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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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६८२ नारदीयपुराणम् बहुपात्रेषु संस्थाप्य कौमुद्यां शीतदीधितेः । याममात्रे गते रात्र्या लक्ष्म्यै तद्विनिवेदयेत् ॥५१॥ ततः संभोजयेत्तेन विप्राञ्छक्त्या ततश्च तैः । सहैव जागरं कुर्यान्नृत्यगीतसुमङ्गलैः ॥५२॥ ततोऽरुणोदये स्नात्वा तां मूर्ति गुरवेऽर्पयेत् । अस्यां रात्रौ महालक्ष्मीर्वरदाभयकरांबुजा ॥५३॥ निशीथे चरते लोके को जागर्ति धरातले । तस्मै वित्तं प्रयच्छामि जाग्रते पूजयन्मम ॥५४॥ वर्षे वर्षे कृतं चेतद्व्रतं लक्ष्मीप्रतोषणम् । समृद्धिमैहिकीं दद्याद्देहान्ते पारलौकिकीम् ॥५५॥ कार्तियां पूर्णिमायां तु कुर्यात्कार्तिकदर्शनम् । विप्रत्वञ्चाक्षये भूयः सर्वशत्रुपराजयः ॥५६॥ अत्रैव दीपदानेन विधेयस्त्रिपुरोत्सवः । निशामुखे द्विजश्रेष्ठ सर्वजीवसुखावहः ॥५७॥ कीटाः पतंगा मशकाश्च वृक्षा जले स्थले ये विचरंति जीवाः । दृष्ट्वा प्रदीपं नहि तेऽपि जन्मिनः पुनश्च कुर्वित हि लभंत एव च ॥५८॥ अथ चन्द्रोदये विप्रे संपूज्याः कृत्तिकाश्च षट् ॥५९॥ कार्तिकेयस्तथा खड्गी वरुणश्च हुताशनः । गन्धपुष्पैस्तथा धूपदीपनैवेद्यविस्तरैः ॥६०॥ परमान्नैः फलैः शाकैस्तोष्याब्राह्मणतर्जनैः । एवं देवान्समभ्यर्च्य दीपो देयो गृहाद्बहिः ॥६१॥ दीपोपंते तथा गर्तश्चतुरस्रो मनोहरः । चतुर्दशांगुलः कार्यः सेव्यश्चन्दनवारिणा ॥६२॥ गवां क्षीरेण संपूर्ण हेम्नस्तत्र विनिक्षिपेत् । मत्स्यंनेत्रसमायुक्तं मत्स्यं सर्वाङ्गशोभनम् ॥६३॥ महामत्स्याय च नम इति मंत्रं समुच्चरन् । गन्धाद्यैस्तं संपूज्य द्विजाय प्रतिपादयेत् ॥६४॥ क्षीरसागरदानं ते मयोत्सृष्टं द्विजसत्तम । दानस्यास्य प्रभावेण मोदते हरिसन्निधौ ॥६५॥ बना कर बहुत पात्रों में रखकर एक पहर रात बीत जाने पर चन्द्रज्योत्स्ना में लक्ष्मी को भोग लगाये । पश्चात् भक्तिपूर्वक ब्राह्मणों को खिलाकर नृत्य, गीत तथा मंगल-स्तुतियों से जागरण करे । प्रातःकाल अरुणोदय होते ही स्नान कर मूर्ति गुरु को समर्पित कर दे उस रात्रि में वरदायिनी महालक्ष्मी कर कमलों को उठाकर यह कहती हुई विचरण करती हैं कि जो आज रात जागरण एवम् पूजन करेगा, उसे मैं धन प्रदान करूंगी । इस लक्ष्मी-तोषण व्रत को प्रतिवर्ष करने से इस लोक में संपत्ति मिलती है और परलोक में सुगति ॥४७-५५॥ कार्तिकी पूर्णिमा में कार्तिक के दर्शन करने से विप्रत्व तथा शत्रुओं से विजय की प्राप्ति होती है । उसी दिन प्रदोष काल में दीपदान से त्रिपुरोत्सव मनाना चाहिये, जो समस्त जीवों के लिये सुखदायक है । कीट, पतंग, मशक, वृक्ष, जलचर एवम् स्थलचर जितने जीव हैं, वे सब कार्तिकी पूर्णिमा के दीपदान के प्रताप से मुक्ति को प्राप्त करते हैं । विप्र ! उस रात चंद्रोदय होने पर छः कृत्तिकाओं की पूजा करनी चाहिये । गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, खीर, फल तथा शाक से खड्गधारी कार्तिकेय, वरुण तथा अग्नि की पूजा कर ब्राह्मणों को तृप्त करे । इस प्रकार देवों की अर्चना कर घर से बाहर दीपक जलावे । दीप के समीप चौदह अंगुल विस्तृत एक मनोहर चौकोर गर्त (गड्ढा) खोदे । उसे चंदनमिश्रित जल से सिक्त कर गौ के दूध से भर दे । तदनन्तर 'महा मत्स्याय नम ...” इस मंत्र को पढ़ते हुए एक सुवर्ण का मत्स्य, जिसकी आंखें मोती की हों और देखने में सर्वाङ्ग सुन्दर हो, उसमें डालकर गंध आदि से पूजा करके "द्विजश्रेष्ठ ! मैं क्षीरसागर का दान आपको दे रहा हूँ।” यह कहते हुए द्विज को समर्पित कर दे ॥५६-६४१/२॥ इस दान के प्रभाव से मनुष्य हरि के समीप आनन्द करता है । नारद ! उस दिन वृषोत्सर्ग तथा नक्तव्रत करने से रुद्रलोक की प्राप्ति होती है, इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं । अगहन की पूर्णिमा में सकल कामनाओं की प्राप्ति के लिये सुवर्ण तथा लवण शांत विप्र