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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

नमोऽस्तु सूर्याद्यमितप्रभाय नमो नमः पुण्यकथागताय ॥७५॥

७५ दशमोऽध्यायः नमो नमः कारणवामनाय नारायणायामितविक्रमाय । सशार्ङ्गचक्रासिगदाधराय नमोऽस्तु तस्मै पुरुषोत्तमाय ॥७४॥ नमः पथोराशिनिवासनाय नमोऽस्तु सद्धृत्कमलस्थिताय । नमोऽस्तु सूर्याद्यमितप्रभाय नमो नमः पुण्यकथागताय ॥७५॥ नमो नमोऽर्केन्दुविलोचनाय नमोऽस्तु ते यज्ञफलप्रदाय । नमोऽस्तु यज्ञाङ्गविराजिताय नमोऽस्तु ते सज्जनवल्लभाय ॥७६॥ नमो जगत्कारणकारणाय नमोस्तु शब्दादिविवर्जिताय । नमोऽस्तु ते दिव्यसुखप्रदाय नमो नमो भक्तमनोगताय ॥७७॥ नमोऽस्तु ते ध्वान्तविनाशकाय नमोऽस्तु ते मन्दरधारकाय । नमोऽस्तु ते यज्ञवराहनाम्ने नमो हिरण्याक्षविदारकाय ॥७८॥ नमोऽस्तु ते वामनरूपभाजे नमोऽस्तु ते क्षत्रकुलान्तकाय । नमोऽस्तु ते रावणमर्दनाय नमोऽस्तु ते नन्दसुताग्रजाय ॥७९॥ नमस्ते कमलाकान्त नमस्ते सुखदायिने । स्मृतार्तिनाशिने तुभ्यं भूयो भूयो नमो नमः ॥८०॥ यज्ञेश यज्ञविन्यास यज्ञविघ्नविनाशन । यज्ञरूप यज्ञद्रूप यज्ञाङ्ग त्वां यजाम्यहम् ॥८१॥ इति स्तुतः स देवेशो वामनो लोकपावनः । उवाच प्रहसन्हर्षं वर्द्धयन्कश्यपस्य सः ॥८२॥ श्रीभगवानुवाच तात तुष्टोऽस्मि भद्रं ते भविष्यति सुरार्चित ! । अचिरात्साधयिष्यामि निखिलं त्वन्मनोरथम् ॥८३॥


देने वाले को नमस्कार है । दुष्ट जनों के नाश करने वाले को बार-बार नमस्कार है। जगदीश्वर को नमस्कार करते हैं । जगत् के आदि कारण वामन को नमस्कार करते हैं । अमित विक्रम शील नारायण को नमस्कार है । धनुष के सहित चक्र, खङ्ग और गदा के धारण करने वाले को नमस्कार है । उस पुरुषोत्तम को नमस्कार है । ॥७४॥ अगाध जल राशि में निवास करने वाले को नमस्कार है । सज्जनों के हृदय-कमल में निवास करने वाले को नमस्कार है । सूर्य से भी अधिक प्रभावान् को नमस्कार है । पुण्य कथा स्थान पर सर्वदा निवास करने वाले को हमारा नमस्कार है । सूर्य और चन्द्र रूपी नेत्र वाले को नमस्कार करते हैं । यज्ञ फल को देने वाले तुमको हमारे असंख्य नमस्कार हैं । यज्ञांग से सुशोभित और सज्जनों के प्रिय को हम नमस्कार करते हैं । जगत् के आदि कारण के भी कारण को नमस्कार है । शब्दादि विषयों के अविष्य को नमस्कार है । स्वर्गीय सुखों के देने वाले तुमको हमारा नमस्कार है । भक्तों के मन में रहने वाले को नमस्कार है । अज्ञान तिमिर का नाश करने वाले तुमको नमस्कार है । मन्दराचल को धारण करने वाले कूर्म को नमस्कार है । यज्ञ वराह नाम से प्रसिद्ध, हिरण्याक्ष को विदीर्ण करने वाले को नमस्कार है ॥७२-७८॥ वामन रूप धारण करने वाले, क्षत्रिय कुल के विनाशक को नमस्कार है । रावण का मर्दन करने वाले को नमस्कार है । नन्द के पुत्र कृष्ण के अग्रज बलराम को नमस्कार है । कमलाकान्त ! तुमको नमस्कार है । सुखदाता को नमस्कार है । स्मरण मात्र से दुःखों को दूर कर देने वाले तुमको बार-बार नमस्कार है । यज्ञेश ! यज्ञविन्यास ! यज्ञविघ्नहर ! यज्ञरूप ! यज्ञविधि ! यज्ञांग ! तुम्हारी हम वन्दना कर रहे हैं । इस प्रकार कश्यप ने लोक पावन देवेश वामन की स्तुति की । यह सुनकर कश्यप के आनन्द को और बढ़ाते हुए वामन ने हंसकर कहा ॥७६-८२॥ श्री भगवान् बोले—तात ! मैं प्रसन्न हूँ, सुर पूजित ! आपका कल्याण होगा, आपके सब मनोरथों को

७६ नारदीयपुराणम् अहं जन्मद्वये त्वेवं युवयोः पुत्रतां गतः । अस्मिञ्जन्मन्यपि तथा साधयाम्युत्तमं सुखम् ॥८४॥ अत्रान्तरे बलिर्दैत्यो दीर्घसत्रं महामखम् । आरभे गुरुणा युक्तः काव्येन च मुनीश्वरैः ॥८५॥ तस्मिन्मखे समाहूतो विष्णुर्लक्ष्मीसमन्वितः । हविः स्वीकरणार्थाय ऋषिभिर्ब्रह्मवादिभिः ॥८६॥ प्रवृद्धैश्वर्यदैत्यस्य वर्त्तमाने महाक्रतौ । आमंत्र्य मातापितरौ स वटुर्वामनो ययौ ॥८७॥ स्मितेन मोहयँल्लोकं वामनो भक्तवत्सलः । हविर्भोक्तुमिवायातो बलेः प्रत्यक्षतो हरिः ॥८८॥ दुर्वृत्तो वा सुवृत्तो वा जडो वा पण्डितोऽपि वा । यो भक्तियुक्तस्तस्यान्तः सदा संनिहितो हरिः ॥८९॥ आयान्तं वामनं दृष्ट्वा ऋषयो ज्ञानचक्षुषः । ज्ञात्वा नारायणं देवमुद्ययुः सभ्यसंयुताः ॥९०॥ एतज्ज्ञात्वा दैत्यगुरुरेकांते बलिमब्रवीत् । स्वसारमविचार्यैव खलाः कार्याणि कुर्वते ॥९१॥ शुक्र उवाच भो भो दैत्यपते सौम्य ह्यपहर्त्ता तव श्रियम् । विष्णुर्वामनरूपेण ह्यदितेः पुत्रतां गतः ॥९२॥ तवाध्वरं स आयाति त्वया तस्यासुरेश्वर । न किंचिदपि दातव्यं मन्मतं शृणु पण्डित ॥९३॥ आत्मबुद्धिः सुखकरी गुरुबुद्धिर्विशेषतः । परबुद्धिर्विनाशाय स्त्रीबुद्धिः प्रलयंकरी ॥९४॥ शत्रूणां हितकृद्य॑स्तु स हन्तव्यो विशेषतः ॥९५॥ बलिरुवाच एवं गुरो न वक्तव्यं धर्ममार्गविरोधतः । यदादत्ते स्वयं विष्णुः किमस्मादधिकं वरम् ॥९६॥ कुर्वन्ति विदुषो यज्ञान्विष्णुप्रीणनकारणात् । स चेत्साक्षाद्धविर्भागी मत्तः कोऽप्यधिको भुवि ॥९७॥ मैं पूरा करूँगा। मैं इस प्रकार और दो जन्मों में आपका पुत्र बन चुका हूँ। इस जन्म में भी पूर्व की ही भाँति आपको उत्तम सुख प्रदान करूँगा। इसी बीच दैत्यराज बलि ने गुरु शुक्र और महामुनियों की सहायता से अधिक दिनों तक चलने वाला महायज्ञ प्रारम्भ किया। उस यज्ञ में लक्ष्मी के सहित विष्णु भी हवि ग्रहण करने के लिए ब्रह्मवादी ऋषियों द्वारा आवादित थे। अनेकों ऐश्वर्य-शाली राक्षसों से भरे हुए उस यज्ञ में माता-पिता की अनु- मति लेकर वटु वामन भी गये ॥८७॥ उस भक्तवत्सल वटु के मन्द हास्य से संसार मोहित हो गया। मानों बलि की हवि ग्रहण करने के लिए हरि स्वयं ही वहाँ आ गए। दुराचारी, सदाचारी, मूर्ख अथवा पंडित जो कोई भी हो उसको, भक्ति को देखकर भगवान् सर्वदा उसके समीप उपस्थित रहते हैं। ज्ञान-चक्षु ऋषियों ने साक्षात् नारायण को वामन रूप में वहाँ आते देखकर बड़े सम्मान के साथ उनका सत्कार किया। दैत्य-गुरु शुक्र इस रहस्य को ताड़ गए, उन्होंने एकान्त में बलि से कहा, क्योंकि दुष्ट जन अपनी शक्ति को समझे बिना ही कार्य करते हैं । ॥८८-९१॥ शुक्र बोले- दैत्यपते ! सौम्य ! तुम्हारी सम्पत्ति को अपहरण करने वाले विष्णु वामन के रूप में अदिति के पुत्र हुए हैं। असुरेश्वर ! वही तुम्हारे यज्ञ में आ रहे हैं, परन्तु उनको कुछ भी न देना। पंडित ! मेरे सुझाव को सुनो, अपना विवेक सुखकर होता है, किन्तु गुरु का उपदेश और भी कल्याणप्रद होता है। दूसरे की बुद्धि से काम करने वाला विनष्ट होता है और स्त्री की बुद्धि तो प्रलय मचा देती है। जो शत्रुओं का हितैषी हो उसे विशेष रूप से मारना चाहिए ॥९२-९५॥ बलि बोला- गुरुदेव ! इस प्रकार स्वयं आप धर्म विरोधी चर्चा न करें। स्वयं विष्णु यदि मेरे अतिथि या याचक बनें तो इससे बढ़कर दूसरा क्या वर या श्रेय हो सकता है। विद्वान् विष्णु की प्रसन्नता के लिए ही

