बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 908, कुल 1402 में से
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| ८९४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| करणानि बुद्धेः; तस्मात्तेनैव विशेष्यते—विज्ञानमय इति । | तो बुद्धिकी द्वारमात्र हैं। इसलिये आत्माको उस (बुद्धि) के द्वारा ही विज्ञानमय इस प्रकार विशेषित किया जाता है। |
| [मयटो विकारार्थस्त्वनिराकरणम्]<br>येषां परमात्मविज्ञप्तिविकार इति व्याख्यानम्, तेषां 'विज्ञानमयः' 'मनोमयः' इत्यादौ विज्ञानमयशब्दस्य अन्यार्थदर्शनादश्रौतार्थतावसीयते; संदिग्धश्च पदार्थोऽन्यत्र निश्चितप्रयोगदर्शनान्निर्धारयितुं शक्यः; वाक्यशेषात्, निश्चितन्यायबलाद् वा; सधीरिति चोत्तरत्र पाठात्, 'हृद्यन्तः' इति वचनाद् युक्तं विज्ञानप्रायत्वमेव । | जिनके मतमें 'विज्ञानमय' शब्दकी व्याख्या 'परमात्माकी विज्ञप्तिका विकार' है, उनका यह अर्थ, 'विज्ञानमयः' 'मनोमयः' इत्यादि तैत्तिरीय श्रुतियोंमें विज्ञानमय शब्दका दूसरा अर्थ देखे जानेके कारण, श्रुतिविरुद्ध सिद्ध होता है।¹ जहाँ किसी पदके अर्थमें संदेह हो वहाँ अन्य स्थानमें निश्चित प्रयोग देखकर उसके अनुसार ही निश्चय किया जाता है; इसके सिवा वाक्यशेषसे अथवा निश्चित न्यायके बलसे भी उसका निश्चय हो सकता है।² तथा आगे 'सधीः' (बुद्धिके सहित) ऐसा पाठ है और 'हृद्यन्तः' ऐसा वचन भी है; इनसे भी उसका विज्ञानप्रायता—विज्ञानाधिक्य ही उचित है। |
| ['प्राणेषु' 'हृदि' इत्यादिप्रयोगानामभिप्रायः]<br>प्राणेष्विति व्यतिरेकप्रदर्शनार्था सप्तमी—यथा वृक्षेषु पाषाण इति | 'प्राणेषु' यह सप्तमी व्यतिरेक प्रदर्शित करनेके लिये है; जैसे 'वृक्षेषु पाषाणः' यहाँ |
१. तात्पर्य यह है कि इन तैत्तिरीय-श्रुतियोंमें मयट् प्रत्यय प्राचुर्य (प्रायः अथवा आधिक्य) अर्थमें ही हो सकता है, विकारार्थक नहीं हो सकता; इसलिये यदि यहाँ इसका अर्थ विकार किया जायगा तो इसका उन श्रुतियोंसे विरोध होगा; इसलिये यहाँ भी इसे प्राचुर्यार्थक ही समझना चाहिये।
२. क्योंकि यदि आत्मा विज्ञानका विकार होगा तो उसे मोक्ष नहीं मिल सकता।