सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 1005, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1005

१८६ नारदीयपुराणम् अथ प्रणम्य शिरसा लब्धाशीर्मुनिसत्तमः । आजगाम च कैलासं मुनिसिद्धनिषेवितम् ॥८॥ नानावश्चर्यमयं शश्वत्सर्वर्तुकुसुमद्रुमैः । मंदारैः पारिजातैश्च चंपकाशोकबकुलैः ॥१०॥ अन्यैश्च विविधैवृक्षैर्नानापक्षिगणावृतैः । वातोद्धूतशिखैः पांथान् ह्वयद्भिरिवावृतम् ॥११॥ नानामृगगणाकीर्णं सिद्धकिन्नरसंकुलम् । सरौभिः स्वच्छललिलैल्लसत्कांचनपंकजैः ॥१२॥ शोभितं सारसैर्हंसैश्चक्राङ्गैश्चैवनादितम् । स्वर्द्धनीपातविद्युष्टं क्रीडद्भिश्चाप्सरोगणैः ॥१३॥ सलिलेऽनरुनंदायाः कुचकुंकुमपिंगले । आमोदमुदिनैर्नागैः सलिलैः पुष्करोद्धृतैः ॥१४॥ स्नापयद्भिः करेणूश्च कलभांश्च समाकुले । अथ श्वेताभ्रसदृशे शृंगे तस्य च भूभृतः ॥१५॥ वटं कालाभ्रसदृशं वदर्श शतयोजनम् । तस्याधस्तात्समासीनं योगिमण्डलमध्यगम् ॥१६॥ कपर्दिनं त्रिनयनं व्याघ्रचर्मावरावृतम् । भूतिभूषितसर्वांगं सर्पभूषणभूषितम् ॥१७॥ रुद्राक्षमालया शश्वच्छोभितं चंद्रशेखरम् । तं दृष्ट्वा नारदो विप्र! भक्तिकुञ्चितकंधरः ॥१८॥ ननाम शिरसा तस्य पादवोर्जगदीरितुः । ततः प्रसन्नमनसा स्तुत्वा वाग्भिर्वृषध्वजम् ॥१६॥ न्यष्यादाज्ञया स्थाणोः सत्कृतो योगिभिस्तदा । अथापृच्छत्तच्च कुशलं नारदं जगतां गुरुः ॥२०॥ स च प्राह प्रसादेन भवतः सर्वमस्ति मे । सर्वेषां योगिवर्याणां शृण्वतां तत्र षण्मुखः ॥२१॥ पप्रच्छ शांभवं ज्ञानं पशुप्राशविमोक्षणम् । स शिवः सादरं तस्य भक्त्या संतुष्टमानसः ॥२२॥ योगमष्टांगसंयुक्तं प्राह प्रणतवत्सलः । स लब्ध्वा शांभवं ज्ञानं शंकराल्लोकशंकरात् ॥२३॥

चतुरानन को प्रणाम कर आशीर्वाद पा मुनिश्रेष्ठ नारद मुनियों और सिद्धों से सुपेवित कैलास पर्वत पर चले गये, जहाँ अनेक आश्चर्यजनक वस्तुएं हैं । सब ऋतुओं में होने वाले पुष्प वहाँ सदा खिले रहते हैं । मंदार, पारिजात, चंपा, अशोक, मौलशिरी तथा अन्य विविध वृक्षों की शाखायें जब वायु में हिलती हैं तब ऐसा प्रतीत होता है कि वृक्ष पथिकों को बुला रहे हैं। वहाँ नाना प्रकार के पक्षी एवम् पशुओं के झुंड विचरण करते हैं। सिद्ध और किन्नर गण निवास करते हैं ॥६-१११॥ निर्मल जल वाले सरोवर स्वर्णिम कमलों तथा सारस, हंसों और चक्र- वाक आदि पक्षियों के कलरव से सुशोभित हैं, आकाशगंगा की धारा का कलकल निनाद होता रहता है, अलक- नंदा में अप्सरायें क्रीड़ा करती हैं, जिनका जल उन लोगों के कुचकुंकुम से पीला हो जाता है । हाथियों का समूह जलविहार से आमोद-प्रमोद करते और अपने-अपने सूंढों में पानी लेकर हथनियों एवम् बच्चों को नह- लाते हैं । उसी कैलाश पर्वत के श्वेत मेघ के समान धवल शिखर पर श्याम बादल के सदृश एक वट वृक्ष सौ योजनों में विस्तृत है । उसके नीचे त्रिनेत्र, व्याघ्रचर्मधारी, सर्परूपी आभूषणों से आभूषित, रुद्राक्षमाला से सदा सुशोभित, जटा धारण करने वाले और सर्वांग शरीर में विभूति रमाने वाले चंद्रशेखर शिव योगिमंडल के मध्य सभासीन थे ॥१२-१६॥ विप्रवर्य ! उन शंकर को देखकर भक्ति से नारद की ग्रीवा झुक गई । तब उन्होंने जगदीश के चरणों पर शिर रखकर प्रणाम किया और प्रसन्न मन से उनकी स्तुति की । अनन्तर योगियों से संमानित हो नारद शिव की आज्ञा से आसनासीन हुए । तब जगद्गुरु शंकर ने नारद से कुशल पूछा । 'सब आपकी कृपा से कुशल है'—यह नारद ने उत्तर दिया । इसके बाद समस्त योगिवर्यों के समक्ष नारद ने पशुप्राशविमोक्षण नामक शांकर ज्ञान के संबंध में जिज्ञासा प्रकट की । उनकी भक्ति से संतुष्ट हो प्रणतवत्सल शिव ने आदरपूर्वक अष्टांगयोग का उपदेश किया । तब लोगों के कल्याण करने वाले शंकर से शांकर ज्ञान प्राप्त कर सुप्रसन्न मन

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 1005, कुल 1008 में से · BharatKosha