७७ दशमोऽध्यायः दरिद्रेणापि यत्किंचिद्दीयते विष्णवे गुरो । तदेव परमं दानं दत्तं भवति चाक्षयम् ॥९८॥ स्मृतोऽपि परया भक्त्या पुनाति पुरुषोत्तमः । येन केनाप्यर्चितश्चेद्ददाति परमां गतिम् ॥९९॥ हरिर्हरति पापानि दुष्टचित्तैरपि स्मृतः । अनिच्छयापि संस्पृष्टो दहत्येव हि पावकः ॥१००॥ जिह्वाग्रे वसते यस्य हरिरित्यक्षरद्वयम् । स विष्णुलोकमाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥१०१॥ गोविन्देति सदा ध्यायेद्यस्तु रागातिवर्जितः । स याति विष्णुभवनमिति प्राहुर्मनीषिणः ॥१०२। अग्नौ वा ब्राह्मणे वापि हूयते यद्धविर्गु रो ! । हरिभक्त्या महाभाग तेन विष्णुः प्रसीदति ॥१०३॥ अहं तु हरितुष्ट्यर्थं करोम्यध्वरमुत्तमम् । स्वयमायाति चेद्विष्णुः कृतार्थोऽस्मि न संशयः ॥१०४॥ एवं वदति दैत्येन्द्रे विष्णुर्वामनरूपधृक् । प्रविवेशाध्वरस्थानं हुतवह्निमनोरमम् ॥१०५॥ तं दृष्ट्वा कोटिसूर्याभं योग्यावयवसुन्दरम् । वामनं सहसोत्थाय प्रत्यगृह्णात्कृताञ्जलिः ॥१०६॥ दत्त्वाऽसनं च प्रक्षाल्य पादौ वामनरूपिणम् । सकुटुम्बो वहन्मूर्ध्ना परमां मुदमाप्तवान् ॥१०७॥ विष्णवेऽस्मै जगद्धाम्ने दत्त्वाऽर्घ्यं विधिवद्बलिः । रोमाञ्चिततनुर्भूत्वा हर्षाश्रुनयनोऽब्रवीत् ॥१०८॥ बलिरुवाच अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे सफलो मखः । जीवितं सफलं मेऽद्य कृतार्थोऽस्मि न संशयः ॥१०८½॥ अमोघामृतवृष्टिर्मे समायातातिदुर्लभा । त्वदागमनमात्रेण ह्यनायासो महोत्सवः ॥११०॥ एते च ऋषयः सर्वे कृतार्था नात्र संशयः । यैः पूर्वं हि तपस्तप्तं तदद्य सफलं प्रभो ॥१११॥

यज्ञ करते हैं । यदि मेरे यज्ञ में वही साक्षात् हवि के भोक्ता बन जायें तो मुझसे बढ़कर संसार में और दूसरा कौन भाग्यवान् होगा ? दरिद्र भी जो कुछ गुरु विष्णु को देता है वही परम दान है, वही अक्षय होता है । अनन्य भाव से स्मरण करने पर भी पुरुषोत्तम लोगों को पवित्र करते हैं। चाहे कोई किसी प्रकार से भगवान् की पूजा करे उसे हरि अवश्य परमगति देते हैं ॥९६-९९॥ दुष्ट चित्त लोगों के स्मरण करने पर भी हरि उनके पापों को दूर कर देते हैं, क्योंकि बिना इच्छा के भी छू देने पर अग्नि जला ही देती है । जिसकी जिह्वा पर दो अक्षरों का हरि-नाम सदा वास करता है, वह उस विष्णुलोक को प्राप्त करता है जहां से पुनः लौटना नहीं पड़ता । जो राग-द्वेष दूर रह कर गोविन्द का ध्यान करता है वह विष्णु-भवन को प्राप्त करता है, ऐसा मनीषी कहते हैं । गुरुदेव ! अग्नि या ब्राह्मण के मुख में जो हवि भगवद्-भक्ति पूर्वक दी जाती है, उससे भगवान् अत्यन्त प्रसन्न होते हैं ॥१००-१०३॥ मैं तो केवल भगवत्-प्रीति के लिए ही उस उत्तम यज्ञ को कर रहा हूँ। यदि विष्णु स्वयं मेरे यज्ञ में आ रहे हैं। तब तो मैं कृतार्थ हो गया, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं ! इस प्रकार दैत्यपति बलि की गुरु जी से वार्ता हो रही थी कि इतने में प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी वामन रूप धारी विष्णु यज्ञमण्डप में चले आये । करोड़ों सूर्य के समान तेजस्वी वामन के परम मनोहर रूप को देखकर बलि बड़ी शीघ्रता से उठकर हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और आसन पर बैठाकर भगवान् वामन के चरणों को धोया, भगवान् के चरणोदक को कुटुम्ब सहित अपने शिर पर चढ़ा परम आनन्द प्राप्त किया । तत्पश्चात् विधि पूर्वक जगद्धाम विष्णु को अर्घ्य प्रदान कर आनन्द-मग्न हो गया । उसके नेत्रों से आनन्द के आंसू बहने लगे और रोमाञ्च हो आया । किसी प्रकार अपने को सम्हाल कर बोला ॥१०४-१०८॥ आज मेरा जन्म सफल हो गया, आज मेरा यज्ञ सफल हो गया, मेरा जीवन सफल हो गया और मैं कृतार्थ हो गया, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं । अति दुर्लभ अमोघ अमृत की वर्षा मेरे यहाँ हो गई । तुम्हारे आगमन मात्र से ही अनायास महोत्सव हो गया । ये सभी ऋषि भी आज कृतार्थ हो गए । प्रभो ! जिन ऋषियों ने तपस्या

७८ नारदीयपुराणम् कृतार्थोऽस्मि कृतार्थोऽस्मि कृतार्थोऽस्मि न संशयः। तस्मात्तुभ्यं नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं नमो नमः ॥११२॥ त्वदाज्ञया त्वन्नियोगं साधयामीति मन्मनः। अत्युत्साहसमायुक्तं समाज्ञापय मां प्रभो ॥११३॥ एवमुक्तो दीक्षितेन प्रहसन्वामनोऽब्रवीत् । देहि मे तपसि स्थातुं भूमिं त्रिपदसंमिताम् ॥११४॥ एतच्छ्रुत्वा बलिः प्राह राज्यं याचितवान्नहि। ग्रामं वा नगरं वापि धनं वा किं कृतं त्वया ॥११५॥ तन्निशम्य बलिं प्राह विष्णुःसर्वशरीरभृत् । आसन्नभ्रष्टराज्यस्य वैराग्यं जनयन्निव ॥११६॥ श्रीभगवानुवाच शृणुदैत्येन्द्र वक्ष्यामि गुह्याद्गुह्यतमं परम्। सर्वसंगविहीनानां किमर्थैः साध्यते वद ॥११७॥ अहं तु सर्वभूतानामन्तर्यामीति भावय। मयि सर्वमिदं दैत्य ! किमन्यैः साध्यते वद ॥११८॥ रागद्वेषविहीनानां शान्तानां त्यक्तमायिनाम् । नित्यानन्दस्वरूपाणां किमन्यैः साध्यते धनैः ॥११९॥ आत्मवत्सर्वभूतानि पश्यतां शान्तचेतसाम् । अभिन्नमात्मनः सर्वं को दाता दीयते च किम् ॥१२०॥ पृथ्‍वीयं क्षत्रियवंशा इति शास्त्रेषु निश्चितम् । तदाज्ञायां स्थिताः सर्वे लभन्ते परमं सुखम् ॥१२१॥ दातव्यो मुनिभिश्चापि षष्ठांशो भूभुजे बले ! । महीयं ब्राह्मणानां तु दातव्या सर्वयत्नतः ॥१२२॥ भूमिदानस्य माहात्म्यं न भूतं न भविष्यति। परं निर्वाणमाप्नोति भूमिदो नात्र संशयः ॥१२३॥ स्वल्पामपि महीं दत्त्वा श्रोत्रियायाहिताग्नये । ब्रह्मलोकमवाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥१२४॥ भूमिदः सर्वदः प्रोक्तो भूमिदो मोक्षभाग्भवेत् । अतिदानं तु तज्ज्ञेयं सर्वपापप्रणाशनम् ॥१२५॥ महापातकयुक्तो वा युक्तो वा सर्वपातकैः। दशहस्तां महीं दत्त्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥१२६॥

की थी उनकी तपस्या सफल हो गई, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं। मैं कृतार्थ हो गया, इसमें सन्देह नहीं, इसलिए भगवन् ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है, बार-बार नमस्कार है। आपकी आज्ञा के अनुसार आपके आदेशों का पालन करूँ, यही मेरी इच्छा है। प्रभो ! मुझ सेवक को आज्ञा दीजिए, मैं उत्साह के साथ पालन करूँगा। ॥११०६-११३॥ यजमान की ऐसी बातें सुनकर भगवान् वामन हँसते हुए बोले— तो मुझे तपस्या करने के लिए केवल तीन पग भूमि दे दो। यह सुनकर बलि ने कहा 'न तो आपने राज्य मांगा, न ग्राम, न नगर और न धन ही; आपने यह क्या किया ? बलि की बातें सुनकर अखिल जीव को धारण और पोषण करने वाले विष्णु ने बलि से इस प्रकार कहा मानो निकट भविष्य में राज्यच्युत होने वाले को आश्वा- सन देने के लिए वे वैराग्य उत्पन्न कर रहे हों ॥११४-११६॥ श्रीभगवान् बोले— दैत्येन्द्र ! सुनो, आज मैं परम गुह्य रहस्य को कह रहा हूँ। सब प्रकार की आसक्तियों से परे रहने वालों का धन से कौन सा प्रयोजन सिद्ध हो सकता है ? बताओ ! मैं सब प्राणियों का अन्तर्यामी हूँ, ऐसा समझो । दैत्य ! यह सारा जगत् मुझमें ही स्थित है, तो बताओ, मुझे अन्य वस्तुओं से क्या लाभ होगा ? राग द्वेष से रहित, शान्त, मायामुक्त और नित्यानन्द-स्वरूप व्यक्तियों को अन्य धन से क्या लाभ होगा ? कहो सब प्राणियों को अपने समान देखने वाले, शान्तचित्त और सबको अपने से अभिन्न समझने वाले के लिए कौन दाता है और क्या दे सकता है ? यह पृथ्वी क्षत्रियों के अधिकार में रहती है, ऐसा शास्त्रों में निश्चित किया गया है। उसी क्षत्रिय की आज्ञा में रहकर सारे प्राणी सुख प्राप्त करते हैं। बलि ! मुनियों को भी भूमिपति राजा को उपज का छठा भाग देना चाहिए। ब्राह्मणों के लिए यह पृथ्वी दान में सब प्रकार से देनी चाहिए। भूमिदान का बहुत बड़ा महत्त्व है, ऐसा दान न तो हुआ है न होगा। भूमिदाता परममोक्ष को प्राप्त करता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं ॥११७-१२३॥ किसी श्रोत्रिय अग्निहोत्र करने वाले ब्राह्मण को थोड़ा भी भूदान करने से दाता आवागमन से रहित ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है। भूमि दाता ही सब कुछ का दाता कहा जाता है।

