भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 976, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 976
९६२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

सहस्रधा भिन्नस्तावताणिम्ना तिष्ठन्ति शुक्लस्य नीलस्य पिङ्गलस्य हरितस्य लोहितस्य पूर्णा अथ यत्रैनं घ्नन्तीव जिनन्तीव हस्तीव विच्छादयति गर्तमिव पतति यदेव जाग्रद्भयं पश्यति तदत्राविद्यया मन्यतेऽथ यत्र देव इव राजेवाहमेवेदँ॒ सर्वोऽस्मीति मन्यते सोऽस्य परमो लोकः ॥ २० ॥

उसकी वे ये हिता नामकी नाड़ियाँ, जिस प्रकार सहस्र भागोंमें विभक्त केश होता है वैसी ही सूक्ष्मतासे रहती हैं। वे शुक्ल, नील, पीत, हरित और लाल रंगके रससे पूर्ण हैं। सो जहाँ इस पुरुषको मानो मारते, मानो अपने वशमें करते हैं और जहाँ मानो इसे हाथी खदेड़ता है अथवा जहाँ यह मानो गड़हेमें गिरता है; इस प्रकार जो कुछ भी जाग्रदवस्थाके भय देखता है, उन्हें इस स्वप्नावस्थामें अविद्यासे मानता है और जहाँ यह देवताके समान, राजाके समान अथवा मैं ही यह सब हूँ—ऐसा मानता है, वह इसका परमधाम है ॥ २० ॥

| ता वै, अस्य शिरःपाण्यादिलक्षणस्य पुरुषस्य, एता हिता नाम नाड्यः, यथा केशः सहस्रधा भिन्नः, तावता तावत्परिमाणेनाणिम्ना अणुत्वेन तिष्ठन्ति; ताश्च शुक्लस्य रसस्य नीलस्य पिङ्गलस्य हरितस्य लोहितस्य पूर्णाः, एतैः शुक्लत्वादिभी रसविशेषैः पूर्णा इत्यर्थः; एते च रसानां वर्णविशेषा वातपित्तश्लेष्मणाम् इतरेतरसंयोगवैषम्यविशेषाद् विचित्रा बहवश्च भवन्ति। | इस शिर एवं हाथ आदि अवयवोंवाले पुरुषकी ये हिता नामकी नाडियाँ, जिस प्रकार सहस्र भागोंमें विभक्त हुआ केश रहता है, उतने ही परिमाण यानी सूक्ष्मतासे रहती हैं; और वे शुक्ल, नील, पीत, हरित एवं लोहित रसकी भरी हुई हैं अर्थात् इन शुक्लत्वादिविशिष्ट रसोंसे पूर्ण हैं; ये रसोंके वर्णविशेष वात, पित्त और कफोंके पारस्परिक संयोगकी विशेष विषमताके कारण विभिन्न और बहुत प्रकारके होते हैं। |

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