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भारतकोश
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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ६८१ कृतांजलिः प्रार्थयेच्छंभुः करिष्ये च व्रतं प्रभो । एवं विज्ञाप्य देवं तु गृह्णीयाद्व्रतमुत्तमम् ॥३४॥ रात्रौ देवांतिके सुप्त्वा उत्थायापररात्रके । कृतशौचादिकस्तस्तु भस्म रुद्राक्षधृक् ततः ॥३५॥ पूजयेच्छंकरं सम्यगुपचारैः पृथग्विधैः । विल्वपत्रैः सुगंधाढ्यैर्नैवेद्यैर्धूपदीपकैः ॥३६॥ ततःप्रदोषसेद्धिश्चनंद्वोदयं विधूद्गमे । पुनः संपूज्य तत्थैवं रात्रौ जागरणं चरेत् ॥३७॥ एवं पंचदशाव्दांश्च कृत्वा व्रतमन्दितः । वर्षे वर्षे तदुक्तो निष्ठासद्धिमुपागत् ॥३८॥ उमाकांतश्च महेशाश्च सौवर्णी प्रतिमाद्वयम् । हैमा रौप्या मृन्मयाश्च घटाः पंचदशोत्तमाः ॥३९॥ तत्तैकमिन्घटे स्थाप्यं सवस्त्रं प्रतिमाद्वयम् । पंचामृतेन संस्नाप्य जलैः शुद्धैस्ततोऽर्चयेत् ॥४०॥ उपचारैः षोडशभिश्चतः पंचदश द्विजान् । भोजयेद्वेव मिष्टान्नंर्वस्त्रालेपन दक्षिणाणू ॥४१॥ कुंभोकेकसीसस्य मूर्त्याढ्यं गुरवेऽर्पयेत् । एवं कृत्वा व्रतं चास्य उमामहेश्वराभिधम् ॥४२॥ जायते भुवि विख्यातो निधानं सर्वसंपदाम् । अथाश्विनेय दिवसे शक्रव्रतमपि स्मृतम् ॥४३॥ प्रातः स्नात्वा विधानेन संपूज्य सुरनायकम् । गंधाद्यैश्च परैस्तु नैवेद्यांश्च शर्करैः ॥४४॥ ततो निमंत्रित्तान्विप्रान्भोजये द्विविधैर्हविषा । समागतांस्तथैवान्यान्दीनांधांश्च भोजयेत् ॥४५॥ एतच्छक्रव्रतं विप्र कर्तव्यं प्रतिवार्षिकम् । राजा वा हस्तिनाम्न्यैव अन्येषामिच्छतोऽथवा ॥४६॥ आश्विने मासि पूर्णिमा व्रतं कोजागराभिधम् । तेषु स्नात्वा विधानेन सोपवासो जितेंद्रियः ॥४७॥ लक्ष्ममिभ्यर्च्य सौवर्णी घटे संस्थाप्य तामसिके । मृन्मये वा वसनैर्व्याप्तमुपचारैः पृथग्विधम् ॥४८॥ ततः सायंतने कालेऽभ्युदिते तारकाधिपे । हैमारौप्यान्मृन्मयान्वा गृहान्प्रज्वालयेद्घृतैः ॥४९॥ लक्षं तदर्धसंयुतं सहस्रं शतमथ वा । घृतशर्करसंमिश्रं विधाय बहु पायसम् ॥५०॥


पूजा करके हाथ जोड़ते हुए प्रार्थना करे--'प्रभो ! कल मैं आपका व्रत करूंगा।' इस प्रकार शिव से निवेदन करके उत्तम व्रत को प्रारंभ करे । रात्रि में देवता के समीप शयन कर अंतिम प्रहर में उठकर नित्यकर्म से निवृत्त हो भस्म तथा रुद्राक्ष धारण करके बिल्वपत्र, सुगंधित द्रव्य, नैवेद्य, धूप, दीप आदि उपचारों से शंकर की अर्चा करे । तदनन्तर प्रदोष काल तक उपवास करके चंद्रोदय होने पर पुन: शिव की अर्चा कर रात्रि में जागरण करे । इस तरह पंद्रह वर्षों तक निरालस्यपूर्वक व्रत करना चाहिये । उसके उद्यापन में शिव तथा गौरी की स्वर्णमयी प्रतिमाओं को सुवर्ण या चांदी या मिट्टी के पंद्रह घटों के बीच एक घट पर सवस्त्र स्थापित कर पंचामृत से स्नान करा कर पुनः शुद्ध जल से स्नान करावे । पश्चात् षोडशोपचार पूजन कर ब्राह्मणों को मिष्टान्न खिला कर दक्षिणा दे और प्रतिमा सहित समस्त घट गुरु को अर्पित करे । इस प्रकार उमामहेश्वर नामक व्रत करने वाला व्यक्ति पृथ्वी पर सकल संपत्तियों का निधान होता है। उसी दिन शक्रव्रत भी किया जाता है । प्रातःकाल स्नान कर गंध आदि उपचारों तथा नैवेद्यों की राशि से देवराज की पूजा करके निमंत्रित विप्रों, आगन्तुकों तथा अन्य दीन-दुखियों को खिलाये । विप्र ! यह इंद्रव्रत राजा, धनी तथा अन्य धनाभिलाषियों को प्रतिवर्ष करना चाहिये ॥३४-४६॥ आश्विन की पूर्णिमा में कोजागरा व्रत किया जाता है । उस दिन विधिवूर्वक स्नान कर उपवास तथा इंद्रिय-संयम करते हुए ताँबे या मिट्टी के घट पर अवस्थित लक्ष्मी की स्वर्णमयी प्रतिमा को वस्त्र से विभूषित कर षोडशोपचार पूजन करे । संध्याकाल चंद्रोदय होने पर एकलाख या पचास हजार वा दस हजार या एक हजार या एक ही सौ सुवर्ण या चाँदी या मिट्टी के दीपों में घी भरकर जलाये और प्रचुररूप से घृतयुक्त शर्करा मौ...

