भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 873, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 873
ब्राह्मण २ ]शाङ्करभाष्यार्थ८५९
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
सि, अत्यन्तमेताभिरुपनिषद्भिः संयुक्तात्मासि; न केवलमुपनिषत्समाहितः, एवं वृन्दारकः पूज्यश्चाढयश्चेश्वरश्च न दरिद्र इत्यर्थः; अधीतवेदोऽधीतो वेदो येन स त्वमधीतवेदः, उक्ताश्चोपनिषद आचार्यैस्तुभ्यं स त्वमुक्तोपनिषत्कः।गया है, अर्थात् इन उपासनाओंसे अत्यन्त संयुक्तचित्त हो गया है; केवल उपनिषदों (उपासनाओं) से समाहित (संयुक्त) ही नहीं है, इसी प्रकार वृन्दारक—पूज्य और आढ्य अर्थात् श्रीमान् भी है, भाव यह कि दरिद्र नहीं है; तथा तू अधीतवेद—जिसने वेदाध्ययन कर लिया है, ऐसा अधीतवेद है और उक्तोपनिषत्क—जिसे आचार्योंने उपनिषदोंका उपदेश कर दिया है, ऐसा तू उक्तोपनिषत्क है।
एवं सर्वविभूतिसम्पन्नोऽपि सन् भयमध्यस्थ एव परमात्मज्ञानेन विनाकृतार्थ एव तावदित्यर्थः, यावत् परं ब्रह्म न वेत्सि। इतोऽस्माद्देहाद् विमुच्यमान एताभिर्नौरथस्थानीयाभिः समाहितः क्व कस्मिन् गमिष्यसि, किं वस्तु प्राप्स्यसीति ?'इस प्रकार सम्पूर्ण विभूतियोंसे सम्पन्न होनेपर भी परमात्माका बोध हुए बिना तू भयके मध्यमें ही स्थित है अर्थात् तबतक तो तू अकृतार्थ ही है, जबतक कि परब्रह्मको नहीं जानता। तू यहाँसे—इस देहसे छूटकर इन नौका और रथस्थानीय उपासनाओंसे समाहित होकर कहाँ जायगा ? किस वस्तुको प्राप्त करेगा ?'
नाहं तद् वस्तु भगवन् पूज्यावन् वेद जाने यत्र गमिष्यामीति।[जनक—] 'हे भगवन्! हे पूज्य ! मैं उस वस्तुको नहीं जानता, जहाँ कि मैं [देह छोड़नेपर] जाऊँगा।'
अथ यद्येवं न जानीषे यत्र गतः कृतार्थः स्याः, अहं वै ते तुभ्यं तद् वक्ष्यामि यत्र गमिष्यसीति।[ याज्ञवल्क्य—] 'अच्छा, यदि तू यह नहीं जानता कि कहाँ जानेपर तू कृतार्थ होगा तो मैं तुझे वह स्थान बतलाऊँगा जहाँ तू जायगा।'