भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 874, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 874
८६०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

| ब्रवीतु भगवानिति, यदि प्रसन्नो मां प्रति। <br><br> शृणु—॥ १ ॥ | [जनक—] 'यदि मुझपर प्रसन्न हैं तो भगवान् मुझे उसका उपदेश करें।' <br><br> [याज्ञवल्क्य—] 'सुन'—॥ १ ॥ |


दक्षिणनेत्रस्थ इन्द्रसंज्ञक पुरुषका परिचय

इन्धो ह वै नामैष योऽयं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषस्तं वा एतमिन्धं सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते परोक्षेणैव परोक्षप्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विषः ॥ २ ॥

यह जो दक्षिण नेत्रमें पुरुष है, इन्ध नामवाला है, उसी इस पुरुषको इन्ध होते हुए भी परोक्षरूपसे इन्द्र कहते हैं, क्योंकि देवगण मानो परोक्षप्रिय हैं, प्रत्यक्षसे द्वेष करनेवाले हैं ॥ २ ॥

| इन्धो ह वै नाम—इन्ध इत्येवंनामा, यश्चक्षुर्वै ब्रह्मेति पुरोक्त आदित्यान्तर्गतः पुरुषः स एषः, योऽयं दक्षिणेऽक्षन् अक्षणि विशेषेण व्यवस्थितः—स च सत्यनामा; तं वै एतं पुरुषं दीप्तिगुणत्वात् प्रत्यक्षं नाम अस्येन्ध इति, तमिन्धं सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते परोक्षेण; यस्मात् परोक्षप्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विषः प्रत्यक्षनामग्रहणं द्विषन्ति । एष त्वं वैश्वानरमात्मानं सम्पन्नोऽसि ॥ २ ॥ | 'इन्धो ह वै नाम'—'इन्ध' ऐसे नामवाला है, 'चक्षु ही ब्रह्म है' इस प्रकार जिस आदित्यान्तर्गत पुरुषका पहले वर्णन किया गया है, वह यह है जो कि विशेषरूपसे दक्षिण नेत्रमें स्थित है; वह सत्य नामवाला है; दीप्ति गुणवाला होनेसे इसका 'इन्ध' यह प्रत्यक्ष नाम है, उस इस पुरुषको, इन्ध होते हुए भी, परोक्षरूपसे 'इन्द्र' ऐसा कहते हैं; क्योंकि देवगण मानो परोक्षप्रिय हैं, प्रत्यक्षद्वेषी हैं—प्रत्यक्ष नामग्रहणसे द्वेष करते हैं। यह तू वैश्वानर आत्माको प्राप्त हो गया है ॥ २ ॥ |

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