६८२ नारदीयपुराणम् बहुपात्रेषु संस्थाप्य कौमुद्यां शीतदीधितेः । याममात्रे गते रात्र्या लक्ष्म्यै तद्विनिवेदयेत् ॥५१॥ ततः संभोजयेत्तेन विप्राञ्छक्त्या ततश्च तैः । सहैव जागरं कुर्यान्नृत्यगीतसुमङ्गलैः ॥५२॥ ततोऽरुणोदये स्नात्वा तां मूर्ति गुरवेऽर्पयेत् । अस्यां रात्रौ महालक्ष्मीर्वरदाभयकरांबुजा ॥५३॥ निशीथे चरते लोके को जागर्ति धरातले । तस्मै वित्तं प्रयच्छामि जाग्रते पूजयन्मम ॥५४॥ वर्षे वर्षे कृतं चेतद्व्रतं लक्ष्मीप्रतोषणम् । समृद्धिमैहिकीं दद्याद्देहान्ते पारलौकिकीम् ॥५५॥ कार्तियां पूर्णिमायां तु कुर्यात्कार्तिकदर्शनम् । विप्रत्वञ्चाक्षये भूयः सर्वशत्रुपराजयः ॥५६॥ अत्रैव दीपदानेन विधेयस्त्रिपुरोत्सवः । निशामुखे द्विजश्रेष्ठ सर्वजीवसुखावहः ॥५७॥ कीटाः पतंगा मशकाश्च वृक्षा जले स्थले ये विचरंति जीवाः । दृष्ट्वा प्रदीपं नहि तेऽपि जन्मिनः पुनश्च कुर्वित हि लभंत एव च ॥५८॥ अथ चन्द्रोदये विप्रे संपूज्याः कृत्तिकाश्च षट् ॥५९॥ कार्तिकेयस्तथा खड्गी वरुणश्च हुताशनः । गन्धपुष्पैस्तथा धूपदीपनैवेद्यविस्तरैः ॥६०॥ परमान्नैः फलैः शाकैस्तोष्याब्राह्मणतर्जनैः । एवं देवान्समभ्यर्च्य दीपो देयो गृहाद्बहिः ॥६१॥ दीपोपंते तथा गर्तश्चतुरस्रो मनोहरः । चतुर्दशांगुलः कार्यः सेव्यश्चन्दनवारिणा ॥६२॥ गवां क्षीरेण संपूर्ण हेम्नस्तत्र विनिक्षिपेत् । मत्स्यंनेत्रसमायुक्तं मत्स्यं सर्वाङ्गशोभनम् ॥६३॥ महामत्स्याय च नम इति मंत्रं समुच्चरन् । गन्धाद्यैस्तं संपूज्य द्विजाय प्रतिपादयेत् ॥६४॥ क्षीरसागरदानं ते मयोत्सृष्टं द्विजसत्तम । दानस्यास्य प्रभावेण मोदते हरिसन्निधौ ॥६५॥ बना कर बहुत पात्रों में रखकर एक पहर रात बीत जाने पर चन्द्रज्योत्स्ना में लक्ष्मी को भोग लगाये । पश्चात् भक्तिपूर्वक ब्राह्मणों को खिलाकर नृत्य, गीत तथा मंगल-स्तुतियों से जागरण करे । प्रातःकाल अरुणोदय होते ही स्नान कर मूर्ति गुरु को समर्पित कर दे उस रात्रि में वरदायिनी महालक्ष्मी कर कमलों को उठाकर यह कहती हुई विचरण करती हैं कि जो आज रात जागरण एवम् पूजन करेगा, उसे मैं धन प्रदान करूंगी । इस लक्ष्मी-तोषण व्रत को प्रतिवर्ष करने से इस लोक में संपत्ति मिलती है और परलोक में सुगति ॥४७-५५॥ कार्तिकी पूर्णिमा में कार्तिक के दर्शन करने से विप्रत्व तथा शत्रुओं से विजय की प्राप्ति होती है । उसी दिन प्रदोष काल में दीपदान से त्रिपुरोत्सव मनाना चाहिये, जो समस्त जीवों के लिये सुखदायक है । कीट, पतंग, मशक, वृक्ष, जलचर एवम् स्थलचर जितने जीव हैं, वे सब कार्तिकी पूर्णिमा के दीपदान के प्रताप से मुक्ति को प्राप्त करते हैं । विप्र ! उस रात चंद्रोदय होने पर छः कृत्तिकाओं की पूजा करनी चाहिये । गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, खीर, फल तथा शाक से खड्गधारी कार्तिकेय, वरुण तथा अग्नि की पूजा कर ब्राह्मणों को तृप्त करे । इस प्रकार देवों की अर्चना कर घर से बाहर दीपक जलावे । दीप के समीप चौदह अंगुल विस्तृत एक मनोहर चौकोर गर्त (गड्ढा) खोदे । उसे चंदनमिश्रित जल से सिक्त कर गौ के दूध से भर दे । तदनन्तर 'महा मत्स्याय नम ...” इस मंत्र को पढ़ते हुए एक सुवर्ण का मत्स्य, जिसकी आंखें मोती की हों और देखने में सर्वाङ्ग सुन्दर हो, उसमें डालकर गंध आदि से पूजा करके "द्विजश्रेष्ठ ! मैं क्षीरसागर का दान आपको दे रहा हूँ।” यह कहते हुए द्विज को समर्पित कर दे ॥५६-६४१/२॥ इस दान के प्रभाव से मनुष्य हरि के समीप आनन्द करता है । नारद ! उस दिन वृषोत्सर्ग तथा नक्तव्रत करने से रुद्रलोक की प्राप्ति होती है, इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं । अगहन की पूर्णिमा में सकल कामनाओं की प्राप्ति के लिये सुवर्ण तथा लवण शांत विप्र

चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ६६३ अद्य कृत्वा वृषोत्सर्गं व्रतं नक्तं च नारद । रुद्रलोकमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥६६॥ मार्गशीर्ष्यां पूर्णमास्यां स्वशक्त्या लवणोदकम् । देयं विप्राय शांताय सर्वकामसमृद्धये ॥६७॥ इदं जगत्पुरा लक्ष्म्या त्यक्तमासीत्ततो हरिः । पुरंदरश्च सोमश्च तथा तिष्यो बृहस्पतिः ॥६८॥ पंचैते पुष्ययुक्तायां पौर्णमास्यां जगद्वलात् । अलंकृतं पुनश्चक्रुः सौभाग्योत्सवकेलिभिः ॥६६॥ तस्मान्नरः पुष्ययोगे सर्वसौभाग्यवृद्धये । गौरसर्षपकल्केन समालभ्य स्वकां तनुम् ॥७०॥ स्नायात्सर्वौषधिजलैर्धारयेच्च नवांशुके । दृष्ट्वा च मंगलं द्रव्यं स्पृष्ट्वा नत्वा ततोऽर्चयेत् ॥७१॥ हरिशक्रेंदुपुष्येभ्यान्गंधाद्यैरुपचारकैः । विधाय होमं विप्रांश्च तर्पयेत्पायसाशनैः ॥७२॥ एतत्कृत्वा व्रतं विप्र रमाप्रीतिविवर्द्धनम् । अलक्ष्मीनाशनं चैव मोदतेह परत्र च ॥७३॥ पौर्णमास्यां ततो माघ्यां तिलकार्पासकंबलम् । रत्नानि कंचुकोष्णीषपादत्राणानि वा धनम् ॥७४॥ दत्त्वा प्रमोदर्ते स्वर्गे दानं वित्तानुसारतः । यस्त्वत्र शंकरं देवं पूजयेद्विधिपूर्वकम् ॥७५॥ सोऽश्वमेधफलं प्राप्य विष्णुलोके महीयते । फाल्गुने पूर्णमास्यां तु होलिकापूजनं मतम् ॥७६॥ संचयं सर्वकाष्ठानामुपलानां च कारयेत् । तत्राग्निं विधिबद्धुत्वा रक्षोघ्नैर्मंत्रविस्तरैः ॥७७॥ "असृक्पामयसंत्रस्तैः कृत्वा त्वं होलिबालिशैः । अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव' ॥७८॥ इति मंत्रेण संदीष्य काष्ठादिक्षेपणैस्ततः । परिक्रम्योत्सवः कार्यो गीतवादित्रनिःस्वनैः ॥७६॥ होलिका राक्षसी चेयं प्रह्लादभयदायिनी । ततस्तां प्रदहंत्येवं काष्ठाद्यैर्गीतमंगलैः ॥८०॥ संवत्सरस्य दाहोऽयं कामदाहो मतांतरे । इति जानीहि विप्रेन्द्र लोके स्थितिरनेकधा ॥८१॥ पक्षांते द्वे पृथग्दैवे ततोऽमात्रतमुच्यते । पृथक्शृणुष्व मे विप्र पितृणामतिवल्लभम् ॥८२॥ को दान देना चाहिये । प्राचीनकाल में जब लक्ष्मी ने इस जगत् का परित्याग कर दिया तब सौभाग्य, उत्सव तथा केलि के प्रिय हरि, पुरंदर, सोम, तिष्य एवम् बृहस्पति ने पुष्ययुक्त पौर्णमासी में फिर से इस जगत् को अलंकृत किया । इसलिये सौभाग्य-वृद्धि के अभिलाषी मानव पुष्ययुक्त पौर्णमासी के दिन अपने शरीर में श्वेत सरसों का उबटन लगाकर सर्वोषधिजल से स्नान करे । तब नवीन वस्त्र धारण कर मांगलिक द्रव्यों का दर्शन एवम् स्पर्श करके गंध आदि उपचारों से हरि, शक्र तथा चंद्रमा की पूजा करे । पश्चात् हवन कर ब्राह्मणों को खीर से परि- तृप्त करे । विप्र ! जो व्यक्ति इस रमाप्रीतिवर्धक व्रत को करता है, वह दरिद्रता से मुक्त हो इस लोक में तथा परलोक में आनन्दित होता है ॥६५-७३॥ माघी पूर्णिमा में वित्तानुसार तिल, कपास, कंबल, रत्न, कंचुक (कुर्ता), उष्णीष (पगड़ी), जूता तथा द्रव्य दान करने से स्वर्ग में आनन्द मिलता है । जो उस दिन विधिपूर्वक शंकर देव की पूजा करता है, वह अश्वमेध का फल प्राप्त कर विष्णुलोक में पूजित होता है। फाल्गुन की पूर्णिमा में होलिक'पूजन किया जाता है । सब प्रकार की लकड़ियां एवम् गोष्ठे एकत्रित कर राक्षसनाक्षक मंत्रों को पढ़ते हुए उसमें विधिपूर्वक आग लगा दे । "अष्ट..." इस मंत्र को पढ़ते हुए लकड़ी आदि डालकर अग्नि प्रज्वलित करके परिक्रमा करे । फिर गाने-बजाने के साथ उत्सव मनाये । होलिका नामक राक्षसी प्रह्लाद को डराती थी । इसलिये लोग गाना-बजाना करते हुए लकड़ी आदि से उसे इस प्रकार जलाते हैं। विप्रवर्य ! किसी के मत में यह संवत्सर- दाह कहलाता है तो किसी के मत में कामदाह । क्योंकि लोक में स्थिति अनेक प्रकार की मानी जाती है ॥७४-८१॥ पक्षान्त तिथियाँ दो होती हैं-पूर्णिमा तथा अमावास्या । दोनोंके देवता पृथक्-पृथक् हैं ! इसलिए अमावास्या

