भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 928, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 928
९१४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| एतेन सर्वस्य शून्यता प्रत्युक्ता । | कोई युक्ति नहीं है। इससे सबकी शून्यताका निराकरण हो गया । | | प्रत्यगात्मग्राह्यता चात्मनोऽहमिति मीमांसकपक्षः प्रत्युक्तः । | तथा आत्मा 'अहम्' इस प्रकार प्रत्यगात्माद्वारा ग्राह्य है—ऐसा मीमांसकोंके पक्षका भी खण्डन हो गया ।^१ | | यत्तूक्तम्, सालोकोऽन्यश्चान्यश्च घटो जायत इति, तदसत्, क्षणान्तरेऽपि स एवायं घट इति प्रत्यभिज्ञानात्; सादृश्यात् प्रत्यभिज्ञानं कृत्तोत्थितकेशनखादिष्विवेति चेन्न, तत्रापि क्षणिकत्वस्यासिद्धत्वात्, जात्येकत्वाच्च । | ऐसा जो कहा कि प्रकाशसहित दूसरा-दूसरा घट उत्पन्न होता रहता है, यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि दूसरे क्षणमें भी 'यह वही घट है' ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है; यदि कहो कि काट देनेपर पुनः बढ़े हुए केश और नखादिके समान उन घटोंमें समानता होनेके कारण ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है तो ऐसी बात भी नहीं है, क्योंकि वहाँ भी उनकी क्षणिकता सिद्ध नहीं की जा सकती; इसके सिवा उन केश और नखादिकी एक ही जाति होनेके कारण भी ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है। | | कृतेषु पुनरुत्थितेषु च केशनखादिषु केशनखत्वजातेरेकत्वात् केशनखत्वप्रत्ययस्तन्निमित्तोऽभ्रान्त एव । न हि दृश्यमानलूनोत्थितकेशनखादिषु व्यक्तिनिमित्तः स | काटे हुए और पुनः बढ़े हुए केश और नखादिकी केशत्व और नखत्वरूपसे एक ही जाति होनेके कारण उससे होनेवाली केशत्व और नखत्वकी प्रतीति अभ्रान्त ही है। साक्षात् काटे और बढ़े हुए केश एवं नखादिमें 'यह वही है' ऐसी प्रतीति व्यक्ति- |


१. क्योंकि एक ही आत्माका ग्राह्य और ग्राहक उभयरूप होना सम्भव नहीं है।

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