बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 897, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८८३
| संस्कृत-मूल (शाङ्करभाष्यम्) | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| हि भवानादित्यादिवद् व्यतिरिक्तं ज्योतिः साधयति कार्यकारणेभ्यः; न च प्रत्यक्षमनुमानेन बाधितुं शक्यते; अयमेव तु कार्यकारणसंघातः प्रत्यक्षं पश्यति शृणोति मनुते विजानाति च; यदि नाम ज्योतिरन्तरमस्योपकारकं स्यादादित्यादिवत्, न तदात्मा स्यात्, ज्योतिरन्तरम्, आदित्यादिवदेव; य एव तु प्रत्यक्षं दर्शनादिक्रियां करोति स एवात्मा स्यात् कार्यकारणसंघातः, नान्यः, प्रत्यक्षविरोधेऽनुमानस्याप्रामाण्यात् । | आदित्यादिके समान ज्योतिको देह और इन्द्रियोंसे भिन्न सिद्ध करते हैं; किंतु अनुमानके द्वारा प्रत्यक्षका बाध नहीं हो सकता; यह देहेन्द्रियसंघात ही तो प्रत्यक्ष देखता, सुनता, मनन करता और विशेषरूपसे जानता है; यदि आदित्यादिके समान इसका उपकार करनेवाली कोई अन्य ज्योति हो तो वह आत्मा नहीं हो सकती, अपितु आदित्यादिके समान ही कोई अन्य ज्योति होगी; जो भी प्रत्यक्ष दर्शनादि कर्म करता है, वह देहेन्द्रियसंघात ही आत्मा होना चाहिये, कोई दूसरा नहीं, क्योंकि प्रत्यक्षसे विरोध होनेपर अनुमानकी प्रामाणिकता नहीं हो सकती । |
| (यथोक्तयुक्तैरनैकान्तिकत्वम्)<br>नन्वयमेव चेद्दर्शनादिक्रियाकर्ता आत्मा संघातः कथमविकलस्यैवास्य दर्शनादिक्रियाकर्तृत्वं कदाचिद् भवति कदाचन्नेति । | **सिद्धान्ती—**किंतु यदि यह संघात ही दर्शनादि क्रियाओंका करनेवाला आत्मा हो तो ऐसा क्यों होता है कि इसमें कोई विकार न आनेपर भी कभी तो इसमें दर्शनादि क्रियाओंका कर्तृत्व रहता है और कभी नहीं रहता है ? |
| (तन्निरासपूर्वकं स्वभावस्य निनिमित्तत्वनिरूपणम्)<br>नैष दोषः, दृष्टत्वात्; न हि दृष्टेऽनुपपन्नं नाम, न हि खद्योते प्रकाशाप्रकाशकत्वेन | **पूर्व०—**यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि ऐसा देखा गया है और देखी हुई बातमें अनुपपत्ति नहीं होती; खद्योतको प्रकाशक और , |