चैत्रवैशाखयोस्तत्त्वं वक्ष्ये विप्रवरेप्सितम् । पार्व्वणं ... पितॄणां तृप्तिकारकम् ॥८१॥ द्विजानां भोजनं दानं गवां चैव प्रकीर्तितम् । सर्वदा सर्वतीर्थेषु यत्पुण्यं चापरं महत् ॥८२॥ ज्येष्ठेऽमायां व्रतं प्रोक्तं सावित्र्याः कस्य कारणम् । विधानं ज्येष्ठपूर्णावद्विधानं परिकीर्तितम् ॥८३॥ शुचौ नभसि भाद्रे च कार्यं पूर्वोदितं द्विज । पितृश्राद्धं ... दानं होमं सुरार्चनम् ॥८४॥ भाद्रस्यापरपक्षे तु तिलक्षेत्रसमुद्भवम् । विरिश्चिना समुत्पन्नं कुशैर्च्छिन्नं हुंकारबीजतः ॥८५॥ सर्वदा सर्वकार्येषु ... योजयेत्कुशसंचयम् । इषामृतौ विशेषेण पितॄणां मुक्तिदायकम् ॥८६॥ विधेयं जाह्नवीतोये मुनिश्रेष्ठ न संशयः । कार्तिकाने दीपान् देवालयादिषु ॥८७॥ नदीनदतडागेषु चैत्यगोष्ठापणेषु च । लक्ष्मीनं तथा लक्ष्म्याः स्वर्णरूप्ये कृताकृते ॥८८॥ द्यूतं च वर्जयेत्तद्वै गवे चापि घृतार्थये । मद्यं पश्चान्निशायाश्च कुञ्जरैर्द्धनुभिः सह ॥८९॥ नमस्कारप्रदक्षिणैश्च ... पूजयेन्निशि । मार्गशीर्षे विप्रपूज्या स्वाङ्गोपेतैर्विधानतः ॥९०॥ बह्वल्पविहितैःस्नेहैर्होमदर्भाक्षतादिभिः । शस्तं साधे हि विप्रेन्द्रा पितृश्राद्धं तथाधिकम् ॥९१॥ अमायां सर्वताताव्युत्क्रमैस्तु यदधिकम् । फाल्गुने दैवसे श्राद्धं द्विजानां भोजनं तथा ॥९२॥ दानादि सर्वसाधुत्वं दर्शं सौम्यैकितं फलम् । इत्थं संक्षेपतः प्रोक्तं तिथिकृत्यं मुने मया ॥९३॥ सर्वत्रापि विधिश्चास्ति स पुराणान्तरे स्थितः ॥९४॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे द्वादशमासस्थित पूर्णिमास्य- -मावास्याव्रतकथनं नाम चतुर्विंशाधिकशततमोऽध्यायः ॥१२४॥


के व्रत को पृथक् रूप से सुनो, जो पितरों को अतिप्रिय है। चैत्र और वैशाख की अमावस्या में पितृपूजा करनी चाहिये। विधानानुसार पितरों का पार्वणश्राद्ध कर द्विजों को भोजन तथा गायें दे। चूंकि ये दोनों चीजें प्रत्येक अमावस्या में बहुत पुण्य देने वाली हैं। ज्येष्ठ की अमावस्या में सावित्रीव्रत किया जाता है। ज्येष्ठ-पूर्णिमा की तरह ही इसका भी विधान है। द्विज ! आषाढ़, श्रावण तथा भादों की अमावस्या में पितृश्राद्ध, दान, होम तथा देवार्चन करने से अनन्त फल होता है ॥८२-८४॥ भादों की अमावस्या के दिन अपराह्न में तिल के खेत में उत्पन्न हुए कुशों को "हुंफट्" इस मंत्र से उखाड़ कर रख छोड़ें। ये कुश सब काल सब कार्यों में काम आते हैं। आश्विन की अमावस्या को विशेष रूप से गंगाजी तथा गया क्षेत्र में किया जाने वाला पितरों का श्राद्ध-तर्पण मुक्तिदायक माना जाता है। कार्तिक की अमावस्या में देवालय, गृह, नदी, उपवन, तालाब, गाँव के प्रसिद्ध महावृक्ष, गोष्ठ तथा दुकान में दीप जला कर होम तथा चांदी की बनी लक्ष्मी की पूजा करे। उस दिन जूआ खेलना भी उपफल को देने वाला है। गौओं की भी पूजा की जानी चाहिए। उनके सींग आदि अंगों को रंग करवाय और अन्न खिलाना चाहिये। पश्चात् नमस्कार और प्रदक्षिणा करे ॥८५-९१॥ अगहन की अमावस्या में भी पितृपूजा की जाती है। उस दिन बहुस्वर्ण आदि विपुल, जप, होम, अर्चना तथा ब्राह्मण-भोजन के साथ श्राद्ध करना चाहिए। विप्र- वर्य ! पांच मास माघ की अमावस्या में पितृश्राद्ध करने से अधिक फल होता है। फाल्गुन की अमावस्या में श्रवण, व्यतीपात और सूर्य का योग होने पर सामान्य श्राद्ध और ब्राह्मणभोजन गया श्राद्ध से अधिक फल देने वाला है। सोमवती अमावस्या में दान आदि करने से प्रचुर फल मिलता है। मुने ! इस प्रकार संक्षेप में तिथियों का कृत्य मैंने तुमसे बताया है। समस्त तीथों में कुछ विशेष विधि है, जो अन्य पुराणों में वर्णित है ॥९२-९६॥ श्रीनारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में द्वादशमासस्थित पूर्णिमा अमावास्याव्रत कथन नामक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय समाप्त ॥१२४॥

पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः सूत उवाच इत्येवमुक्त्वा मुनिना हि पृष्टास्ते वै कुमाराः किल नारदेन । संपूजिताः शास्त्रविदां वरिष्ठाः कृताह्निका जग्मुरुमेशलोकम् ॥१॥ तत्रेशमग्र्यर्कनिभैर्मुनीन्द्रैः श्रीवामदेवादिभिरर्चितांघ्रिम् । सुरासुरेन्द्रैरभिवन्द्यमग्र्यं नत्वाज्ञया तस्य निषेदुरुर्व्याम् ॥२॥ श्रुत्वाथ तत्राखिलशास्त्रसारं शिवागमं ते पशुपाशमोक्षणम् । जग्मुस्ततो ज्ञानघनस्वरूपा नत्वा पुरारिं स्वपितुर्निकाशम् ॥३॥ तत्पादपद्मे प्रणतिं विधाय पित्रापि सत्कृत्य सभाजितास्ते । लब्ध्वाशिषोऽद्यापि चरन्ति शश्वल्लोकेषु तीर्थानि च तीर्थभूताः ॥४॥ जग्मुस्ततो वै बदरीवनान्ते सुरेन्द्रवर्गैश्च निषेव्यमानम् । बध्वाश्विरं विष्णुपदाब्जमव्ययं ध्यायन्ति यद्यतयो वीतरागाः ॥५॥ नारदोऽपि ततो विप्राः कुमारेभ्यः समीहितम् । लब्ध्वा ज्ञानं सविज्ञानं भृशं प्रीतमना ह्यभूत् ॥६॥ स तस्मात्स्वर्णदीतीरादागत्य पितुरन्तिके । प्रणम्य सत्कृतः पित्रा ब्रह्मणा न्यवसाद च ॥७॥ कुमारेभ्यः श्रुतं यच्च ज्ञानं विज्ञानसंयुतम् । वर्णयामास तत्त्वेन सोऽपि श्रुत्वा मुमोद च ॥८॥ अध्याय १२५ सनकादि और नारदजी का प्रस्थान, नारदपुराण का माहात्म्य-वर्णन सूत बोले-नारदमुनि से सम्मानपूर्वक पूछे जाने पर शास्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ कुमारवृन्द पूर्वोक्त प्रकार से वर्णन कर शिवलोक को चले गये । वहाँ सूर्य तथा अग्नि के समान तेजस्वी श्रीवामदेव आदि मुनियों से पूजित चरण वाले और सुरों एवम् असुरों से स्तुत होने वाले अतितेजस्वी शंकर को प्रणाम कर उनकी आज्ञा से भूमि पर बैठ गये । अनन्तर महादेव से अखिल शास्त्रों के सार तथा यमपाश से बचाने वाले शिवपुराण को सुनकर ज्ञानस्वरूप कुमारवृन्द त्रिपुरारि को प्रणाम कर अपने पितृलोक के लिये प्रस्थित हुए । वहाँ पिता के चरणकमलों में प्रणाम कर उनसे सस्नेह आशीर्वाद प्राप्त कर तीर्थ रूप कुमार त्रैलोक्य के तीर्थों की यात्रा करने लगे । वहीं से वे बदरिकाश्रम पहुँचे, जो देवेन्द्रवृन्दों से संसेवित है । बदरीवन में वे अविनाशी विष्णु के चरणारविन्दों का ध्यान करने लगे, जिनका संस्मरण वीतराग यतिगण किया करते हैं ॥१-५॥ विप्रवृन्द ! नारद भी कुमारों से अभिलषित ज्ञान-विज्ञान को प्राप्त कर अत्यन्त प्रसन्न हुए । तदनन्तर वे स्वर्गङ्गा के तीर से प्रस्थान कर पिता (ब्रह्मा) के समीप पहुँचे । उनको प्रणाम कर आज्ञानुसार बैठ गये और कुमारों से जो ज्ञान-विज्ञान प्राप्त किया था, उसका वर्णन करने लगे । ब्रह्मा भी सुनकर प्रमुदित हुए । अनन्तर १२४ ना० पु०

