बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचैत्रवैशाखयोस्तत्त्वं वक्ष्ये विप्रवरेप्सितम् । पार्व्वणं ... पितॄणां तृप्तिकारकम् ॥८१॥ द्विजानां भोजनं दानं गवां चैव प्रकीर्तितम् । सर्वदा सर्वतीर्थेषु यत्पुण्यं चापरं महत् ॥८२॥ ज्येष्ठेऽमायां व्रतं प्रोक्तं सावित्र्याः कस्य कारणम् । विधानं ज्येष्ठपूर्णावद्विधानं परिकीर्तितम् ॥८३॥ शुचौ नभसि भाद्रे च कार्यं पूर्वोदितं द्विज । पितृश्राद्धं ... दानं होमं सुरार्चनम् ॥८४॥ भाद्रस्यापरपक्षे तु तिलक्षेत्रसमुद्भवम् । विरिश्चिना समुत्पन्नं कुशैर्च्छिन्नं हुंकारबीजतः ॥८५॥ सर्वदा सर्वकार्येषु ... योजयेत्कुशसंचयम् । इषामृतौ विशेषेण पितॄणां मुक्तिदायकम् ॥८६॥ विधेयं जाह्नवीतोये मुनिश्रेष्ठ न संशयः । कार्तिकाने दीपान् देवालयादिषु ॥८७॥ नदीनदतडागेषु चैत्यगोष्ठापणेषु च । लक्ष्मीनं तथा लक्ष्म्याः स्वर्णरूप्ये कृताकृते ॥८८॥ द्यूतं च वर्जयेत्तद्वै गवे चापि घृतार्थये । मद्यं पश्चान्निशायाश्च कुञ्जरैर्द्धनुभिः सह ॥८९॥ नमस्कारप्रदक्षिणैश्च ... पूजयेन्निशि । मार्गशीर्षे विप्रपूज्या स्वाङ्गोपेतैर्विधानतः ॥९०॥ बह्वल्पविहितैःस्नेहैर्होमदर्भाक्षतादिभिः । शस्तं साधे हि विप्रेन्द्रा पितृश्राद्धं तथाधिकम् ॥९१॥ अमायां सर्वताताव्युत्क्रमैस्तु यदधिकम् । फाल्गुने दैवसे श्राद्धं द्विजानां भोजनं तथा ॥९२॥ दानादि सर्वसाधुत्वं दर्शं सौम्यैकितं फलम् । इत्थं संक्षेपतः प्रोक्तं तिथिकृत्यं मुने मया ॥९३॥ सर्वत्रापि विधिश्चास्ति स पुराणान्तरे स्थितः ॥९४॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे द्वादशमासस्थित पूर्णिमास्य- -मावास्याव्रतकथनं नाम चतुर्विंशाधिकशततमोऽध्यायः ॥१२४॥
के व्रत को पृथक् रूप से सुनो, जो पितरों को अतिप्रिय है। चैत्र और वैशाख की अमावस्या में पितृपूजा करनी चाहिये। विधानानुसार पितरों का पार्वणश्राद्ध कर द्विजों को भोजन तथा गायें दे। चूंकि ये दोनों चीजें प्रत्येक अमावस्या में बहुत पुण्य देने वाली हैं। ज्येष्ठ की अमावस्या में सावित्रीव्रत किया जाता है। ज्येष्ठ-पूर्णिमा की तरह ही इसका भी विधान है। द्विज ! आषाढ़, श्रावण तथा भादों की अमावस्या में पितृश्राद्ध, दान, होम तथा देवार्चन करने से अनन्त फल होता है ॥८२-८४॥ भादों की अमावस्या के दिन अपराह्न में तिल के खेत में उत्पन्न हुए कुशों को "हुंफट्" इस मंत्र से उखाड़ कर रख छोड़ें। ये कुश सब काल सब कार्यों में काम आते हैं। आश्विन की अमावस्या को विशेष रूप से गंगाजी तथा गया क्षेत्र में किया जाने वाला पितरों का श्राद्ध-तर्पण मुक्तिदायक माना जाता है। कार्तिक की अमावस्या में देवालय, गृह, नदी, उपवन, तालाब, गाँव के प्रसिद्ध महावृक्ष, गोष्ठ तथा दुकान में दीप जला कर होम तथा चांदी की बनी लक्ष्मी की पूजा करे। उस दिन जूआ खेलना भी उपफल को देने वाला है। गौओं की भी पूजा की जानी चाहिए। उनके सींग आदि अंगों को रंग करवाय और अन्न खिलाना चाहिये। पश्चात् नमस्कार और प्रदक्षिणा करे ॥८५-९१॥ अगहन की अमावस्या में भी पितृपूजा की जाती है। उस दिन बहुस्वर्ण आदि विपुल, जप, होम, अर्चना तथा ब्राह्मण-भोजन के साथ श्राद्ध करना चाहिए। विप्र- वर्य ! पांच मास माघ की अमावस्या में पितृश्राद्ध करने से अधिक फल होता है। फाल्गुन की अमावस्या में श्रवण, व्यतीपात और सूर्य का योग होने पर सामान्य श्राद्ध और ब्राह्मणभोजन गया श्राद्ध से अधिक फल देने वाला है। सोमवती अमावस्या में दान आदि करने से प्रचुर फल मिलता है। मुने ! इस प्रकार संक्षेप में तिथियों का कृत्य मैंने तुमसे बताया है। समस्त तीथों में कुछ विशेष विधि है, जो अन्य पुराणों में वर्णित है ॥९२-९६॥ श्रीनारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में द्वादशमासस्थित पूर्णिमा अमावास्याव्रत कथन नामक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय समाप्त ॥१२४॥