बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ६८१ कृतांजलिः प्रार्थयेच्छंभुः करिष्ये च व्रतं प्रभो । एवं विज्ञाप्य देवं तु गृह्णीयाद्व्रतमुत्तमम् ॥३४॥ रात्रौ देवांतिके सुप्त्वा उत्थायापररात्रके । कृतशौचादिकस्तस्तु भस्म रुद्राक्षधृक् ततः ॥३५॥ पूजयेच्छंकरं सम्यगुपचारैः पृथग्विधैः । विल्वपत्रैः सुगंधाढ्यैर्नैवेद्यैर्धूपदीपकैः ॥३६॥ ततःप्रदोषसेद्धिश्चनंद्वोदयं विधूद्गमे । पुनः संपूज्य तत्थैवं रात्रौ जागरणं चरेत् ॥३७॥ एवं पंचदशाव्दांश्च कृत्वा व्रतमन्दितः । वर्षे वर्षे तदुक्तो निष्ठासद्धिमुपागत् ॥३८॥ उमाकांतश्च महेशाश्च सौवर्णी प्रतिमाद्वयम् । हैमा रौप्या मृन्मयाश्च घटाः पंचदशोत्तमाः ॥३९॥ तत्तैकमिन्घटे स्थाप्यं सवस्त्रं प्रतिमाद्वयम् । पंचामृतेन संस्नाप्य जलैः शुद्धैस्ततोऽर्चयेत् ॥४०॥ उपचारैः षोडशभिश्चतः पंचदश द्विजान् । भोजयेद्वेव मिष्टान्नंर्वस्त्रालेपन दक्षिणाणू ॥४१॥ कुंभोकेकसीसस्य मूर्त्याढ्यं गुरवेऽर्पयेत् । एवं कृत्वा व्रतं चास्य उमामहेश्वराभिधम् ॥४२॥ जायते भुवि विख्यातो निधानं सर्वसंपदाम् । अथाश्विनेय दिवसे शक्रव्रतमपि स्मृतम् ॥४३॥ प्रातः स्नात्वा विधानेन संपूज्य सुरनायकम् । गंधाद्यैश्च परैस्तु नैवेद्यांश्च शर्करैः ॥४४॥ ततो निमंत्रित्तान्विप्रान्भोजये द्विविधैर्हविषा । समागतांस्तथैवान्यान्दीनांधांश्च भोजयेत् ॥४५॥ एतच्छक्रव्रतं विप्र कर्तव्यं प्रतिवार्षिकम् । राजा वा हस्तिनाम्न्यैव अन्येषामिच्छतोऽथवा ॥४६॥ आश्विने मासि पूर्णिमा व्रतं कोजागराभिधम् । तेषु स्नात्वा विधानेन सोपवासो जितेंद्रियः ॥४७॥ लक्ष्ममिभ्यर्च्य सौवर्णी घटे संस्थाप्य तामसिके । मृन्मये वा वसनैर्व्याप्तमुपचारैः पृथग्विधम् ॥४८॥ ततः सायंतने कालेऽभ्युदिते तारकाधिपे । हैमारौप्यान्मृन्मयान्वा गृहान्प्रज्वालयेद्घृतैः ॥४९॥ लक्षं तदर्धसंयुतं सहस्रं शतमथ वा । घृतशर्करसंमिश्रं विधाय बहु पायसम् ॥५०॥
पूजा करके हाथ जोड़ते हुए प्रार्थना करे--'प्रभो ! कल मैं आपका व्रत करूंगा।' इस प्रकार शिव से निवेदन करके उत्तम व्रत को प्रारंभ करे । रात्रि में देवता के समीप शयन कर अंतिम प्रहर में उठकर नित्यकर्म से निवृत्त हो भस्म तथा रुद्राक्ष धारण करके बिल्वपत्र, सुगंधित द्रव्य, नैवेद्य, धूप, दीप आदि उपचारों से शंकर की अर्चा करे । तदनन्तर प्रदोष काल तक उपवास करके चंद्रोदय होने पर पुन: शिव की अर्चा कर रात्रि में जागरण करे । इस तरह पंद्रह वर्षों तक निरालस्यपूर्वक व्रत करना चाहिये । उसके उद्यापन में शिव तथा गौरी की स्वर्णमयी प्रतिमाओं को सुवर्ण या चांदी या मिट्टी के पंद्रह घटों के बीच एक घट पर सवस्त्र स्थापित कर पंचामृत से स्नान करा कर पुनः शुद्ध जल से स्नान करावे । पश्चात् षोडशोपचार पूजन कर ब्राह्मणों को मिष्टान्न खिला कर दक्षिणा दे और प्रतिमा सहित समस्त घट गुरु को अर्पित करे । इस प्रकार उमामहेश्वर नामक व्रत करने वाला व्यक्ति पृथ्वी पर सकल संपत्तियों का निधान होता है। उसी दिन शक्रव्रत भी किया जाता है । प्रातःकाल स्नान कर गंध आदि उपचारों तथा नैवेद्यों की राशि से देवराज की पूजा करके निमंत्रित विप्रों, आगन्तुकों तथा अन्य दीन-दुखियों को खिलाये । विप्र ! यह इंद्रव्रत राजा, धनी तथा अन्य धनाभिलाषियों को प्रतिवर्ष करना चाहिये ॥३४-४६॥ आश्विन की पूर्णिमा में कोजागरा व्रत किया जाता है । उस दिन विधिवूर्वक स्नान कर उपवास तथा इंद्रिय-संयम करते हुए ताँबे या मिट्टी के घट पर अवस्थित लक्ष्मी की स्वर्णमयी प्रतिमा को वस्त्र से विभूषित कर षोडशोपचार पूजन करे । संध्याकाल चंद्रोदय होने पर एकलाख या पचास हजार वा दस हजार या एक हजार या एक ही सौ सुवर्ण या चाँदी या मिट्टी के दीपों में घी भरकर जलाये और प्रचुररूप से घृतयुक्त शर्करा मौ...