१८६ नारदीयपुराणम् अथ प्रणम्य शिरसा लब्धाशीर्मुनिसत्तमः । आजगाम च कैलासं मुनिसिद्धनिषेवितम् ॥८॥ नानावश्चर्यमयं शश्वत्सर्वर्तुकुसुमद्रुमैः । मंदारैः पारिजातैश्च चंपकाशोकबकुलैः ॥१०॥ अन्यैश्च विविधैवृक्षैर्नानापक्षिगणावृतैः । वातोद्धूतशिखैः पांथान् ह्वयद्भिरिवावृतम् ॥११॥ नानामृगगणाकीर्णं सिद्धकिन्नरसंकुलम् । सरौभिः स्वच्छललिलैल्लसत्कांचनपंकजैः ॥१२॥ शोभितं सारसैर्हंसैश्चक्राङ्गैश्चैवनादितम् । स्वर्द्धनीपातविद्युष्टं क्रीडद्भिश्चाप्सरोगणैः ॥१३॥ सलिलेऽनरुनंदायाः कुचकुंकुमपिंगले । आमोदमुदिनैर्नागैः सलिलैः पुष्करोद्धृतैः ॥१४॥ स्नापयद्भिः करेणूश्च कलभांश्च समाकुले । अथ श्वेताभ्रसदृशे शृंगे तस्य च भूभृतः ॥१५॥ वटं कालाभ्रसदृशं वदर्श शतयोजनम् । तस्याधस्तात्समासीनं योगिमण्डलमध्यगम् ॥१६॥ कपर्दिनं त्रिनयनं व्याघ्रचर्मावरावृतम् । भूतिभूषितसर्वांगं सर्पभूषणभूषितम् ॥१७॥ रुद्राक्षमालया शश्वच्छोभितं चंद्रशेखरम् । तं दृष्ट्वा नारदो विप्र! भक्तिकुञ्चितकंधरः ॥१८॥ ननाम शिरसा तस्य पादवोर्जगदीरितुः । ततः प्रसन्नमनसा स्तुत्वा वाग्भिर्वृषध्वजम् ॥१६॥ न्यष्यादाज्ञया स्थाणोः सत्कृतो योगिभिस्तदा । अथापृच्छत्तच्च कुशलं नारदं जगतां गुरुः ॥२०॥ स च प्राह प्रसादेन भवतः सर्वमस्ति मे । सर्वेषां योगिवर्याणां शृण्वतां तत्र षण्मुखः ॥२१॥ पप्रच्छ शांभवं ज्ञानं पशुप्राशविमोक्षणम् । स शिवः सादरं तस्य भक्त्या संतुष्टमानसः ॥२२॥ योगमष्टांगसंयुक्तं प्राह प्रणतवत्सलः । स लब्ध्वा शांभवं ज्ञानं शंकराल्लोकशंकरात् ॥२३॥

चतुरानन को प्रणाम कर आशीर्वाद पा मुनिश्रेष्ठ नारद मुनियों और सिद्धों से सुपेवित कैलास पर्वत पर चले गये, जहाँ अनेक आश्चर्यजनक वस्तुएं हैं । सब ऋतुओं में होने वाले पुष्प वहाँ सदा खिले रहते हैं । मंदार, पारिजात, चंपा, अशोक, मौलशिरी तथा अन्य विविध वृक्षों की शाखायें जब वायु में हिलती हैं तब ऐसा प्रतीत होता है कि वृक्ष पथिकों को बुला रहे हैं। वहाँ नाना प्रकार के पक्षी एवम् पशुओं के झुंड विचरण करते हैं। सिद्ध और किन्नर गण निवास करते हैं ॥६-१११॥ निर्मल जल वाले सरोवर स्वर्णिम कमलों तथा सारस, हंसों और चक्र- वाक आदि पक्षियों के कलरव से सुशोभित हैं, आकाशगंगा की धारा का कलकल निनाद होता रहता है, अलक- नंदा में अप्सरायें क्रीड़ा करती हैं, जिनका जल उन लोगों के कुचकुंकुम से पीला हो जाता है । हाथियों का समूह जलविहार से आमोद-प्रमोद करते और अपने-अपने सूंढों में पानी लेकर हथनियों एवम् बच्चों को नह- लाते हैं । उसी कैलाश पर्वत के श्वेत मेघ के समान धवल शिखर पर श्याम बादल के सदृश एक वट वृक्ष सौ योजनों में विस्तृत है । उसके नीचे त्रिनेत्र, व्याघ्रचर्मधारी, सर्परूपी आभूषणों से आभूषित, रुद्राक्षमाला से सदा सुशोभित, जटा धारण करने वाले और सर्वांग शरीर में विभूति रमाने वाले चंद्रशेखर शिव योगिमंडल के मध्य सभासीन थे ॥१२-१६॥ विप्रवर्य ! उन शंकर को देखकर भक्ति से नारद की ग्रीवा झुक गई । तब उन्होंने जगदीश के चरणों पर शिर रखकर प्रणाम किया और प्रसन्न मन से उनकी स्तुति की । अनन्तर योगियों से संमानित हो नारद शिव की आज्ञा से आसनासीन हुए । तब जगद्गुरु शंकर ने नारद से कुशल पूछा । 'सब आपकी कृपा से कुशल है'—यह नारद ने उत्तर दिया । इसके बाद समस्त योगिवर्यों के समक्ष नारद ने पशुप्राशविमोक्षण नामक शांकर ज्ञान के संबंध में जिज्ञासा प्रकट की । उनकी भक्ति से संतुष्ट हो प्रणतवत्सल शिव ने आदरपूर्वक अष्टांगयोग का उपदेश किया । तब लोगों के कल्याण करने वाले शंकर से शांकर ज्ञान प्राप्त कर सुप्रसन्न मन

पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ६८७ सुप्रसन्नमना नत्वा ययौ नारायणांतिकम् । तत्रापि नारदोऽभीक्ष्णं गतागतपरायणः ॥२४॥ सेवितं योगिभिः सिद्धैर्नारायणमतोषयत् । एतद्वः कीर्तितं विप्रा नारदीयं महत्कथा ॥२५॥ उपाख्यानं वेदसमं सर्वशास्त्रनिदर्शनम् । चतुष्पादसमायुक्तं शृण्वतां ज्ञानवर्द्धनम् ॥२६॥ य एतत्कीर्तयेद्विप्रा नारदीयं शिवालये । समाजे द्विजमुख्यानां तथा केशवमन्दिरे ॥२७॥ मथुरायां प्रयागे च पुरुषोत्तमसन्निधौ । सेतौ काञ्च्यां कुशस्थल्यां गंगाद्वारे कुशस्थले ॥२८॥ पुष्करेषु नदीतीरे यत्र कुत्रापि भक्तिमान् । स लभेत्सर्वयज्ञानां तीर्थानां च फलं महत् ॥२९॥ दानानां चापि सर्वेषां तपसां चाप्यशेषतः । उपवासपरो वापि हविष्याशी जितेंद्रियः ॥३०॥ श्रोता चैव तथा वक्ता नारायणपरायणः । शिवभक्तिरतो वापि शृण्वन् सिद्धिमवाप्नुयात् ॥३१॥ अस्मिन्नशेषपुण्यानां सिद्धीनां च समुद्भवः । कथितः सर्वपापघ्नः पठतां शृण्वतां सदा ॥३२॥ कलिदोषहरं पुंसां सर्वसंपत्तिवर्द्धनम् । सर्वेषामभीप्सितं चेदं सर्वज्ञानप्रकाशकम् ॥३३॥ शैवानां वैष्णवानां च शाक्तानां सूर्यसेविनाम् । तथैव गाणपत्यानां वर्णाश्रमवतां द्विजाः ॥३४॥ तपसां च व्रतानां च फलानां संप्रकाशकम् । मंत्राणां चैव यंत्राणां वेदानानां विभागशः ॥३५॥ तथागमानां सांख्यानां वेदानां चैव संग्रहम् । य एतत्पठते भक्त्या शृणुयाद्वा समाहितः ॥३६॥ स लभेद्वांछितान्कामान्देवादिखपि दुर्लभान् । श्रुत्वेदं नारदीयं तु पुराणं वेदनिरूपितम् ॥३७॥ वाचकं पूजयेद्भक्त्या धनरत्नांशुकादिभिः । भूमिदानैर्गवां दानै रत्नदानैश्च सर्वम् ॥३८॥ हस्त्यश्वस्थदानैश्च प्रीणयेत्सततं गुरुम् । यस्तु व्याकुरुते विप्राः पुराणं धर्मसंग्रहम् ॥३९॥ से उन्हें प्रणाम करके वे नारायण के समीप चले गये ॥१७-२३॥ वहाँ भी गमनागमन में समर्थ नारद ने योगियों एवम् सिद्धों से सुसेवित नारायण को संतुष्ट कर लिया । विप्रवृन्द ! यह नारदीय उपाख्यान, जो अखिल शास्त्रों का निदर्शन, चार पादों से युक्त, वेदतुल्य और श्रोता- [....]ढ़ाने वाला है, आप लोगों को सुना दिया । द्विजो ! जो भक्तिमान् मनुष्य इस नारदीय उपाख्या- ...वाले, उत्तम ब्राह्मणों के समाज, विष्णुमंदिर, मथुरा, प्रयाग, पुरुषोत्तम क्षेत्र, सेतु, कांची, द्वारका, हरिद्वार, कुशस्थल और पुष्कर में या जहाँ-कहीं भी नदी तट पर बांचता है, उसे निखिल यज्ञों, तीर्थों, दानों तथा तपों का महान् फल प्राप्त होता है । उपवास, हविष्य-भोजन तथा इंद्रियसंयम करते हुए नारायण या शिव के भक्त वक्ता तथा श्रोता सिद्धि को प्राप्त करते हैं । इस उपाख्यान में निखिल धर्मों तथा सिद्धियों की उत्पत्ति बताई गई है, जो पढ़ने तथा सुनने वालों के समस्त पापों का नाश करती है ॥२४-३२॥ यह उपा- ख्यान मनुष्यों के कलिजन्य दोषों का हरण करने वाला, सकल संपत्तियों को बढ़ाने वाला, निखिल ज्ञानों को प्रकाशित करने वाला और सब को अभीप्सित फल देने वाला है । द्विजगण ! यह शैव, वैष्णव, शाक्त, सूर्यसेवी, गणपति के उपासक, वर्णाश्रमी सभी को अभीष्ट है और यह समस्त ज्ञानों एवं तप तथा व्रतों के फलों का प्रका- शक है । इसमें मंत्रों, यन्त्रों, वेदांगों, आगमों, सांख्यों एवम् वेदों का संग्रह है । जो व्यक्ति सावधान होकर भक्ति- पूर्वक इसका पाठ या श्रवण करता है, वह देवदुर्लभ वांछित फलों को प्राप्त करता है । इस वेदानुकूल नारदीय- पुराण को सुनकर धन, रत्न, वस्त्र, आदि से भक्तिपूर्वक वाचक की पूजा करे । भूमिदान, गोदान, रत्नदान और हाथी, घोड़े तथा रथदान से गुरु को सदा संतुष्ट करना चाहिए । विप्रवृन्द ! जो इस चतुर्वर्ग के फल को देने

