बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 970, कुल 1402 में से
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९५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| इति—तं विस्तरेण प्रतिपाद्य, केवलं दृष्टान्तमात्रमवशिष्टम्, तद् वक्ष्यामीत्यारभ्यते— | गया है। उसका विस्तारसे प्रतिपादन कर अब जो केवल दृष्टान्तमात्र रह गया है, उसका वर्णन करूँगी-इस उद्देश्यसे श्रुति आरम्भ करती है— |
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पुरुषके अवस्थान्तर-संचारमें महामत्स्यका दृष्टान्त
तद् यथा महामत्स्य उभे कूले अनुसंचरति पूर्वं चापरं चैवमेवायं पुरुष एतावुभावन्तावनुसंचरति स्वप्नान्तं च बुद्धान्तं च ॥ १८ ॥
जिस प्रकार कोई बड़ा भारी मत्स्य नदीके पूर्व और अपर दोनों तीरोंपर क्रमशः संचार करता है, उसी प्रकार यह पुरुष स्वप्नस्थान और जागरितस्थान इन दोनों ही स्थानोंमें क्रमशः संचार करता है ॥ १८ ॥
| तत्तत्रैतस्मिन् यथा प्रदर्शितेऽर्थे दृष्टान्तोऽयमुपादीयते—यथा लोके महामत्स्यः, महांश्चासौ मत्स्यश्च, नादेयेन स्रोतसाहार्य इत्यर्थः, स्रोतश्च विष्टम्भयति, स्वच्छन्दचारी, उभे कूले नद्याः पूर्वं चापरञ्चानुक्रमेण संचरति; संचरन्नपि कूलद्वयं तन्मध्यवर्तिना उदकस्रोतोवेगेन न परवशीक्रियते—एवमेवायं पुरुष एता- | तत्का अर्थ है; तत्र ( वहाँ ) अर्थात् इस ऊपर दिखाये हुए विषयमें यह दृष्टान्त बताया जाता है—जिस प्रकार लोकमें महामत्स्य—जो महान् हो और मत्स्य हो अर्थात् जो नदीके स्रोतसे अक्षुण्ण रहनेवाला हो तथा स्रोतको भी रोक देता हो, वह स्वच्छन्द विचरनेवाला महामत्स्य जैसे नदीके पूर्व और अपर दोनों तीरोंपर क्रमशः संचार करता है और संचार करता हुआ भी उन दोनों तीरोंके बीचमें रहनेवाले जलप्रवाहके वेगसे विवश नहीं होता, इसी प्रकार यह पुरुष इन दोनों स्थानोंमें क्रमशः |
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