बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 971, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ९५७
| वुभौ अन्तौ अनुसंचरति; कौ तौ ? स्वप्नान्तं च बुद्धान्तं च ।<br><br>दृष्टान्तप्रदर्शनफलं तु— मृत्युरूपः कार्यकारणसंघातः सहतत्प्रयोजकाभ्यां कामकर्मभ्याम् अनात्मधर्मः, अयं चात्मा एतस्माद् विलक्षणः—इति विस्तरतो व्याख्यातम् ॥ १८ ॥ | संचार करता है; वे दोनों स्थान कौन से हैं ? स्वप्नस्थान और जागरित-स्थान ।<br><br>दृष्टान्त-प्रदर्शन करनेका फल तो यह है कि अपने प्रयोजक काम और कर्मोंके सहित मृत्युरूप देहेन्द्रियसंघात अनात्मधर्म है और यह आत्मा इससे विलक्षण है—इस प्रकार इसकी विस्तारसे व्याख्या कर दी गयी ॥ १८ ॥ |
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| अत्र च स्थानत्रयानुसंचारेण स्वयंज्योतिष आत्मनः कार्यकारणसंघातव्यतिरिक्तस्य कामकर्मभ्यां विविक्ततोक्ता; स्वतः नायं संसारधर्मवान्, उपाधिनिमित्तमेव त्वस्य संसारित्वम् अविद्याध्यारोपितम्—इत्येष समुदायर्थ उक्तः ।<br><br>तत्र च जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तस्थानानां त्रयाणां विप्रकीर्णरूप उक्तः, न पुञ्जीकृत्यैकत्र दर्शितः—यस्माज्जागरिते ससङ्गः समृृत्युः सकार्यकरणसंघात उपलक्ष्यतेऽविद्यया; स्वप्ने तु कामसंयुक्तो | यहाँ स्थानत्रयके क्रमिक संचारके द्वारा देहेन्द्रियसंघातसे व्यतिरिक्त स्वयंप्रकाश आत्माकी काम और कर्मोंसे भिन्नता बतलायी गयी है; यह स्वयं संसारधर्मवान् नहीं है, इसका संसारित्व अविद्यासे आरोपित उपाधिके कारण ही है—इस प्रकार यह समुदायका सारांश बतलाया गया ।<br><br>परंतु यहाँ जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्त तीनों स्थानोंका पृथक्-पृथक् रूप कहा गया है, सबको मिलाकर एक स्थानमें नहीं दिखाया गया; क्योंकि जागरित-अवस्थामें वह अविद्यावश, ससङ्ग (आसक्तियुक्त), मृत्युयुक्त और कार्यकारणसंघात सहित देखा जाता है, किंतु स्वप्नमें |