समीपमवसपन् पादयोर्निपतन्नित्यर्थः, उवाचोक्तवान्—नमस्ते तुभ्यमस्तु हे याज्ञवल्क्य; अनु मा शाध्यनुशाधि मामित्यर्थः; इतिशब्दो वाक्यपरिसमाप्त्यर्थः ।<br><br>स होवाच याज्ञवल्क्यः—यथा वै लोके हे सम्राट् महान्तं दीर्घमध्वानमेष्यन् गमिष्यन्, रथं वा स्थलेन गमिष्यन्, नावं वा जलेन गमिष्यन् समाददीत—एवमेवैतानि ब्रह्मण्येताभिरुपनिषद्भिर्युक्तानि उपासीनः समाहितात्मा- | 'जनको ह वैदेहः' । चूँकि याज्ञवल्क्य विशेषणोंके सहित सम्पूर्ण ब्रह्मोंको जानता है, इसलिये जनक आचार्यकत्व (ज्ञानित्वाभिमान) को छोड़कर कूर्च-आसनविशेषसे उठकर उसके समीप जा अर्थात् चरणोंमें गिरकर बोला, 'हे याज्ञवल्क्य ! तुम्हें नमस्कार है; 'अनु मा शाधि' अर्थात् मेरा अनुशासन करो। [शाधीति इसमें] 'इति' शब्द वाक्यकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है।<br><br>उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे सम्राट्! लोकमें जिस प्रकार महान् यानी लंबे मार्गको जानेवाला पुरुष स्थलसे जानेपर रथ और जलसे जानेपर नौकाका आश्रय ले, उसी प्रकार तू इन उपनिषदों—उपासनाओंसे युक्त इन ब्रह्मोंकी उपासना करके समाहितचित्त हो |