भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 90, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 90
८४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| —सर्वदेवत्योऽहं प्रोक्ष्यमाण आलभ्यमानस्त्वहं मदेवत्य एव स्याम्, अन्य इतरे पशवो ग्राम्यारण्या यथादैवतमन्याभ्यो देवताभ्य आलभ्यन्ते मदवयवभूताभ्य एव—इति विद्यात्। अत एवेदानीं सर्वदेवत्यं प्रोक्षितं प्राजापत्यमालभन्ते याज्ञिकाः। | अश्व मानकर 'मैं वेदमन्त्रोंद्वारा अभिषिक्त होकर सर्वदेवसम्बन्धी होता हूँ, किंतु आलभन किये जानेपर केवल अपने ही देवताके लिये होऊँ; तथा दूसरे ग्राम्य और वन्य पशु, अन्यान्य देवताओंके अनुसार मेरे ही अवयवभूत विभिन्न देवोंके लिये आलभन किये जाते हैं—ऐसा जाने। इसीलिये आजकल याज्ञिकलोग समस्त देवताओंके लिये [ मन्त्रोंद्वारा ] अभिषिक्त किये हुए प्रजापतिसम्बन्धी पशुका आलभन करते हैं। | | 'एवमेष ह वा अश्वमेधो य एष तपति'—यस्त्वेवं पशुसाधनकः क्रतुः स एष साक्षात्फलभूतो निर्दिश्यत एष ह वा अश्वमेधः। कोऽसौ ? य एष सविता तपति जगदवभासयति तेजसा। तस्यास्य क्रतुफलात्मनः संवत्सरः कालविशेषः, आत्मा शरीरं तन्निर्वर्त्यत्वात्संवत्सरस्य । | 'एवमेष ह वा अश्वमेधो य एष तपति' इसकी व्याख्या की जाती है—इस प्रकार यह जो पशुद्वारा साध्य क्रतु है वही 'एष ह वा अश्वमेधः' इस वाक्यसे साक्षात् फलरूपसे बतलाया जाता है। वह कौन-सा है ? जो कि सूर्य तपता अर्थात् अपने तेजसे जगत्‌को प्रकाशित करता है। उस इस यज्ञफलरूप सूर्यका संवत्सर—काल-विशेष आत्मा यानी शरीर है, क्योंकि उसीके द्वारा संवत्सर निष्पन्न होता है।^१ | | तस्यैव क्रत्वात्मनः, अग्नि- | उस यज्ञात्माका साधनभूत यह |


१ क्योंकि सूर्यके उदयास्तसे दिन-रातके द्वारा संवत्सर होता है। यहाँतक अश्वमेधकी सूर्यरूपता बतलाकर अब उसके साधनभूत अग्निका सूर्यत्व बतलाया जाता है।