६८८ नारदीयपुराणम् चतुर्वर्गप्रदं नृणां कोन्वस्तत्समो गुरुः । कायेन मनसा वाचा धनाद्यैरपि संततम् ॥४०॥ प्रियं समाचरेत्तस्य गुरोर्द्धर्मोपदेशिनः । श्रुत्वा पुराणं विधिवद्धोमं कृत्वा सुरार्चनम् ॥४१॥ ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाच्छतं मिष्टान्नपायसैः । दक्षिणां प्रददेच्छक्त्या भक्त्या प्रीयेत माधवः ॥४२॥ यथा श्रेष्ठा नदी गंगा पुष्करं च सरो यथा । काशी पुरी नवं मेरुर्देवो नारायणो हरिः ॥४३॥ कृतं युगं सामवेदो धेनुर्विप्रोऽन्नमंबु च । मार्गा मृगेंद्रः पुक्षोऽश्वत्थः प्रह्लाद आननम् ॥४४॥ उच्चैःश्रवा वसंतश्च जपः शेषोऽर्यमा धनुः । पावको विष्णुरिंद्रश्च कपिलो वाक्पतिः कविः ॥४५॥ अर्जुनो हनुमान्धर्मश्चित्तं चित्ररथोऽम्बुजम् । उर्वशी कांचनं यद्वच्छ्रेष्ठाश्चैते स्वजातिषु ॥४६॥ तथैव नारदीयं तु पुराणेषु प्रकीर्तितम् । शांतिरस्तु शिवं चास्तु सर्वेषां वो द्विजोत्तमाः ॥४७॥ गमिष्यामि गुरोः पार्श्वं व्यासस्यामिततेजसः । इत्युक्त्वाभ्यर्चितः सूतः शौनकाद्यैर्महात्मभिः ॥४८॥ आपृष्टश्च पुनः सर्वैर्दर्शनार्थं गुरोर्ययौ । तेऽपि सर्वे द्विजश्रेष्ठाः शौनकाद्याः समाहिताः ॥४९॥ श्रुतं सम्यगनुष्ठाय तत्र तस्थुश्च सत्रिणः ॥४९॥ कलिकल्मषविषनाशनं हरिं यो जपपूजनविधिमेवजोषसेवी । स तु निर्विषमनसा समेत्य यागं लभते सततप्रभीप्सितं हि लोकम् ॥५०॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे पुराणसंहितावर्णनं नाम पंचविंशोत्तरशततमोऽध्यायः ॥१२५॥ वाले धर्मसंग्रहभूत पुराण का उपदेश करता है, उसके समान अन्य कोई गुरु नहीं होता ! शरीर, मन, वाणी तथा धन आदि से प्रिय आचरण करना चाहिए ॥३३-४०३॥ पुराणश्रवणानन्तर विधिवूवर्क हवन तथा देवार्चन करके सौ ब्राह्मणों को मधुर तथा खीर खिलाये। पश्चात् उन्हें भक्तिपूर्वक दक्षिणा दे; क्योंकि भक्ति से माधव प्रसन्न होते हैं। जैसे नदियों में गंगा, सरोवरों में पुष्कर, पुरियों में काशी, पर्वतों में मेरु, देवों में नारायण, युगों में सत्ययुग, वेदों में सामवेद और अपनी अपनी जातियों में धेनु, विप्र, अन्न, जल, योग, सिंह, सारस, हंसों में प्रह्लाद, मुख, उच्चैःश्रवा, वसंत, जप, अनंतशेष, अर्यमा, धनु, पावक, विष्णु, इंद्र, कपिल, बृहस्पतिः होता रहता है, हनुमान्, कुश, चित्त, चित्ररथ, कमल, उर्वशी तथा सुवर्ण श्रेष्ठ हैं, उसी तरह समस्त पुराणों में नारदीयपुराण श्रेष्ठ है। द्विजवर्यवृन्द ! आप लोगों का कल्याण हो, शान्ति मिले ! अब मैं अमिततेजस्वी गुरु व्यास के समीप जाऊँगा ।४१-४७३॥ इतना कहकर, महात्मा शौनक आदि से संमानित हो, पुनः उनसे विदा ले, गुरु के दर्शनार्थ सूतजी चले गये । शौनक आदि द्विजवर भी सावधान होकर सुने हुए पुराण के अनुसार यज्ञानुष्ठान में प्रवृत्त हुए। जो व्यक्ति कलि-पातक रूप विष को नष्ट करने वाले हरि के जप-पूजन रूप ओषधि का सेवन करता है, वह विष (पाप) रहित मन से सतत याग (के पुण्य) को प्राप्त कर मनोवांछित लोक को जाता है ॥४८-५०॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में पुराण-महिमा-वर्णन नामक एकसौ पच्चीसवां अध्याय समाप्त ॥१२५॥ (नारदीयपुराण का पूर्वभाग समाप्त)

हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा प्रकाशित पुराण साहित्य • (मूल-पाठ, हिन्दी अनुवाद एवं पाठान्तर सहित) १. ब्रह्मपुराणम् अनुवादक—श्री तारिणीश झा १५०.०० २. ब्रह्मवैवर्तपुराणम् [१, २, ३] अनुवादक—श्री तारिणीश झा २६०.०० ३. अग्निपुराणम् [१, २] अनुवादक—श्री तारिणीश झा १५०.०० ४. वायुपुराणम् अनुवादक—पं० रामप्रताप त्रिपाठी, शास्त्री १२०.०० मुद्रणाधीन १. बृहन्नारदीयपुराणम् (उत्तर भाग:) २. मत्स्यपुराणम् (पूर्व भाग:) • प्रकाशक हिन्दी साहित्य सम्मेलन ⊙ प्रयाग १२, सम्मेलन मार्ग ० इलाहाबाद