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दशमोऽध्यायः ७६ सत्पात्रे भूमिदाता यः सर्वदानफलं लभेत् । भूमिदानसमं नान्यत्त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥१२७॥ द्विजाय वृत्तिहीनाय यः प्रदद्यान्महीं बले । तस्य पुण्यफलं वक्तुं न क्षमोऽब्दशतैरहम् ॥१२८॥ सक्ताय देवपूजासु वृत्तिहीनाय दैत्यप । स्वल्पामपि महीं दद्याद्यः स विष्णुर्न संशयः ॥१२९॥ इक्षुगोधूमतुवरीपूगवृक्षादिसंयुता । पृथ्वी प्रदीयते येन स विष्णुर्नात्र संशयः ॥१३०॥ वृत्तिहीनाय विप्राय दरिद्राय कुटुम्बिने । स्वल्पामपि महीं दत्त्वा विष्णुसायुज्यमाप्नुयात् ॥१३१॥ सक्ताय देवपूजासु विप्रायाढकिकां महीम् । दत्त्वा लभेत गङ्गायां त्रिरात्रस्नानजं फलम् ॥१३२॥ विप्राय वृत्तिहीनाय सदाचाररताय च । द्रोणिकां पृथिवीं दत्त्वा यत्फलं लभते शृणु ॥१३३॥ गङ्गातीर्थाश्वमेधानां शतानि विधिवन्नरः । कृत्वा यत्फलमाप्नोति तदाप्नोति स पुष्कलम् ॥१३४॥ ददाति खारिकां भूमिं दरिद्राय द्विजाय यः । तस्य पुण्यं प्रवक्ष्यामि वदतो मे निशामय ॥१३५॥ अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयशतानि च । विधाय जाह्नवीतीरे यत्फलं तल्लभेदध्रुवम् ॥१३६॥ भूमिदानं महादानमतिदानं प्रकीर्तितम् । सर्वपापप्रशमनमपवर्गफलप्रदम् ॥१३७॥ अत्रेतिहासं वक्ष्यामि शृणु दैत्यकुलेश्वर । यच्छ्रुत्वा श्रद्धया युक्तो भूमिदानफलं लभेत् ॥१३८॥ आसीत्पुरा द्विजवरो ब्राह्मकल्पे महामतिः । दरिद्रो वृत्तिहीनश्च नाम्ना भद्रमतिर्बले ॥१३९॥ श्रुतानि सर्वशास्त्राणि तेन वेदविदानिशम् । श्रुतानि च पुराणानि धर्मशास्त्राणि सर्वशः ॥१४०॥ अभवंस्तस्य षट्पत्न्यः श्रुतिः सिन्धुर्यशोवती । कामिनी मालिनी चैव शोभा चेति प्रकीर्तिताः ॥१४१॥ भूमिदाता ही मोक्ष का भागी होता है। इसी को सब पापों को नष्ट करने वाला श्रेष्ठ दान कहा गया है। सब पापों का करने वाला अथवा महापापी भी केवल दश हाथ भूमि का दान करने से पापों से मुक्त हो जाता है। योग्य व्यक्ति को भूमि दान करने से दाता सब दानों का फल पा जाता है। भूमिदान के समान तीनों लोकों में कोई दान नहीं है ॥१२४-१२७॥ बलि ! जीविकाहीन ब्राह्मण को जो भूमि दान करता है, उसके पुण्य फल को सौ वर्षों में भी मैं नहीं कह सकता हूँ ।१२८। दैत्यपति ! जीविकाहीन और सर्वदा देवाराधन में लगा रहने वाले ब्राह्मण को थोड़ी सी भी पृथ्वी का दान देने से दाता विष्णुतुल्य हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं। ईख, गेहूँ, अरहर और सुपारी के वृक्ष से युक्त पृथ्वी का जो दान करता है वह विष्णुरूप हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं ॥१२९-१३०॥ जीविकाहीन, दरिद्र और बहुकुटुम्बी ब्राह्मण को थोड़ी सी भी पृथ्वी का दान देने से मनुष्य विष्णुलीन हो जाता है। देवाराधन में तत्पर रहने वाले विप्र को अरहर वाली भूमि देने से गंगा में तीन रात्रि स्नान करने के समान फल मिलता है। जीविकाहीन, सदाचारी विप्र को द्रोणिका (एक नाप) परिमित भूमि देने से जो फल मिलता है उसको सुनो—गंगा तीर्थ और विधिपूर्वक सौ अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न करने से जो अक्षय फल मनुष्य को मिलता है वह फल उस दानी को मिलता है। जो दरिद्र ब्राह्मण को खारिका परिमित भूमि प्रदान करता है उसके पुण्यों को मैं बतला रहा हूँ सुनो—गंगा तट पर सहस्र अश्वमेध, सौ वाजपेय करने से जो फल प्राप्त होता है वह उसको मिलता है, यह ध्रुव है ॥१३१-१३६॥ भूमिदान, महादान और परमोत्कृष्ट दान कहा गया है, यह सब पापों को मिटाने वाला और मोक्ष फल देने वाला है। दैत्य कुल के स्वामी ! सुनो, मैं इस विषय में एक प्राचीन आख्यान सुना रहा हूँ जिसको श्रद्धापूर्वक सुनने से भी भूमिदान का फल मिलता है ॥१३७-१३८॥ बले ! प्राचीन काल में ब्राह्मकल्प में भद्रमति नामक एक महाबुद्धिमान् ब्राह्मण था। वह अति दरिद्र और आश्रय- हीन था। वह रात-दिन सब शास्त्रों का अध्ययन किया करता था, और सब धर्मशास्त्रों तथा पुराणों का भी श्रवण करता था। उसकी श्रुति, सिन्धु, यशोवती, कामिनी, मालिनी और शोभा नाम की छः पत्नियाँ थीं। असुरश्रेष्ठ !

८० नारदीयपुराणम् आसु पत्नीषु तस्यासञ्चत्वारिंशच्छतद्वयम् । पुत्राणामसुरश्रेष्ठ सर्वे नित्यं बुभुक्षिताः ॥१४२॥ अकिञ्चनो भद्रमतिः क्षुधार्त्तानात्मजाञ्श्रियः । पश्यन्स्वयं क्षुधार्त्तश्च विललापाकुलेन्द्रियः ॥१४३॥ धिग्जन्म भाग्यसहितं धिग्जन्म धनवर्जितम् । धिग्जन्म धर्मरहितं धिग्जन्म ख्यातिवर्जितम् ॥१४४॥ नरस्य बह्वपत्यस्य धिग्जन्मैश्वर्यवर्जितम् । अहो गुणाः सौम्यता च विद्वत्ता जन्म सत्कुले ॥१४५॥ दारिद्र्याम्बुधिमग्नस्य सर्वमेतन्न शोभते । प्रियाः पुत्राश्च पौत्राश्च बान्धवा भ्रातरस्तथा ॥१४६॥ शिष्याश्च सर्वमनुजास्त्यजन्त्यैश्वर्यवर्जितम् । चाण्डालो वा द्विजो वापि भाग्यवानेव पूज्यते ॥१४७॥ दरिद्रः पुरुषो लोके शववल्लोकनिन्दितः । अहो संपत्समायुक्तो निष्ठुरो वाप्यनिष्ठुरः ॥१४८॥ गुणहीनोऽपि गुणवान्मूर्खो वाप्यथ पण्डितः । ऐश्वर्यगुणयुक्तश्चेत्पूज्य एव न संशयः ॥१४९॥ अहो दरिद्रता दुःखं तत्राप्याशातिदुःखदा । आशाभिभूताः पुरुषा दुःखमश्नुवतेऽक्षयम् ॥१५०॥ आशाया दासा ये दासास्ते सर्वलोकस्य । आशा दासी येषां तेषां दासायते लोकः ॥१५१॥ मानो हि महतां लोके धनमक्षयमुच्यते । तस्मिन्नाशाख्यरिपुणा माने नष्टे दरिद्रता ॥१५२॥ सर्वशास्त्रार्थवेत्तापि दरिद्रो भाति मूर्खवत् । नैष्किञ्चन्यमहाग्राहग्रस्तानां को विमोचकः ॥१५३॥ अहो दुःखमहो दुःखमहो दुःखं दरिद्रता । तत्रापि पुत्रभार्याणां बाहुल्यमतिदुःखदम् ॥१५४॥ एवमुक्त्वा भद्रमतिः सर्वशास्त्रार्थपारगः । अन्यमैश्वर्यदं धर्मं मनसाऽचिन्तयत्तदा ॥१५५॥ भूमिदानं विनिश्चित्य सर्वदानोत्तमोत्तमम् । दानेन योऽनुमंताति स एव कृतवान्पुरा ॥१५६॥ प्रापकं परमं धर्मं सर्वकामफलप्रदम् । दानानामुत्तमं दानं भूदानं परिकीर्तितम् ॥१५७॥ इन पत्नियों से उसको दो सौ चालीस पुत्र हुए जो द्रव्याभाव के कारण सर्वदा भूखे रह जाते थे ॥१३६-१४२॥ दरिद्र और क्षुधातुर भद्रमति अपने पुत्रों और प्रिय पत्नियों को भूख से पीड़ित देखकर घबराकर विलाप करने लगा १४३॥ भाग्यहीन जीवन को धिक्कार है । धनहीन जीवन को धिक्कार है। इसी प्रकार यशहीन और अधार्मिक जीवन को भी धिक्कार है । अधिक पुत्रवाले परन्तु दरिद्र पिता के जीवन को धिक्कार है। अहो ! दरिद्रता के समुद्र में डूबे हुए व्यक्ति के लिए उसके सद्गुण, सौम्य स्वभाव, विद्वत्ता और उत्तम कुल में जन्म आदि सब कुछ व्यर्थ है । प्रिय पत्नी, पुत्र, पौत्र, बन्धु तथा भाई, शिष्य और सभी मनुष्य दरिद्र व्यक्ति को सर्वथा छोड़ देते हैं। भाग्यवान् चाहे चाण्डाल हो या ब्राह्मण उसी की पूजा होती है ॥१४४-१४७॥ इस लोक में दरिद्र व्यक्ति शव के समान निन्दित होता है । आश्चर्य है कि धनी व्यक्ति कठोर होते हुए भी दयालु है, गुणहीन होते हुए भी गुणी है और मूर्ख होते हुए भी पण्डित है । सत्य भी है, ऐश्वर्य रूपी गुण के कारण वह पूज्य ही है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं । अहो ! दरिद्रता भी क्या महान् दुःख है ? इस पर भी आशा तो और अधिक दुःखदायिनी है । आशा से ग्रस्त मानव सर्वदा दुःख का ही भोग करता है । जो आशा के दास हैं वे सबके दास हैं, और आशा जिसकी दासी है (अर्थात् जो आशा हीन हैं) उनका सारा संसार दास है। संसार में प्रतिष्ठा ही अक्षय धन कहा गया है। आशारूपी शत्रु के द्वारा उस मान के नष्ट हो जाने पर दरिद्रता निश्चित रूप से आ जाती है ॥१४८-१५२॥ सर्व शास्त्रों का ज्ञाता भी दरिद्र होने के कारण मूर्ख के समान ही है। दरिद्रतारूपी महाग्राह के मुख में फँसे व्यक्ति का कौन उद्धारक है ? अहो ! दरिद्रता भी क्या ही दुःख है ? दुःख ही नहीं, महान् दुःख है, तिस पर भी अधिक पुत्र और पत्नी का होना तो और कष्टकर है।' इस प्रकार कहकर सब शास्त्रों का पारगामी विद्वान् भद्रमति ऐश्वर्य देने वाला कौन-सा धर्म है, इसको सोचने लगा ॥१५३-१५५॥ निश्चय किया कि भूमिदान ही सब दानों में उत्तम दान है । जो पहले दान के द्वारा दूसरों को सन्तुष्ट करता है वही कृतकृत्य होता है। दानों में सर्वोत्तम दान भूमि दान ही कहा गया है । यही सब कामनाओं को देनेवाला, परम पुण्यप्रद धर्म है, जिसको देकर मनुष्य अपने

