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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 1004, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 1004

पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः सूत उवाच इत्येवमुक्त्वा मुनिना हि पृष्टास्ते वै कुमाराः किल नारदेन । संपूजिताः शास्त्रविदां वरिष्ठाः कृताह्निका जग्मुरुमेशलोकम् ॥१॥ तत्रेशमग्र्यर्कनिभैर्मुनीन्द्रैः श्रीवामदेवादिभिरर्चितांघ्रिम् । सुरासुरेन्द्रैरभिवन्द्यमग्र्यं नत्वाज्ञया तस्य निषेदुरुर्व्याम् ॥२॥ श्रुत्वाथ तत्राखिलशास्त्रसारं शिवागमं ते पशुपाशमोक्षणम् । जग्मुस्ततो ज्ञानघनस्वरूपा नत्वा पुरारिं स्वपितुर्निकाशम् ॥३॥ तत्पादपद्मे प्रणतिं विधाय पित्रापि सत्कृत्य सभाजितास्ते । लब्ध्वाशिषोऽद्यापि चरन्ति शश्वल्लोकेषु तीर्थानि च तीर्थभूताः ॥४॥ जग्मुस्ततो वै बदरीवनान्ते सुरेन्द्रवर्गैश्च निषेव्यमानम् । बध्वाश्विरं विष्णुपदाब्जमव्ययं ध्यायन्ति यद्यतयो वीतरागाः ॥५॥ नारदोऽपि ततो विप्राः कुमारेभ्यः समीहितम् । लब्ध्वा ज्ञानं सविज्ञानं भृशं प्रीतमना ह्यभूत् ॥६॥ स तस्मात्स्वर्णदीतीरादागत्य पितुरन्तिके । प्रणम्य सत्कृतः पित्रा ब्रह्मणा न्यवसाद च ॥७॥ कुमारेभ्यः श्रुतं यच्च ज्ञानं विज्ञानसंयुतम् । वर्णयामास तत्त्वेन सोऽपि श्रुत्वा मुमोद च ॥८॥ अध्याय १२५ सनकादि और नारदजी का प्रस्थान, नारदपुराण का माहात्म्य-वर्णन सूत बोले-नारदमुनि से सम्मानपूर्वक पूछे जाने पर शास्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ कुमारवृन्द पूर्वोक्त प्रकार से वर्णन कर शिवलोक को चले गये । वहाँ सूर्य तथा अग्नि के समान तेजस्वी श्रीवामदेव आदि मुनियों से पूजित चरण वाले और सुरों एवम् असुरों से स्तुत होने वाले अतितेजस्वी शंकर को प्रणाम कर उनकी आज्ञा से भूमि पर बैठ गये । अनन्तर महादेव से अखिल शास्त्रों के सार तथा यमपाश से बचाने वाले शिवपुराण को सुनकर ज्ञानस्वरूप कुमारवृन्द त्रिपुरारि को प्रणाम कर अपने पितृलोक के लिये प्रस्थित हुए । वहाँ पिता के चरणकमलों में प्रणाम कर उनसे सस्नेह आशीर्वाद प्राप्त कर तीर्थ रूप कुमार त्रैलोक्य के तीर्थों की यात्रा करने लगे । वहीं से वे बदरिकाश्रम पहुँचे, जो देवेन्द्रवृन्दों से संसेवित है । बदरीवन में वे अविनाशी विष्णु के चरणारविन्दों का ध्यान करने लगे, जिनका संस्मरण वीतराग यतिगण किया करते हैं ॥१-५॥ विप्रवृन्द ! नारद भी कुमारों से अभिलषित ज्ञान-विज्ञान को प्राप्त कर अत्यन्त प्रसन्न हुए । तदनन्तर वे स्वर्गङ्गा के तीर से प्रस्थान कर पिता (ब्रह्मा) के समीप पहुँचे । उनको प्रणाम कर आज्ञानुसार बैठ गये और कुमारों से जो ज्ञान-विज्ञान प्राप्त किया था, उसका वर्णन करने लगे । ब्रह्मा भी सुनकर प्रमुदित हुए । अनन्तर १२४ ना० पु०