बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 91, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 91
ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ८५
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| साध्यत्वाच्च फलस्य क्रतुत्वरूपेणैव निर्देशः, अयं पार्थिवोऽग्निरर्कः साधनभूतः। तस्य चार्कस्य क्रतौ चित्यस्येमे लोकास्त्रयोऽप्यात्मानः शरीरावयवाः। तथा च व्याख्यातं 'तस्य प्राची दिक्' इत्यादिना। तावग्न्यादित्यावेतौ यथाविशेषितावर्काश्वमेधौ क्रतुफले। अर्को यः पार्थिवोऽग्निः स साक्षात्क्रतुरूपः क्रियात्मकः। क्रतोरग्निसाध्यत्वात्तद्रूपेणैव निर्देशः। क्रतुसाध्यत्वाच्च फलस्य क्रतुरूपेणैव निर्देश आदित्योऽश्वमेध इति। | पार्थिव अग्नि अर्क है; यज्ञफल अग्निसाध्य है, इसलिये उसका यज्ञरूपसे निर्देश किया गया है। यज्ञमें चयन किये जानेवाले उस अर्कके तीनों लोक आत्मा-शरीरके अवयव हैं। इसीसे 'उसका पूर्वदिशा शिर है' इत्यादि वाक्यसे उसकी व्याख्या की गयी है। वे ये अग्नि और आदित्य ऊपर दिये हुए विशेषणके अनुसार अर्क और अश्वमेध क्रमशः यज्ञ और फल हैं। अर्क जो पार्थिव अग्नि है वह साक्षात् क्रियात्मक यज्ञरूप है। यज्ञ अग्निसाध्य है, इसलिये अग्निरूपसे ही उसका निर्देश किया जाता है। तथा फल यज्ञसाध्य है इसलिये 'आदित्य अश्वमेध है' इस प्रकार यज्ञरूपसे ही उसका निर्देश किया जाता है। |
| तौ साध्यसाधनौ क्रतुफलभूतावग्न्यादित्यौ, सा उ पुनर्भूय एकैव देवता भवति। का सा? मृत्युरेव। पूर्वमप्येकैवासीत्क्रियासाधनफलभेदाय विभक्ता। तथा चोक्तम् "स त्रेधात्मानं व्यकुरुत" (बृ० उ० १।२।३) इति। सा पुनरपि क्रियानिर्वृत्त्युत्तरकाल- | वे यज्ञ एवं फलभूत अग्नि और आदित्य साध्य और साधन हैं। वे भी आपसमें मिलकर पुनः-फिर भी एक ही देवता हैं। यह एक देव कौन है? वह मृत्यु है। पहले भी वह (मृत्युदेवता) एक ही था, क्रियाके साधन और फलभेदके लिये उसका विभाग हो गया। ऐसा ही कहा भी है—"उसने अपनेको तीन प्रकारसे विभक्त किया" इत्यादि। वह फिर भी अर्थात् क्रियानिष्पत्तिके |