बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 875, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ८६१
वामनेत्रस्थ इन्द्रपत्नी तथा विराटका परिचय और उन दोनोंके संस्ताव, अन्न, प्रावरण एवं मार्गादिका वर्णन
अथैतत् वामेऽक्षणि पुरुषरूपमेषास्य पत्नी विराट् तयोरेष सँस्तावो य एषोऽन्तर्हृदय आकाशोऽथैनयोरेतदन्नं य एषोऽन्तर्हृदये लोहितपिण्डोऽथैतयोरेतत् प्रावरणं यदेतदन्तर्हृदये जालकमिवाथैनयोरेषा सृतिः सञ्चरणी यैषा हृदयादूर्ध्वा नाड्युच्चरति यथा केशः सहस्रधा भिन्न एवमस्यैता हिता नाम नाड्योऽन्तर्हृदये प्रतिष्ठिता भवन्त्येताभिर्वा एतदास्रवदास्रवति तस्मादेष प्रविविक्ताहारतर इवैव भवत्यस्माच्छारीरादात्मनः ॥ ३ ॥
और यह जो बायें नेत्रमें पुरुषरूप है, वह इस (इन्द्र) की पत्नी विराट् (अन्न) है; उन दोनोंका यह संस्ताव (मिलनका स्थान) है जो कि यह हृदयान्तर्गत आकाश है। उन दोनोंका यह अन्न है जो कि यह हृदयान्तर्गत लाल पिण्ड है। उन दोनोंका यह प्रावरण है जो कि यह हृदयान्तर्गत जाल-सा है। उन दोनोंका यह मार्ग—संचार करनेका द्वार है जो कि यह हृदयसे ऊपरकी ओर नाड़ी जाती है। जिस प्रकार सहस्र भागोंमें विभक्त हुआ केश होता है, वैसी ही ये हिता नामकी नाड़ियां हृदयके भीतर स्थित हैं। इन्हींके द्वारा जाता हुआ यह अन्न [शरीरमें] जाता है; इसीसे इस (स्थूल शरीराभिमानी वैश्वानर) से यह (सूक्ष्मदेहाभिमानी तैजस) सूक्ष्मतर आहार ग्रहण करनेवाला ही होता है ॥ ३ ॥
| अथैतद् वामेऽक्षणि पुरुषरूपम्, एषास्य पत्नी—यं त्वं वैश्वानरमात्मानं सम्पन्नोऽसि तस्यास्येन्द्रस्य भोक्तुर्भोग्यैषा पत्नी विराडन्नं | और यह जो वाम नेत्रमें पुरुषरूप है, वह इसकी पत्नी है—तुम जिस वैश्वानर आत्माको सम्पन्न हुए हो, उस इस भोक्ता इन्द्रकी यह भोग्यरूपा पत्नी है, भोग्यभूहोनेके |
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