एकादशोऽध्यायः ८१

यद्दत्त्वा समवाप्नोति यद्यदिष्टतमं नरः । इति निश्चित्य मतिमान्धीरो भद्रमतिर्बले ।।१५८।। कौशाम्बींनाम नगरीं कलत्रापत्ययुग्गयौ । सुघोषं नामविप्रेन्द्रं सर्वैश्वर्यसमन्वितम् ।।१५९।। गत्वा याचितवान्भूमिं पञ्चहस्तायतां बले । सुघोषो धर्मनिरतस्तं निरीक्ष्य कुटुम्बिनम् ।।१६०।। मनसा प्रीयमाणेन समभ्यर्च्येदमब्रवीत् । कृतार्थोऽहं भद्रमते सफलं मम जन्म च ।।१६१।। मत्कुलं पावनं जातं त्वदनुग्रहतो द्विज । इत्युक्त्वा तं समभ्यर्च्य सुघोषो धर्मतत्परः ।।१६२।। पञ्चहस्तस्थितां भूमिं ददौ तस्मै महामतिः । पृथिवी वैष्णवी पुण्या पृथिवी विष्णुपालिता ।।१६३।। पृथिव्यास्तु प्रदानेन प्रीयतां मे जनार्दनः । मन्त्रेणानेन दैत्येन्द्र सुघोषस्तं द्विजोत्तमम् ।।१६४।। विष्णुबुद्ध्या समभ्यर्च्य तावतीं पृथिवीं ददौ । सोऽपि भद्रमतिर्विप्रो धीमता याचितां भुवम् ।।१६५।। दत्त्वान्हरिभक्ताय श्रोत्रियाय कुटुम्बिने । सुघोषो भूमिदानेन कोटिवंशसमन्वितः ।।१६६।। प्रपेदे विष्णुभवनं यद् गत्वा न शोचति । बले भद्रमतिश्चापि यतः प्रार्थितवाञ्छ्रियम् ।।१६७।। स्थितवान्विष्णुभवने सकुंटुम्बो युगायुतम् । तथैव ब्रह्मसदने स्थित्वा कोटियुगायुतम् ।।१६८।। ऐन्द्रं पदं समासाद्य स्थितवान्कल्पपञ्चकम् । ततो भुवं समासाद्य सर्वैश्वर्यसमन्वितः ।।१६९।। जातिस्मरो महाभागो बुभुजे भोगमुत्तमम् । ततो भद्रमतिर्दैत्यो निष्कामो विष्णुतत्परः ।।१७०।। पृथिवीं वृत्तिहीनेभ्यो ब्राह्मणेभ्यः प्रदत्तवान् । तस्य विष्णुः प्रसन्नात्मा तस्मैश्वर्यमनुत्तमम् ।।१७१।। कोटिवंशसमेतस्य ददौ मोक्षमनुत्तमम् । तस्माद्दैत्यपते मह्यं सर्वधर्मपरायण ।।१७२।। तपश्चरिष्ये मोक्षाय देहि मे त्रिपदां महीम् । वैरोचनिस्ततो हृष्टः कलशं जलपूरितम् ।।१७३।। आददे पृथिवीं दातुं वर्णिने वामनाय हि । विष्णुः सर्वगतो ज्ञात्वा जलधारावरोधिनम् ।।१७४।।

अभीष्ट को प्राप्त करता है । बलि ! इस प्रकार मतिमान् भद्रमति अपने मन में निश्चय कर अपनी स्त्री और सन्तति के साथ कौशाम्बी नगर में गया । बलि ! जहाँ जाकर सब ऐश्वर्यों से विभूषित सुघोष नामक विप्रेन्द्र के पास जाकर पाँच हाथ परिमित भूमि की याचना की । धार्मिक सुघोष उस बहुकुटुम्बी ब्राह्मण को देखकर मन ही मन बहुत प्रसन्न हुआ और उस सौम्य अतिथि की पूजा कर बोला— 'भद्रमति ! आज मैं कृतार्थ हो गया, मेरा जन्म सफल हो गया ।।१५६-१६१।। द्विज ! तुम्हारे इस अनुग्रह से मेरा कुल पवित्र हो गया ।' यह कहकर धार्मिक सुघोष ने उस विप्र की पूजा की और उस महामति ने— 'पृथ्वी वैष्णवी है, पवित्र और और विष्णु द्वारा रक्षित है, इस पृथ्वी के दान से जनार्दन मेरे ऊपर प्रसन्न हों' इस मन्त्र को पढ़कर विष्णु भावना से उस द्विजवर की पूजा कर उतनी भूमि दे दी । उस भद्रमति ने भी उस दान में प्राप्त पृथ्वी को किसी कुटुम्बी वेदपाठी हरि भक्त को दे दिया ।।१६२-१६५।। सुघोष ने उस भूदान के प्रभाव से करोड़ों वंशजों से युक्त होकर विष्णुलोक को प्राप्त किया जहाँ जाकर मनुष्य शोक-मोह से मुक्त हो जाता है । बलि ! यतः भद्रमति ने भी लक्ष्मी की कामना की अतः वह विष्णुलोक में कुटुम्ब सहित दस हजार वर्ष तक निवास किया, उसी प्रकार ब्रह्मलोक में दस हजार करोड़ युग तक रहने के बाद पाँच कल्प तक इन्द्र- पद पाकर सुख भोगता रहा । तदनन्तर पृथ्वी पर आकर सब प्रकार के विभवों का भोग करने वाला ब्राह्मण हुआ, पूर्व पुण्य के प्रभाव से उसको इस जीवन में भी पूर्व जन्मों का ज्ञान था । अनेकों प्रकार के भोग करने के बाद उस विष्णुभक्त भद्रमति निष्काम भावना में जीविकाहीन दरिद्र ब्राह्मणों को पृथ्वी का दान किया । उस पर विष्णु प्रसन्न हो गए और उन्होंने करोड़ वंश सन्तति सहित उस ब्राह्मण को परमोत्तम मोक्ष रूपी ऐश्वर्य दे दिया । इसलिए दैत्यपति ! सर्व-धर्म-परायण ! मैं मोक्ष के लिए तपस्या करूँगा, तुम मुझे तीन पग परिमित भूमि दे दो । बलि यह सुनकर प्रसन्न हो गया और उसने जल से भरे कमण्डल को उस ब्रह्मचारी वामन को

११—ना० पु०

८२ नारदीयपुराणम् काव्यं हस्तस्थदर्भग्रं तच्छिद्रे संन्यवेशयत् । दर्भाग्रेडभून्महाशस्त्रं कोटिसूर्यसमप्रभम् ॥१७५॥ अमोघं ब्राह्ममत्युग्रं काव्याक्षिग्रासलोलुपम् । आदाय भार्गवमुरानसुरानेकचक्षुषा ॥१७६॥ पश्येति व्यादिदेश च दर्भाग्रं शस्त्रसन्निभम् । बलिर्ददौ महाविष्णोर्महीं त्रिपदसंमिताम् ॥१७७॥ ववृधे सोऽपि विश्वात्मा आब्रह्मभुवनं तदा । अमिमीत महीं द्वाभ्यां पद्भ्यां विश्वतनुर्हरिः ॥१७८॥ स आब्रह्मकटाहांतपदान्येतानि सप्रभः । पादाङ्गुष्ठाग्रनिर्भिन्नं ब्रह्माण्डं बिभिदे द्विधा ॥१७९॥ तद्वारा बाह्यसलिलं बहुधारं समागतम् । धौतविष्णुपदं तोयं निर्मलं लोकपावनम् ॥१८०॥ अजाण्डबाह्यनिलयं धाराशरूपमवर्त्तत । तज्जलं पावनं श्रेष्ठं ब्रह्मादीन्पावयत्सुरान् ॥१८१॥ सप्तर्षिसेवितं चैव न्यपतन्मेरूमूर्द्धनि । एतद्दृष्ट्वाद्वभुतं कर्म ब्रह्माद्या देवतागणाः । ऋषयो मनवश्चैव ह्यस्तुवन्हर्षविह्वलः ॥१८३॥ देवा ऊचुः नमः परेशाय परात्मरूपिणे परात्परायावररूपधारिणे । ब्रह्मरात्मने ब्रह्मरतात्मबुद्धये नमोऽस्तु तेऽव्याहतकमेकशीलिने ॥१८४॥ परेश परमानन्द परमात्मन्परात्पर । सर्वात्मने जगन्मूर्त्ते प्रमाणातीत ते नमः ॥१८५॥ विश्वतश्चक्षुषे तुभ्यं विश्वतो बाहवे नमः । विश्वतः शिरसे चैव विश्वतो गतये नमः ॥१८६॥ एवं स्तुतो महाविष्णुर्ब्रह्माद्यैः स्वर्द्दिवौकसाम् । दत्त्वाभयं च मुमुदे देवदेवः सनातनः ॥१८७॥ पृथिवी दान देने के लिए हाथ में पकड़ा। सर्वज्ञ विष्णु ने जलधारा को रोकने के लिए कमण्डल के छिद्र पर बैठे शुक्र को जान लिया और अपने हाथ के कुश के अग्रभाग को उस कमण्डलु की नलिका में चुभो दिया उस कुश की नोक कोटि सूर्य के समान प्रभावान्, अति कठोर, अमोघ तथा शुक्राचार्य के नेत्र को कवलित करने के लिए लोलुप ब्रह्म अस्त्र के समान कोई महान् शस्त्र हो गई । तब शस्त्र के समान उस कुश के अग्रभाग को वामन ने यह कहते हुए कि हे शुक्राचार्य ! देवों और असुरों को एक आँख से देखो, शुक्राचार्य के नेत्र में घुसेड़ दिया। तब बलि ने महाविष्णु को तीन पद परिमित पृथ्वी दे दी ॥१६६-१७७॥ तत्पश्चात् विश्वात्मा हरि ने ब्राह्म लोक तक अपना आकार बढ़ा दिया और उस विश्वरूप हरि ने दो ही डगों से पृथ्वी को नाप डाला। उस परम तेजस्वी ने अपने डगों से सारे ब्रह्माण्ड को नाप दिया। उसी समय उसके पैर के अंगूठे के नख से ब्रह्माण्ड दो भागों में बँट गया। उस ब्रह्माण्ड के मध्य से जल की अनेक धारायें बह निकलीं। विष्णु के चरण को धोने वाली जलधारा ब्रह्माण्ड के बाह्य आश्रयभूत धारा रूप में बहने लगी और वह पुनीत धारा ब्रह्मा आदि सुरों को पवित्र करती हुई सप्तर्षि से सुशोभित सुमेरु पर्वत के शिखर पर गिरी ॥१७८-१८२॥ इस आश्चर्य-जनक कार्य को देखकर देवगण, ऋषि, मुनि और मनुगण आनन्द से विह्वल होकर भगवान् की स्तुति करने लगे ॥१८३॥ देवगण बोले-महाप्रभु, परात्मस्वरूप, परात्पर और अपर रूपधारी को नमस्कार है। ब्रह्मस्वरूप, ज्ञानरत, आत्मबुद्ध और अबाध कर्म करने वाले को नमस्कार है। परेश ! परमानन्द ! परमात्मन् ! परात्पर ! प्रमाण से परे ! जगन्मूर्त्ति ! सर्वात्मा ! प्रमाणातीत ! आपको नमस्कार है। विश्वतश्चक्षु (चारों ओर दृष्टि रखने वाले) विश्वतो बाहु (अनन्त भुजवाले) तुमको नमस्कार है। विश्वतः शिरस् (अनन्त शिर वाले) सर्वत्र गति वाले तुमको नमस्कार है। ब्रह्मा आदि देवों की ऐसी स्तुति सुनकर देवाधिदेव सनातन देव प्रसन्न हो गए और देवताओं को अभय वर दिया। अब तृतीय डग के लिए उपयुक्त भूमि न पाकर उन्होंने बलि को नांध दिया। इस प्रकार बलि को सर्वथा शरणागत

