बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 899, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ८८५
| न शाकद्वीपादिगतमदृष्टरूपम्; ततश्चैतत् सिद्धं भवति—यः स्वप्ने पश्यति दृष्टपूर्वं वस्तु, स एव पूर्वं विद्यमाने चक्षुष्यद्राक्षीत्, न देह इति; देहश्चेद् द्रष्टा, स येनाद्राक्षीत् तस्मिन्नुद्घृते चक्षुषि स्वप्ने तदेव दृष्टपूर्वं न पश्येत्; अस्ति च लोके प्रसिद्धिः—पूर्वं दृष्टं मया हिमवतः शृङ्गमद्याहं स्वप्नेऽद्राक्षमित्युद्घृतचक्षुषामन्धानामपि; तस्मादनुद्घृतेऽपि चक्षुषि यः स्वप्नदृक् स एव द्रष्टा, न देह इत्यवगम्यते । | को ही देखता है, जिन्हें पहले कभी नहीं देखा, उन शाकद्वीपादिके पदार्थोंको नहीं देखता; इससे यह सिद्ध होता है कि स्वप्नमें जो पहले देखे हुए पदार्थोंको देखता है, उसीने पहले नेत्रोंके रहते हुए उन पदार्थोंको देखा था, देहने नहीं; यदि देह ही देखनेवाला होता तो जिनके द्वारा उसने पहले देखा था उन नेत्रोंके निकाल लिये जानेपर उन पूर्वदृष्ट पदार्थोंको स्वप्नमें न देखता; किंतु जिनके नेत्र निकाल लिये गये हैं, उन अन्धोंके विषयमें भी लोकमें ऐसी प्रसिद्धि है कि आज स्वप्नमें मैंने पहले देखा हुआ हिमालयका शिखर देखा । इससे यह ज्ञात होता है कि जो स्वप्न देखनेवाला है, वही नेत्रोंके न निकालनेपर भी द्रष्टा है, देह द्रष्टा नहीं है । | | तथा स्मृतौ—द्रष्टृस्मर्त्रोरेकत्वे <br>(द्रष्टुर्देहेन्द्रियादि-व्यतिरिक्तत्वम्) सति य एव द्रष्टा स एव स्मर्ता; यदा चैवं तदा निमीलिताक्षोऽपि स्मरन् दृष्टपूर्वं यद् रूपं तद् दृष्टवदेव पश्यतीति; तस्माद् यन्निमीलितं तन्न द्रष्टृ; यन्निमीलिते चक्षुषि | इसी प्रकार स्मरणमें समझना चाहिये·द्रष्टा और स्मरण करनेवालेकी एकता होनेपर जो द्रष्टा होता है, वही स्मरण करनेवाला होता है । जब कि ऐसी बात है तभी आँख मूँदकर स्मरण करनेवाला भी जो पहले देखा हुआ रूप है, उसे देखे हुएके समान ही देखता है; अतः जिन्हें मूँद रखा है, वे नेत्र द्रष्टा नहीं |