भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 898, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 898
८८४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
संस्कृत (भाष्य)हिन्दी-अनुवाद
दृश्यमाने कारणान्तरमनुमेयम्; अनुमेयत्वे च केनचित् सामान्यात् सर्वं सर्वत्रानुमेयं स्यात्; तच्चानिष्टम्; न च पदार्थस्वभावो नास्ति; न ह्यग्नेरुष्णस्वाभाव्यम् अन्यनिमित्तम्, उदकस्य वा शैत्यम् । प्राणिधर्माधर्माद्यपेक्षमिति चेत्; धर्माधर्मादेर्निमित्तान्तरापेक्षस्वभावप्रसङ्गः । अस्त्विति चेत्, न; तदनवस्थाप्रसङ्गः; स चानिष्टः ।अप्रकाशकरूपसे देखनेमें किसी अन्य कारणका अनुमान नहीं करना चाहिये; यदि किसीसे समानता होनेके कारण उसके विषयमें भी अनुमान किया जाय तब तो सब जगह सबके विषयमें अनुमान ही करना होगा; और यह इष्ट नहीं है, क्योंकि पदार्थका कोई स्वभाव ही न हो—ऐसी बात नहीं है; अग्निका उष्णस्वभाव होना अथवा जलका शीतल होना किसी अन्य कारणसे नहीं है। यदि कहो कि स्वभाव भी प्राणियोंके धर्माधर्मकी अपेक्षासे होता है, तो धर्माधर्मादिका भी किसी अन्य निमित्तकी अपेक्षा रखनेवाला स्वभाव माननेका प्रसङ्ग होगा। यदि कहो कि होने दो, तो यह ठीक नहीं; क्योंकि इससे अनवस्थाका प्रसङ्ग होगा और वह इष्ट नहीं है।
[स्वभाववादिपक्षनिरसनम्]<br>न, स्वप्नस्मृत्योर्दृष्टस्यैव दर्शनात्—यदुक्तं स्वभाववादिना देहस्यैव दर्शनादिक्रिया न व्यतिरिच्यतेति, तन्न; यदि हि देहस्यैव दर्शनादिक्रिया स्वप्ने दृष्टस्यैव दर्शनं न स्यात्; अन्धः स्वप्नं पश्यन् दृष्टपूर्वमेव पश्यतिसिद्धान्ती—तुम्हारा कथन ठीक नहीं है, क्योंकि स्वप्न और स्मृतिमें देखे हुएका ही दर्शन होता है—स्वभाववादीने जो कहा कि दर्शनादि क्रिया देहके ही हैं, उससे भिन्नके नहीं हैं, सो ऐसी बात नहीं है; यदि दर्शनादि क्रिया देहकी ही होती तो स्वप्नमें देखे हुएको ही न देखा जाता। अन्धा पुरुष स्वप्न देखनेके समय पहले देखे हुए पदार्थों-