एकादशोऽध्यायः ८३ विरोचनात्मजं दैत्यं पदैकार्थं बबन्ध ह । ततः प्रपन्नं तु बलिं ज्ञात्वा चास्मै रसातलम् । ददौ तद्द्वारपालश्च भक्तवश्यो बभूव ह ॥१८८॥ नारद उवाच रसातले महाविष्णुर्विरोचनसुतस्य वै । किं भोज्यं कल्पयामास घोरे सर्पभयाकुले ॥१८६॥ सनक उवाच अमन्त्रितं हविर्यत्तु हूयते जातवेदसि । अपात्रे दीयते यच्च तद्घोरं भोगसाधनम् ॥१९०॥ हुतं हविरशुचिना दत्तं सत्कर्म यत्कृतम् । तत्सर्वं तत्र भोगार्हमधःपातफलप्रदम् ॥१९१॥ एवं रसातलं विष्णुर्बलये सासुराय तु । दत्त्वाभयं च सर्वेषां सुराणां त्रिदिवं ददौ ॥१९२॥ पूज्यमानोऽमरगणैः स्तूयमानो महर्षिभिः । गन्धर्वैर्गीयमानश्च पुनर्वामनतां गतः ॥१९३॥ एतद्दृष्ट्वा महत्कर्म मुनयो ब्रह्मवादिनः । परस्परं स्मितमुखाः प्रणेमुः पुरुषोत्तमम् ॥१९४॥ सर्वभूतात्मको विष्णुर्वामनत्वमुपागतः । मोहयन्निखिलं लोकं प्रपेदे तपसे वनम् ॥१९५॥ एवं प्रभावा सा देवी गङ्गा विष्णुपदोद्भवा । यस्याः स्मरणमात्रेण मुच्यते सर्वपातकैः ॥१९६॥ इदं तु गङ्गामाहात्म्यं यः पठेच्छृणुयादपि । देवालये नदीतीरे सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥१९७॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे गङ्गोत्पत्तिर्गङ्गामाहात्म्यं नामैकादशोऽध्यायः ॥११॥ समझकर उसको रसातल भेज दिया और उसका द्वारपाल बनकर उस भक्त की सेवा भी स्वीकार की ॥१८४-१८८॥ नारद बोले—महाविष्णु ने सर्पों से भरे अतएव भयङ्कर उस रसातल में विरोचन पुत्र बलि के लिए भोजन की क्या व्यवस्था की ? ॥१८६॥ सनक बोले—बिना मन्त्र के जिस हवि को अग्नि में छोड़ा जाता है, अथवा अपात्र को जो दान दिया जाता है वही बलि के लिये भयंकर भोग का साधन बनता है। अपवित्र भाव से हवन में दी हुई हवि और किये हुए सत्कर्म,जो अधःपतन रूप फल के देने वाले हैं, बलि के लिए भोगोपयोगी होते हैं । इस प्रकार बलि को रसातल पहुँचाकर विष्णु ने सब देवों को निर्भय करके स्वर्गलोक का अधिकारी बना दिया । पुनः देवगणों ने उनकी पूजा की, महर्षियों ने स्तुति की और गन्धर्वों ने उनका यशोगान किया । इस प्रकार भक्तों से आदर प्राप्त कर पुनः उन्होंने अपना वामनरूप बना लिया ॥१९०-१९३॥ विष्णु के इस महान् अद्भुत कार्य को देखकर ब्रह्मज्ञानी मुनिगण परस्पर एक दूसरे को देखकर मुस्कराने लगे और उन पुरुषोत्तम को प्रणाम किया । इस प्रकार सब प्राणियों के रूप में और अन्तःकरण में विराजमान रहने वाले विष्णु अपना वामन रूप धारण कर सब लोकों को मन्त्र-मुग्ध करते हुए तपस्या के लिए वन को चले गये । विष्णु के चरणों से निकलने वाली गंगा का ऐसा प्रभाव है, जिसके स्मरणमात्र से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है । जो कोई इस गंगा-माहात्म्य को नदी तीर पर अथवा देवालय में सुनता है वह भी अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है ॥१९४-१९७॥ श्रीनारदीयपुराण में गंगा-माहात्म्य-वर्णन नामक ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त ॥११॥

अथ द्वादशोऽध्यायः नारद उवाच श्रुतं तु गङ्गामाहात्म्यं वाञ्छितं पापनाशनम् । अधुना लक्षणं ब्रूहि भ्रातर्मे दानपात्रयोः ॥१॥ सनक उवाच सर्वेषामेव वर्णानां ब्राह्मणः परमो गुरुः। तस्मै दानानि देयानि दत्तस्यानन्त्यमिच्छता ॥२॥ ब्राह्मणः प्रतिगृह्णीयात्सर्वतो भयवर्जितः । न कदापि क्षत्रविशौ गृह्णीयातां प्रतिग्रहम् ॥३॥ चण्डस्य पुत्रहीनस्य दम्भाचाररतस्य च । स्वकर्मत्यागिनश्चापि दत्तं भवति निष्फलम् ॥४॥ परदाररतस्यापि परद्रव्याभिलाषिणः । नक्षत्रसूचकस्यापि दत्तं भवति निष्फलम् ॥५॥ असूयाविष्टमनसः कृतघ्नस्य च मायिनः । अयाज्ययाजकस्यापि दत्तं भवति निष्फलम् ॥६॥ नित्यं याच्ञापरस्यापि हिंसकस्य खलस्य च । रसविक्रयिणश्चैव दत्तं भवति निष्फलम् ॥७॥ वेदविक्रयिणश्चापि स्मृतिविक्रयिणस्तथा । धर्मविक्रयिणो विप्र दत्तं भवति निष्फलम् ॥८॥ गानेन जीविका यस्य यस्य भार्या च पुंश्चली । परोपतापिनश्चापि दत्तं भवति निष्फलम् ॥६॥ असिजीवी मषीजीवी देवलो ग्रामयाजकः । धावको वा भवेत्तेषां दत्तं भवति निष्फलम् ॥१०॥ अध्याय १२ धर्माख्यान-प्रसंग नारद बोले- भाई ! पापों को नष्ट करने वाले अभीष्ट गंगा-माहात्म्य को तो सुन लिया, अब दान और दानयोग्य पात्रों का लक्षण कहिये ॥१॥ सनक बोले- ब्राह्मण सब वर्णों का परमश्रेष्ठ गुरु माना गया है। इसलिए अपने दान को अनन्त बनाने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को ब्राह्मण को अवश्य दान देना चाहिए। ब्राह्मण बिना किसी प्रकार के भय के सबसे दान ले सकता है। क्षत्रिय और वैश्य कभी भी दान न लें । अत्यन्त क्रोधी, पुत्रहीन, पाखण्ड में लीन रहने वाले और अपने कर्त्तव्य से विमुख व्यक्ति को दिया हुआ दान व्यर्थ होता है। परस्त्रीगामी, परद्रव्य-लोभी और ज्योतिषी को दिया हुआ दान व्यर्थ हो जाता है। ईर्ष्यालु, कृतघ्न, मायावी और अनधिकारी को यज्ञ कराने वाले को दान देना व्यर्थ हो जाता है । सर्वदा भिक्षा मांगने वाले, हिंसक, दुष्ट और रस बेचने वाले को दिया हुआ दान व्यर्थ जाता है ॥२-७॥ वेद-विक्रयी, स्मृति और धर्म के विक्रेता (पैसे लेकर वेद-स्मृति और धर्म का उपदेश करने वाले) ब्राह्मण को दान देना निष्फल होता है। गाकर जीविका चलाने वाला, जिसकी भार्या आचारहीन हो और जो दूसरो को पीड़ा पहुँचावे ऐसे विप्र को दान देना व्यर्थ होता है। तलवार के सहारे जीने वाले (सैनिक), लिपिक (क्लर्क), पुजारी, ग्राम पुरोहित और हरकारे को दिया हुआ दान निष्फल होता है ॥८-

