भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 909, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 909

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९५


| सामीप्यलक्षणा; प्राणेषु हि व्यतिरेकाव्यतिरेकता संदिह्यत आत्मनः; प्राणेषु प्राणेभ्यो व्यतिरिक्त इत्यर्थः; यो हि येषु भवति, स तद्व्यतिरिक्तो भवत्येव—यथा पाषाणेषु वृक्षः । | सामीप्य अर्थको लक्षित करानेवाली सप्तमी है<sup></sup> प्राणोंमें ही आत्माकी भिन्नता या अभिन्नताके विषयमें संदेह होता है; अतः 'प्राणेषु' अर्थात् प्राणोंसे भिन्न है, क्योंकि जो जिनमें होता है, वह उनसे भिन्न होता ही है; जैसे पाषाणोंमें होनेवाला वृक्ष [ पाषाणोंसे भिन्न होता है ] । | | हृदि तन्नैतत् स्यात्; प्राणेषु प्राणजातीयैव बुद्धिः स्यादित्यत आह—हृद्यन्तरिति । हृच्छब्देन पुण्डरीकाकारो मांसपिण्डम्, तात्स्थ्याद् बुद्धिर्हृत्, तस्यां हृदि बुद्धौ; अन्तरिति बुद्धिवृत्तिव्यतिरेकप्रदर्शनार्थम्, ज्योतिरवभासात्मकत्वादात्मोच्यते; तेन ह्यवभासकेन आत्मना ज्योतिषा आस्ते पल्ययते कर्म कुरुते, चेतनावानिव ह्ययं कार्यकारणपिण्डः—यथा आदित्यप्रकाशस्थो घटः । | 'हृदि'—हृदयमें, वहां यह रहता है; प्राणोंमें प्राणजातिकी ही बुद्धि रहेगी, इसलिये श्रुति कहती है—'हृद्यन्तः' । यहाँ 'हृत्' शब्दसे पुण्डरीकाकार मांसपिण्ड कहा गया है, उसमें रहनेके कारण बुद्धि हृत् है, उस हृत्में अर्थात् बुद्धिमें; 'अन्तः यह बुद्धिवृत्तिसे उसकी भिन्नता प्रदर्शित करनेके लिये है, प्रकाशस्वरूप होनेके कारण आत्मा 'ज्योतिः' कहा गया है; उस प्रकाशस्वरूप आत्मज्योतिसे चेतनावान्-सा होकर ही यह देहेन्द्रियसंघात सूर्यके प्रकाशमें स्थित घटके समान रहता, इधर उधर जाता और कर्म करता है । | | यथा वा मरकतादिर्मणिः क्षीरादिद्रव्ये प्रक्षिप्तः परीक्षणाय, आत्मच्छायमेव तत् क्षीरादिद्रव्यं | अथवा जिस प्रकार परीक्षाके लिये दुग्धादि द्रव्यमें डाली हुई मरकतादि मणि उस दुग्धादि द्रव्यको अपनी ही |


१ अतः 'वृक्षेषु पाषाणः' का अर्थ होता है—वृक्षके निकट पत्थर है ।