बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 911, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ८९७
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| “यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः । क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत।।” (१३।३३) “यदादित्यगतं तेजः” (१५।१२) इत्यादि च । “नित्योऽनित्यानां चेतनश्चेतनानाम्” (२।२।१४) इति च काठके । “तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति” (क० उ० २।२।१६) इति च । “येन सूर्यस्तपति तेजसेद्धः” इति च मन्त्रवर्णः । तेनायं हृद्यन्तर्ज्योतिः। | कहा है—“हे भारत ! जिस प्रकार एक सूर्य इस सम्पूर्ण लोकको प्रकाशित करता है, उसी प्रकार क्षेत्री [आत्मा] सम्पूर्ण क्षेत्रको प्रकाशित करता है” “जो आदित्यगत तेज है [वह मेरा ही जानो]” इत्यादि । “जो अनित्योंमें नित्य और चेतनोंमें चेतन है” ऐसा कठोपनिषद्में भी कहा है और ऐसा भी कहा है कि “सब उसीके प्रकाशित होनेसे प्रकाशित होता है तथा यह सब उसीके तेजसे प्रकाशित है।” इनके सिवा “जिसके तेजसे तेजोमय होकर सूर्य तपता है” ऐसा मन्त्रवर्ण भी है। अतः यह आत्मा हृदयान्तर्गत ज्योति है। |
| पुरुषः—आकाशवत् सर्वगतत्वात् पूर्ण इति पुरुषः; निरतिशयं चास्य स्वयंज्योतिष्ट्वम्, सर्वविभासकत्वात् स्वयमन्यानवभास्यत्वाच्च । स एष पुरुषः स्वयमेव ज्योतिःस्वभावः, यं त्वं पृच्छसि—कतम आत्मेति । | ‘पुरुषः’ आकाशके समान सर्वगत होनेके कारण पूर्ण है, इसलिये पुरुष है; सबका प्रकाशक और स्वयं दूसरोंसे अप्रकाश्य होनेके कारण इसकी स्वयंप्रकाशता सबसे बढ़कर है। वह यह पुरुष, जिसके विषयमें तुम पूछते हो कि ‘आत्मा कौन-सा है?’ स्वयं ही ज्योतिःस्वभाव है। |
| (आत्मनः सर्वव्यवहारहेतुत्वम्)<br>बाह्यानां ज्योतिषां सर्वकरणानुग्राहकाणां प्रत्यस्तमयेऽन्तःकरणद्वारेण हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुष आत्मानुग्राहकः करणानामित्युक्तम् । | समस्त इन्द्रियोंकी उपकारक बाह्य ज्योतियोंके अस्त हो जानेपर हृदयके भीतर अन्तर्ज्योतिःस्वरूप पुरुष—पूर्ण आत्मा अन्तःकरणके द्वारा इन्द्रियोंका उपकारक है—ऐसा पहले कहा गया |
बृ० उ० ५७—