८५ द्वादशोऽध्यायः पाककर्तुः परस्यार्थे कवये गदहारिणे । अभक्ष्यभक्षकस्यापि दत्तं भवति निष्फलम् ॥११॥ शूद्रान्नभोजिनश्चैव शूद्राणां शवदाहिनः । पौंश्चलान्नभुजश्चापि दत्तं भवति निष्फलम् ॥१२॥ नामविक्रयिणो विष्णोः संध्याकर्मोज्झितस्य च । दुष्प्रतिग्रहदग्धस्य दत्तं भवति निष्फलम् ॥१३॥ दिवाशयनशीलस्य तथा मैथुनकारिणः । संध्याभोजिन एवापि दत्तं भवति निष्फलम् ॥१४॥ महापातकयुक्तस्य त्यक्तस्य ज्ञातिबान्धवैः । कुण्डस्य चापि गोलस्य दत्तं भवति निष्फलम् ॥१५॥ परिवित्तिः शठस्यापि परिवेत्तुः प्रमादिनः । स्त्रीजितस्यातिदुष्टस्य दत्तं भवति निष्फलम् ॥१६॥ मद्यमांसाशिनश्चापि स्त्रीविटस्यातिलोभिनः । चौरस्य पिशुनस्यापि दत्तं ० ॥१७॥ ये केचित्पापनिरता निन्दिताः सुजनैः सदा । न तेभ्यः प्रतिगृह्णीयान्न च दद्याद्द्विजोत्तम । सत्कर्मनिरतायापि देयं यत्नेन नारद ॥१८॥ यद्दानं श्रद्धया दत्तं तथा विष्णुसमर्पणम् । याचि वापि पात्रे ण भवेत्तद्दानमुत्तमम् ॥१९॥ परलोकं समुद्दिश्य ह्यैहिकं वापि नारद । यद्दानं दीयते पात्रे तद्दानं मध्यमं स्मृतम् ॥२०॥ दम्भेन चापि हिंसार्थं परस्याविधिनापि च । क्रूद्धेनाश्रद्धयापात्रे तद्दानं मध्यमं स्मृतम् ॥२१॥ अधमं बलितोषाय मध्यमं स्वार्थसिद्धये । उत्तमं हरिप्रीत्यर्थं प्राहुर्वेदविदां वराः ॥२२॥

१०॥ दूसरे का भोजन बनाने वाले (रसोइया) कवि (भांट), वैद्य और अभक्ष्य-भक्षक को दान देना व्यर्थ होता है । शूद्रों का अन्न खाने वाले, शूद्रों के शव का दाह करने वाले और वेश्या का अन्न खाने वाले विप्र को दान देना निष्फल है । विष्णु के नाम को बेचने वाले (पैसे लेकर हरिकीर्तन करने वाले), सन्ध्या न करने वाले, अनुचित दान रूपी अग्नि में अपने आचार और जीवन को जला देने वाले विप्र को दान देना व्यर्थ हो जाता है । दिन में सोने वाले और स्त्री भोग करने वाले, संध्या समय भोजन करनेवाले ब्राह्मण को दिया हुआ दान निरर्थक है । महापापी, बन्धु-बान्धवों से बहिष्कृत, कुण्ड¹ और गोलक² को दान देना निष्फल होता है ॥११-१५॥ परिवेत्ता, शठ, परिवित्त³, प्रमादी स्त्री के वश में रहने वाले और अतिदुष्ट विप्र को दान देना निष्फल होता है । मद्य मांस खाने वाले, अति लोभी, स्त्रीविट (स्त्रियों के दलाल) चोर और अति लोभी को दान देना निष्फल होता है । द्विजोत्तम ! जो कोई पाप करने पर ही तुले रहते अथवा सर्वदा सज्जन जिसकी निन्दा करते हैं उनसे भी न तो दान लेना चाहिए और न देना ही चाहिए । नारद ! सत्कर्म करने वाले विप्र को प्रयत्नपूर्वक ढूंढ कर दान देना चाहिए, श्रद्धापूर्वक जो दान दिया जाता है अथवा जो विष्णु को समर्पित किया जाता है, अथवा स्वयं सत्पात्र की याचना पर जो दिया जाता है वह उत्तम दान कहा जाता है ॥१६-१६॥ नारद ! परलोक अथवा संसार सुख की कामना से जो दान सत्पात्र को दिया जाता है, वह काम्य दान है और वह मध्यम श्रेणी का है । दम्भ-पूर्वक, दूसरे की हिंसा के लिए (दूसरे को चिढ़ाने की दृष्टि से अथवा कष्ट देने की दृष्टि से), अविधि पूर्वक, क्रोधपूर्वक, अश्रद्धा से अपात्र में दिया हुआ दान मध्यम कोटि का माना गया है। बलि के लिए दिया हुआ दान अधम कोटि का और स्वार्थ सिद्धि के निमित्त दिया हुआ दान मध्यम कोटि का होता है। वेदज्ञों में श्रेष्ठ पण्डितों ने विष्णु प्रीति के लिए दिये हुए दान को उत्तम माना है । दान, भोग और विनाश

१. पति के रहते अन्यपति से उत्पन्न पुत्र । २. पति के मर जाने पर उत्पन्न किया हुआ पुत्र ३. वह बड़ा भाई जिससे पहले उसके छोटे भाई ने ब्याह कर लिया हो ।

८६ नारदीयपुराणम् दानभोगविनाशाश्च त्रयः स्युर्गतयस्त्रिधा ॥२३॥ यो ददाति च नो भुंक्ते तद्धनं नाशकारणम् । धनं धर्मफलं विप्र धर्मो माधवतुष्टिकृत् ॥२४॥ तरवः किं न जीवन्ति तेऽपि लोके परार्थकाः । यत्र मूलफलैर्वृक्षाः परकार्यं प्रकुर्वते ॥२५॥ मनुष्या यदि विप्राग्र्य न परार्थास्तदा मृताः । परकार्यं न ये मर्त्याः कायेनापि धनेन वा ॥२६॥ मनसा वचसा वापि ते ज्ञेयाः पापकृत्तमाः । अत्रेतिहास वक्ष्यामि शृणु नारद तत्त्वतः ॥२७॥ यत्र दानादिकानां तु लक्षणं परिकीर्तितम् । गङ्गामाहात्म्यसहितं सर्वपापप्रणाशनम् ॥२८॥ भगीरथस्य धर्मस्य संवादं पुण्यकारकम् । आसीद् भगीरथो राजा सागरान्वयसंभवः ॥२९॥ शशास पृथिवीमेतां सप्तद्वीपां ससागराम् । सर्वधर्मरतो नित्यं सत्यसंधः प्रतापवान् ॥३०॥ कन्दर्पसदृशो रूपे यायजूको विचक्षणः । प्रालेयाद्रिसमो धैर्ये धर्मे धर्मसमो नृपः ॥३१॥ सर्वलक्षणसंपन्नः सर्वशास्त्रार्थपारगः । सर्वसंपत्समायुक्तः सर्वानन्दकरो मुने ॥३२॥ आतिथ्यप्रयतो नित्यं वासुदेवार्चने रतः । पराक्रमी गुणनिधिर्मैत्रः कारुणिकः सुधीः ॥३३॥ एतादृशं तं राजानं ज्ञात्वा हृष्टो भगीरथम् । धर्मराजो द्विजश्रेष्ठ कदाचिद्द्रष्टुमागतः ॥३४॥ समागतं धर्मराजमर्हयामास भूपतिः । शास्त्रदृष्टेन विधिना धर्मः प्रीत उवाच तम् ॥३५॥ धर्मराज उवाच राजन्र्धमविदां श्रेष्ठ प्रसिद्धोऽसि जगत्त्रये । धर्मराजोऽथ कीर्ति ते श्रुत्वा त्वां द्रष्टुमागतः ॥३६॥ सन्मार्गानिरतं सत्यं सर्वभूतहिते रतम् । द्रष्टुमिच्छन्ति विबुधास्तवोत्कृष्टगुणप्रियाः ॥३७॥ यही तीन धन की उपयोग-विधियाँ हैं। जो धन दान या भोग में नहीं लगाया जाता है वह यों ही नष्ट हो जाता है। विप्र ! धन के द्वारा धर्म किया जाता है और धर्म से विष्णु प्रसन्न होते हैं। वृक्ष क्या इस संसार में नहीं जीते हैं ? वे भी तो दूसरों के लिए ही हैं, जो (वृक्ष) अपने मूल और फलों से सर्वदा परोपकार किया करते हैं ॥२०-२५॥ विप्रवर्य ! मनुष्य यदि परोपकार नहीं करते तो वे मृततुल्य हैं जो मनुष्य शरीर धन से अथवा मन और वचन से परोपकार नहीं करते हैं वे पापी समझे जाते हैं। नारद ! इस विषय में एक इतिहास बतला रहा हूँ, सुनो, जिसमें दान आदि के लक्षण और सब पापों को नष्ट करने वाले गंगा-माहात्म्य का वर्णन भी प्रसङ्गवश हो जाता है। यह आख्यान भगीरथ और धर्म के पुण्य जनक संवाद से सम्बन्ध रखता है। सगर-वंश में उत्पन्न भगीरथ नाम के राजा थे, उन्होंने सप्त सागर पर्यन्त पृथ्वी पर शासन किया। वे नित्य धर्म कार्यों में निरत रहने वाले, प्रतापी और सत्यप्रतिज्ञ थे ॥२६-३०॥ रूप में कामदेव के समान, धैर्य में हिमालय के समान और धर्म में साक्षात् धर्म के समान एवं विद्वान् और अनेकों यज्ञों के करने वाले थे। मुने ! वे सब लक्षणों से युक्त, सब शास्त्रों के पारगामी विद्वान्, सब ऐश्वर्यों से सम्पन्न और सब के आनन्द देने वाले थे। अतिथि सत्कार में विशेष ध्यान देने वाला, पराक्रमी, गुणवान्, मन्त्रियों से सर्वदा परामर्श करने वाला, कारुणिक और बुद्धिमान् राजा सर्वदा वासुदेव की पूजा में लगा रहता था। द्विजवर्य ! ऐसे भगीरथ राजा का यश सुनकर धर्मराज किसी समय उनसे मिलने के लिए आये। भूपाल ने अतिथिरूप से आये हुए धर्मराज का शास्त्रोक्त विधि से सत्कार किया। धर्मराज स्वागत विधि से प्रसन्न हो बोले ॥३१-३५॥ धर्मराज बोले—राजन् ! धर्मज्ञों में श्रेष्ठ ! तुम जगद् विख्यात हो, इसीलिए तुम्हारी कीर्ति को सुनकर मै (धर्मराज) (तुमको देखने के लिए) तुमसे मिलने के लिए आया हूँ। तुम्हारे उत्कृष्ट गुणों से प्रसन्न होकर देवता भी सन्मार्ग और सब प्राणियों के हित में तत्पर रहने वाले सत्य-प्रेमी तुमको देखना चाहते हैं। भूपते ! जहाँ

