बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 977, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९६३ |
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| तास्वेवंविधासु नाडीषु सूक्ष्मासु वालाग्रसहस्रभेदपरिमाणासु शुक्लादिरसपूर्णासु सकलदेहव्यापिनीषु सप्तदशकं लिङ्गं वर्तते। तदाश्रिताः सर्वा वासना उच्चावचसंसारधर्मानुभवजनिताः; तल्लिङ्गं वासनाश्रयं सूक्ष्मत्वात् स्वच्छं स्फटिकमणिकल्पं नाडीगतरसोपाधिसंसर्गवशाद् धर्माधर्मप्रेरितोद्भूतवृत्तिविशेषं स्त्रीरथहस्त्याद्याकारविशेषैर्वासनाभिः प्रत्यवभासते। | इन इस प्रकारकी शुक्लादि रसोंसे पूर्ण सम्पूर्ण शरीरमें फैली हुई और वालाग्रके सहस्रांश परिमाणवाली सूक्ष्म नाडियोंमें वह सतरह तत्त्वोंका लिङ्गशरीर रहता है। उसीके अधीन संसारके ऊँच-नीच धर्मोंके अनुभवसे उत्पन्न हुई सारी वासनाएँ हैं। वासनाओंका आश्रयभूत वह लिङ्गशरीर सूक्ष्म होनेके कारण स्वच्छ और स्फटिकमणिके समान है, वह नाडीगत रसरूप उपाधिके संसर्गसे धर्माधर्मप्रेरित उद्भूतवृत्तिविशेषवाला तथा स्त्री, रथ, हाथी आदि आकारवाली विशेष वासनाओंसे युक्त भासित होता है। | | अथैवं सति, यत्र यस्मिन् काले <br> [अविद्याप्रत्ययोद्भूतदुःखानुभवप्रदर्शनम्] <br> केचन शत्रवोऽन्ये वा तस्करा मामागत्य घ्नन्ति-इति मृषैव वासनानिमित्तः प्रत्ययोऽविद्याख्यो जायते, तदेतदुच्यते—एनं स्वप्नदृशं घ्नन्तीवेति; तथा जिनन्तीव वशीकुर्वन्तीव; न केचन घ्नन्ति, नापि वशीकुर्वन्ति, केवलं त्वविद्यावासनोद्भवनिमित्तं भ्रान्तिमात्रम्; तथा हस्तीवैनं विच्छादयति वि- | ऐसी स्थितिमें, जिस समय वासनाओंके कारण 'कोई शत्रु अथवा अन्य चोर आदि आकर मुझे मारते हैं' ऐसा अविद्यासंज्ञक वृथा ही प्रत्यय हो जाता है, उसके विषयमें यह कहा जाता है—इस स्वप्नद्रष्टाको मानो मारते हैं, तथा 'जिनन्तीव'—मानो वशमें करते हैं। [वास्तवमें] उस समय न कोई मारते हैं और न वशमें ही करते हैं, यह तो केवल अविद्याजनित वासनाके उद्भवके कारण भ्रान्तिमात्र हो जाती है; इसी प्रकार हाथीके समान कोई इसे विच्छायित- |