भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 912, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 912
८९८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| यदापि बाह्यकरणानुग्राहकाणा- <br> मादित्यादिज्योतिषां भावः, तदा- <br> प्यादित्यादिज्योतिषां परार्थत्वात् <br> कार्यकरणसङ्घातस्याचैतन्ये स्वा- <br> र्थानुपपत्तेः स्वार्थज्योतिष <br> आत्मनोऽनुग्रहाभावेऽयं कार्य- <br> करणसङ्घातो न व्यवहाराय <br> कल्पते; आत्मज्योतिरनुग्रहेणैव <br> हि सर्वदा सर्वः संव्यवहारः, <br> “यदेतद् हृदयं मनश्चैतत् संज्ञा- <br> नम्” (ऐ० उ० ३। २) इत्यादि <br> श्रुत्यन्तरात्; साभिमानो हि <br> सर्वप्राणिसंव्यवहारः; अभिमान- <br> हेतुं च मरकतमणिदृष्टान्ते- <br> नावोचाम। <br> यद्यप्येवमेतत्, तथापि जाग्र- <br> द्विषये सर्वकरणागोचरत्वादात्म- <br> ज्योतिषो बुद्ध्यादिबाह्याभ्यन्तर- <br> कार्यकरणव्यवहारसन्निपातव्या- <br> कुलत्वान्न शक्यते तज्ज्योतिरा- <br> त्माख्यं मुञ्जेषीकावन्निष्कृष्य <br> दर्शयितुमित्यतः स्वप्ने दिदर्शयिषुः | है। जिस समय बाह्य इन्द्रियोंकी <br> उपकारक आदित्यादि ज्योतियोंकी <br> भी सत्ता रहती है, उस समय भी <br> आदित्यादि ज्योतियाँ परार्थ होनेके <br> कारण और कार्यकारणसङ्घात <br> अचेतन है, इसलिये उसमें स्वार्थका <br> भाव सम्भव न होनेसे स्वार्थज्योतिः <br> (जिसका प्रकाश अपने ही लिये है <br> उस) आत्माके अनुग्रहके बिना <br> यह देहेन्द्रियसङ्घात व्यवहारमें <br> समर्थ नहीं हो सकता; सारा व्यव- <br> हार सर्वदा आत्मज्योतिके अनुग्रहसे <br> ही होता है, “जो यह हृदय है, वही <br> मन है और वही संज्ञान है” ऐसी <br> एक अन्य श्रुतिसे भी यही सिद्ध <br> होता है। प्राणियोंका सारा व्यव- <br> हार अभिमानपूर्वक ही होता है <br> और अभिमानका हेतु हमने मर- <br> कतमणिके दृष्टान्तसे बतला दिया है। <br> यद्यपि यह बात ऐसी ही है, <br> तथापि जाग्रत्-कालमें आत्मज्योति <br> सारी ही इन्द्रियोंकी अविषय तथा <br> बुद्धि आदि बाह्य और आभ्यन्तर <br> देह एवं इन्द्रिय आदिके व्यवहार- <br> समूहसे चञ्चल रहती है, इसलिये <br> उस आत्मसंज्ञक ज्योतिको मूँजमेंसे <br> सींकके समान निकालकर <br> पृथक्रूपसे नहीं दिखाया जा <br> सकता, अतः उसे स्वप्नमें |