८७ द्वादशोऽध्यायः कीर्तिर्नीतिश्च संपत्तिर्वर्तते यत्र भूपते । वसन्ति तत्र नियतं गुणास्सन्तश्च देवताः ॥३८॥ अहो राजन्महाभाग शोभनं चरितं तव । सर्वभूतहितत्वादि मादृशामपि दुर्लभम् ॥३६॥ इत्युक्तवन्तं तं धर्मं प्रणिपत्य भगीरथः । प्रोवाच विनयाविष्टः संहृष्टः श्लक्ष्णया गिरा ॥४०॥ भगीरथ उवाच भगवन्सर्वधर्मज्ञ समदर्शिन् सुरेश्वर । कृपया परयाविष्टो यत्पृच्छामि वदस्व तत् ॥४१॥ धर्मा कीदृग्विधाः प्रोक्ताः के लोका धर्मशालिनाम् । ॥४२॥ कियत्यो यातनाः प्रोक्ताः केषां ताः परिकीर्तिताः त्वया संमाननीया ये शासनीयाश्च ये यथा । तत्सर्वं मे महाभाग विस्तराद्वक्तुमर्हसि ॥४३॥ धर्मराज उवाच साधु साधु महाबुद्धे मतिस्ते विमलोर्जिता । धर्माधर्मांन्प्रवक्ष्यामि तत्त्वतः शृणु भक्तितः ॥४४॥ धर्मा बहुविधाः प्रोक्ताः पुण्यलोकप्रदायकाः । तथैव यातनाः प्रोक्ता असंख्‍या घोरदर्शनाः ॥४५॥ विस्तराद्गदितुं नालमपि वर्षशतायुतैः । तस्मात्समासतो वक्ष्ये धर्माधर्मनिदर्शनम् ॥४६॥ वृत्तिदानं द्विजानां वै महापुण्यं प्रकीर्तितम् । तथैवाध्यात्मविदुषो दत्तं भवति चाक्षयम् ॥४७॥ कुटुम्बिनं वा शास्त्रज्ञं श्रोत्रियं वा गुणान्वितम् । यो दत्त्वा स्थापयेद्वृत्तिं तस्य पुण्यफलं शृणु ॥४८॥ मातृतः पितृतश्चैव द्विजः कोटिकुलान्वितः । निर्विश्य विष्णुभवनं कल्पं तत्रैव मोदते ॥४६॥ गण्यन्ते पांसवो भूमेर्गण्यन्ते वृष्टिबिन्दवः । न गण्यन्ते विधात्रापि ब्रह्मवृत्तिफलानि वै ॥५०॥ कीर्ति, नीति के साथ सम्पत्ति रहती है वहाँ सभी गुण, सज्जन पुरुष और देवगण सर्वदा निवास करते हैं। अहो ! राजन् ! महाभाग ! आपका चरित्र परमशोभन है। सब प्राणियों की रक्षा आदि गुण मेरे समान देवों में भी दुर्लभ हैं। धर्म के इस प्रकार कहने पर भगीरथ उनके चरणों पर गिर पड़े और प्रसन्न होकर विनम्र भाव से मधुर शब्दों में बोले ॥३६-४०॥ भगीरथ बोले—भगवन् ! सब धर्म के जानने वाले समदर्शी ! सुरेश्वर ! मैं जो पूछ रहा हूँ, वह कृपया बताइए। धर्म कितने प्रकार के हैं, धर्माचरण करने वालों को कौन लोक प्राप्त होते और यातनाएं (नरक) कितनी होती हैं, किन लोगों को यातनाएं दी जाती हैं, आपका किसके ऊपर सम्मान भाव रहता और किसको आप दण्ड देते हैं ? हे महाभाग ! आप इन विषयों को विस्तृत व्याख्या कीजिए ॥४१-४३॥ धर्मराज बोले—महाबुद्धिमान् ! धन्य हो, धन्य हो क्योंकि तुमने विमल बुद्धि प्राप्त की है, मैं धर्म और अधर्म की यथार्थ रूप से व्याख्या कर रहा हूँ, तुम ध्यानपूर्वक सुनो। पुण्य लोकों के देने वाले धर्म बहुत प्रकार के कहे गये हैं। उसी प्रकार अत्यन्त भयङ्कर दीखने वाली यातनायें (नरक) भी असंख्य कही गयी हैं। इस विषय पर विस्तार पूर्वक कुछ कहना सैकड़ों, हजारों वर्षों में भी सम्भव नहीं हो सकता। इसलिए संक्षेप में धर्म और अधर्म का दिग्दर्शन करा रहा हूँ। ब्राह्मणों को जीविका निर्वाह के लिए कुछ देना अत्यन्त पुण्य-प्रद कहा गया है। उसी प्रकार अध्यात्मज्ञाताओं को भी दिया हुआ दान अक्षय पुण्य को देने वाला होता है। जो किसी कुटुम्बी शास्त्रज्ञ अथवा गुणी वेदपाठी को कुछ देकर उसकी जीविका का स्थायी प्रबन्ध कर देता है, उसके पुण्य के फल को सुनो—वह व्यक्ति मातृकुल और पितृकुल के करोड़ों पुरखों सहित विष्णु लोक को जाता है और वहाँ कल्प पर्यन्त सुख भोग करता है ॥४४-४६॥ पृथ्वी के रेणुकण गिने जा सकते हैं और वर्षा की बूंदें भी गिनी जा सकती हैं परन्तु ब्रह्मा भी

८८ नारदीयपुराणम् समस्तदेवतारूपो ब्राह्मणः परिकीर्तितः । जीवनं ददतस्तस्य कः पुण्यं गदितुं क्षमः ॥५१॥ यो विप्रहितकृन्नित्यं स सर्वान्कृतवान्मखान् । स स्नातः सर्वतीर्थेषु तप्तं तेनाखिलं तपः ॥५२॥ यो ददस्वेति विप्राणां जीवनं प्रेरयेत्परम् । सोऽपि तत्फलमाप्नोति किमन्यैर्बहुभाषितैः ॥५३॥ तडागं कारयेद्यस्तु स्वयमेवापरेण वा । वक्तुं तत्पुण्यसंख्यानं नालं वर्षशतायुषा ॥५४॥ एकश्चेदध्वगो राजंस्तडागस्य जलं पिवेत् । तत्कर्तुः सर्वपापानि नश्यन्त्येव न संशयः ॥५५॥ एकाहमपि यत्कुर्याद्भूमिस्थमुदकं नरः । स मुक्तः सर्वपापेभ्यः शतवर्षं वसेद्दिवि ॥५६॥ कर्तुं तडागं यो मर्त्यः साहाय्यकः शक्तितो भवेत् । सोऽपि तत्फलमाप्नोति तुष्टः प्रेरक एव च ॥५७॥ मृदं सिद्धार्थमात्रां वा तडागाद्यो बहिः क्षिपेत् । तिष्ठत्यब्दशतं स्वर्गे विमुक्तः पापरकोटिभिः ॥५८॥ देवता यस्य तुष्यन्ति गुरवो वा नृपोत्तम । तडागपुण्यभाक्स स्यादित्येषा शाश्वती श्रुतिः ॥५९॥ इतिहास प्रवक्ष्यामि तवात्र नृपसत्तम । यं श्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ॥६०॥ गौडदेशेऽतिविख्यातो राजासीद्वीरभद्रकः । महाप्रतापी विद्वान्सदा विप्रप्रपूजकः ॥६१॥ वेदशास्त्रकुलाचारयुक्तो मित्रविवर्धनः । तस्य राज्ञी महाभागा नाम्ना चम्पकमञ्जरी ॥६२॥ तस्य राज्ञो महामात्याः कृत्याकृत्यविचारणाः । धर्मार्णा धर्मशास्त्रैस्तु सदा कुर्वन्ति निश्चयम् ॥६३॥ प्रायश्चित्तं चिकित्सां च ज्योतिषे धर्मनिर्णयम् । विना शास्त्रेण यो ब्रूयात्तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥६४॥ इति निश्चित्य मनसा मन्वादीरितधर्मकान् । आचार्येभ्यः सदा भूपः शृणोति विधिपूर्वकम् ॥६५॥

ब्राह्मण को वृत्ति देने के फल की गणना नहीं कर सकते । ब्राह्मण सब देवताओं का रूप कहा गया है, उसको जीविका देने वाले पुरुष के पुण्यों को कौन गिनने में समर्थ हो सकता है ? जो सर्वदा ब्राह्मणों का हित करता है उसने मानो सब यज्ञों का अनुष्ठान कर लिया, सब तीर्थों में स्नान कर लिया और सम्पूर्ण तपस्यायें भी कर लीं । जो ब्राह्मणों को कुछ देने के लिए दूसरों को प्रेरित करता है वह भी दान का फल पाता है । अब इस विषय में अधिक क्या कहा जाय ? जो स्वयं तालाब बनाता या दूसरों से बनवाता है, उसके पुण्यों की गिनती सौ वर्ष की पूरी आयु में नहीं हो सकती है ॥५०-५४॥ एक भी पथिक यदि उस तालाब का जल पी लेगा तो उसको बनाने वाले के सारे पाप धुल जायँगे, इसमें सन्देह नहीं । जो एक दिन के लिए भी जल को किसी गड्ढे या निम्न भूमि में रहने के योग्य बना देता है, वह अपने पापों से मुक्त हो जाता और सौ वर्ष तक स्वर्ग में रहता है। जो मनुष्य तालाब बनवाने में अपनी शक्ति के अनुसार सहायता पहुँचाता है वह भी तालाब बनाने वाले के समान ही फल पाता है और उस कार्य को देखकर प्रसन्न होने वाला या प्रेरित करने वाला भी वही फल पाता है । जो तालाब से थोड़ी सी भी मिट्टी बाहर फेंक देता है वह अपने कोटि पापों से मुक्त हो कर सौ वर्षों तक स्वर्ग में निवास करता है ॥५५-५८॥ नृपोत्तम ! जिसके ऊपर देवता या गुरु प्रसन्न होते हैं, वही तडाग बनवाने का यश प्राप्त करता है, ऐसी श्रुति-परम्परा सुनी जाती है । नृपसत्तम ! इस विषय में तुमसे एक प्राचीन इतिहास कह रहा हूँ, जिसको सुनकर निःसन्देह मनुष्य पापों से छूट जाता है । गौड़ देश में अति विख्यात वीरभद्रक नामक राजा था। वह महाप्रतापी, विद्वान् और ब्राह्मणों का पूजक था ॥५६-६१॥ वह वेद-शास्त्रों तथा अपने कुलाचार से युक्त था और मित्रों को बढ़ाने वाला था । उसकी महाभाग्यशालिनी रानी का नाम चंपकमंजरी था । उस राजा के कर्त्तव्या- कर्त्तव्य का विवेक करने वाले महामन्त्री थे। वे धर्मशास्त्रों के अनुसार न्याय का निर्णय करते थे। प्रायश्चित्त, चिकित्सा और ज्योतिष शास्त्र सम्बन्धी धर्मनिर्णय जो शास्त्र के अनुकूल नहीं करता है, उसको ब्रह्मघाती कहा जाता है, ऐसा मन में निश्चय कर वह आचार्यों से मनु आदि धर्माचार्यों के बारे में सर्वदा विधिपूर्वक

