बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 927, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ९१३
| जाग्रद्वस्तु प्रतिवाद्यादिवदिति सुलभो दृष्टान्तः; सन्तत्यन्तरवद् विज्ञानान्तरवच्चेति । तस्माद् विज्ञानवादिनापि न शक्यं विज्ञानव्यतिरिक्तं ज्योतिरन्तरं निराकर्तुम् । <br><br> स्वप्ने विज्ञानव्यतिरेकाभावाद्युक्तमिति चेन्न, अभावादपि भावस्य वस्त्वन्तरत्वोपपत्तेः भवतैव तावत् स्वप्ने घटादिविज्ञानस्य भावभूतत्वमभ्युपगतम्; तदभ्युपगम्य तद्व्यतिरेकेण घटाद्यभाव उच्यते, स विज्ञानविषयो घटादिर्यद्यभावो यदि वा भावः स्यात्, उभयथापि घटादिविज्ञानस्य भावभूतत्वमभ्युपगतमेव; न तु तन्निवर्तयितुं शक्यते, तन्निवर्तकन्यायाभावात्। | जाग्रत्-कालकी वस्तु प्रतिवादी आदिके समान, इस प्रकार यह [प्रतिज्ञा और हेतुसहित] दृष्टान्त सुलभ है; इसके सिवा दूसरी संतान तथा दूसरे विज्ञानके समान भी वे वस्तुएँ अपनेसे भिन्न ग्राहकद्वारा ग्रहण करने योग्य हैं।¹ अतः विज्ञानवादी भी विज्ञानसे पृथक् अन्य ज्योतिका निराकरण करनेमें समर्थ नहीं है। <br><br> यदि कहो कि स्वप्नमें तो विज्ञानके सिवा दूसरी वस्तुका अभाव है तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि अभावसे भी भावका भिन्न वस्तु होना तो सिद्ध होता ही है—स्वप्नमें घटादि विज्ञानकी भावस्वरूपता तो आप भी स्वीकार करते ही हैं, वैसा मानकर ही उससे भिन्न घटादिका अभाव बतलाया जाता है, उस विज्ञानका विषय घटादि अभाव हो अथवा भाव, दोनों ही प्रकार घटादि विज्ञानकी भावरूपता तो मान ही ली गयी, उसका तो निराकरण किया नहीं जा सकता; क्योंकि उसकी निवृत्ति करनेवाली |
१. जिस प्रकार व्यवहारमें रामकी संतानसे श्यामकी संतानका तथा असर्वज्ञोंके ज्ञानसे सर्वज्ञके ज्ञानका अनुमान होता है, उसी प्रकार नीलादि पदार्थ और उनके विज्ञानके भेदसे विज्ञान और उनके प्रकाशक आत्मज्योतिके भेदका भी अनुमान किया जा सकता है; अतः विज्ञानवादियोंका मत ठीक नहीं है।
बृ० उ० ५८—