द्वादशोऽध्यायः ८६ न कोऽप्यन्यायवर्ती च तस्य राज्येऽवरोऽपि च। धर्मेण पाल्यमानस्य तस्य देशस्य भूपतेः ॥६६॥ जातं समत्वं स्वर्गस्य सौराज्यस्य शुभावहम्। स चैकदा तु नृपतिर्मृगयायां महावने ॥६७॥ मन्त्र्यादिभिः परिवृतो बभ्राम मध्यभास्करम्। दैवादाखेटशून्यस्य ह्यतिश्रान्तस्य यत्र वै ॥६८॥ नृपरीतस्य संजातं सरसो दर्शनं नृप। ततः शुष्कां तु सरसीं दृष्ट्वा तत्र व्यचिन्तयत् ॥६९॥ किमियं सरसी शृङ्गे भुवः केन विनिर्मिता। कथं जलं भवेदत्र येन जीवेदयं नृपः ॥७०॥ ततो बुद्धिः समभवत्खाते तस्या नृपोत्तम। हस्तमात्रं ततो गर्तं खात्वा तोयमवाप्तवान् ॥७१॥ तेन तोयेन पीतेन राजंस्तृप्तिरजायत। मन्त्रिणश्चापि भूमीश बुद्धिसागरसंज्ञिनः ॥७२॥ स बुद्धिसागरो भूपं प्राह धर्मार्थकोविदः। राजन्नीयं पुष्करिणी वर्षाजलवती पुरा ॥७३॥ अद्यैनां बद्धवप्रां च कर्तुं जाता मतिर्मम। तद्भवन्मोदतां देव दत्तादाज्ञां च मेऽनघ ॥७४॥ इति श्रुत्वा वचस्तस्य मन्त्रिणो नृपसत्तमः। मुमुदेऽतितरां भूपः स्वयं कर्तुं समुद्यतः ॥७५॥ तमेव मन्त्रिणं तत्र युयोज शुभकर्मणि। ततो राजाज्ञया सोऽपि बुद्धिसागरको मुदा ॥७६॥ सरसीं सागरं कर्तुमुद्यतः पुण्यकृत्तमः। धनुषां चैव पञ्चाशत्सर्वतो विस्तृतायताम् ॥७७॥ सरसीं बद्धसुशिलां चकरागाधशम्बराम्। तां विनिर्माय सरसीं राज्ञे सर्वं न्यवेदयत् ॥७८॥ तस्यां ततः प्रभृति वै सर्वेऽपि वनचारिणः। पान्थाः पिपासिता भूप लभन्ते स्म जलं शुभम् ॥७९॥ कदाचित्स्वायुषश्चान्ते स मन्त्री बुद्धिसागरः। प्रमृतो गतवाँल्लोकं लोकशास्तुर्मम प्रभो ॥८०॥ तदर्थं तु मया पृष्टो धर्मो धर्मलिपिकरः। चित्रगुप्तस्तु तत्कर्म मह्यं सर्वं न्यवेदयत् ॥८१॥ सुना करता था ॥६१-६५॥ धर्म पूर्वक प्रजापालन करने वाले उस भूपति के देश में कोई भी अन्याय नहीं करता था और न कोई अधम था। उसका राज्य शुभ दायक स्वर्ग की कोटि में गिना जाने लगा। वह राजा एक दिन मृगया के लिए महावन में गया। वहाँ दुपहरी में मन्त्रियों के साथ इधर उधर घूमने लगा। दैवयोग से आखेट न पाकर अपने अनुचरों के सहित वह थक गया। उसी समय उसको एक सरोवर दिखाई दिया। उस सरोवर को सूखा देखकर सभी विचार करने लगे कि इस ऊँची भूमि पर किसने इस सरोवर को बनवाया। किस प्रकार इस सरोवर में जल प्राप्त किया जा सकता है, जिससे कि यह राजा अपनी पिपासा शान्त कर जीवित रह सके। नृपोत्तम ! शीघ्र ही उनको उसको खनने की युक्ति सूझ गई। तदनन्तर एक हाथ भूमि के खनने से जल निकल आया ॥६६-७१॥ उस जल को पीकर राजा तृप्त हो गया। भूमेश ! उसके बुद्धिसागर नामक मन्त्री को भी उस पानी के पीने से तृप्ति हुई। उस धर्मतत्त्वों के जानने वाले बुद्धिसागर ने राजा से कहा— राजन् ! यह पुष्करिणी (पोखरी) पहले वर्षा के जल से भरी हुई थी। आज इसको चारों ओर से बांध कर उत्तम बनवाने की मेरी इच्छा हो रही है, देव ! आप भी इसका अनुमोदन करें और हे अनघ ! इसके लिये मुझे आदेश दें ॥७२-७४॥ नृपसत्तम अपने मन्त्री की बातों को सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुये और स्वयं उस निर्माण कार्य के लिए तैयार हो गए और शुभ कर्म में उसी मन्त्री को नियुक्त कर दिया। तत्पश्चात् वह पुण्य- शील मन्त्री बुद्धिसागर भी प्रसन्न होकर उस सरसी को सागर (झील) बनाने के लिए उद्यत हो गया। चारों ओर पचास धनुष लम्बा और उतना ही चौड़ा सरोवर खनवाया और चारों ओर पत्थर से उसको बँधवा कर अगाध जल से परिपूर्ण करा दिया। इस प्रकार उस सरसी को सागर बनवा देने के बाद राजा से निवेदन किया। तब से उस सागर के स्वच्छ जल को सभी प्यासे जंगली जीव और पथिक पीने लगे। कुछ दिनों के अनन्तर आयु के क्षीण हो जाने से वह मन्त्री बुद्धिसागर मर गया और लोकों पर शासन करने वाले मेरे लोक में आया। उसके विषय में मैंने धर्मलिपिक चित्रगुप्त से पूछा। उसने उसके कर्मों को मुझसे कहा कि इसने १२-ना० पु०

६० नारदीयपुराणम् उपदेष्टा स्वयं चासौ धर्मकार्यस्य भूपते। तस्माद्धर्मविमानं तु समारोढुमिहार्हति ॥८२॥ इत्युक्ते चित्रगुप्तेन समाज्ञप्तो मया नृप। विमानं धर्मसंज्ञं तु आरोढुं बुद्धिसাগরः ॥८३॥ अथ कालान्तरे राजन्स राजावीरभद्रकः। मृतो ऽतो मम स्थानं नमश्चक्रे मुदान्वितः ॥८४॥ मया तु तत्र तस्यापि पृष्टं कर्माखिलं नृप। कथितं चित्रगुप्तेन धर्मं संसर्गसंभवम् ॥८५॥ तदा सम्यङ्मया राजा बोधितोऽद्यथा शृणु। अधित्यकायां भूपाल सैकतस्य गिरेः पुरा ॥८६॥ लावकेनामुना चञ्च्वा खातं द्व्यङ्गुलमम्बुनि। ततः कालान्तरे तेन वाराहेण नृपोत्तम ॥८७॥ खनितं हस्तमात्रं तु जलं तुण्डेन चात्मनः। ततोऽन्यदाऽमुया कात्या हस्तयुग्ममितः कृतः ॥८८॥ खातो जले महाराज तोयं मासद्वयं स्थितम्। पीतं क्षुद्रैर्वनेचरैः सत्त्वैस्तृष्णासमाकुलैः ॥८९॥ ततो वर्षत्रयान्ते तु गजेनानेन सुव्रत। हस्तत्रयमितः खातः कृतस्तत्राधिकं जलम् ॥९०॥ मासत्रयं स्थितं तच्च पयो जीवैर्वनेचरैः। भवांस्तत्र समायातो जलशोषानन्तरम् ॥९१॥ मासे तत्र तु संप्राप्तं हस्तं खात्वा जलं नृप। ततस्तयोपदेशेन मन्त्रिणो नृपते त्वया ॥९२॥ पञ्चाशद्धनुरुत्खातं जातं तत्र महाजलम्। पुनः शिलाभिः सुदृढं बद्धं जातं महत्सरः। वृक्षाश्च रोपितास्तत्र सर्वलोकोपकारिणः ॥९३॥ तेन स्वस्वेन पुण्येन पञ्चैते जगतीपते। विमानं धर्म्यमारूढास्त्वमप्येनं समारुह ॥९४॥ इति वाक्यं समाकर्ण्य मम राजा स भूमिप। आरुरोह विमानं तत्षष्ठो राजा समांशभाक् ॥९५॥ स्वयं भूपति को धर्म कार्य करने का उपदेश दिया है, अतः इस पुण्य के प्रभाव से यह धर्म-विमान पर आरोहण करने का अधिकारी है ॥७५-८२॥ चित्रगुप्त के ऐसा कहने पर मैंने बुद्धिसাগর को धर्मनामक विमान पर आरूढ़ होने का आदेश दे दिया। राजन् ! कुछ काल बीत जाने पर वह राजा वीरभद्रक भी मरकर मेरे यहाँ गया और प्रसन्नतापूर्वक मेरे सामने प्रस्तुत हुआ। नृप ! मैंने भी उसके सब कर्त्तव्यों का लेखा पूछा। चित्र- गुप्त ने उस सागर सम्बन्धी पुण्य को बताया ! उस समय हे राजन् ! मैंने जो कुछ उस राजा से कहा उसको भली भाँति सुनो ॥८३-८५३॥ भूपाल ! पहले इस लावक पक्षी ने जल में अपनी चोंच से दो अङ्गुल का गड्डा खोद दिया, नृपोत्तम कुछ समय के अनन्तर एक वाराह ने अपने थूथन से उसको एक हाथ लम्बा खोद डाला। तदनन्तर अन्य समय इस काली ने उसको बढ़ाकर दो हाथ का बना डाला। उस गड्ढे में जो जल इकट्ठा हुआ उसको वन के प्यासे क्षुद्र जीवों और अन्य प्राणी दो महीने तक पीते रहे। उत्तम व्रत वाले ! तदनन्तर तीन वर्ष बीत जाने पर इस हाथी ने उसको तीन हाथ और अधिक खनकर बढ़ा दिया जिससे उसमें और अधिक जल इकट्ठा हो गया ॥८६-६०॥ उस जल से तीन मास तक जल के आधार पर जीने वाले जंगली पशुओं की प्यास बुझती रही। यानी सूख जाने के बाद आप वहाँ पर आये। नृप ! उस समय उसको एक हाथ और खोदा गया और उसके जल से अनुचरों की प्यास बुझाई गई। तत्पश्चात् नृपते ! उस समय मन्त्री के उपदेश से तुमने उसको पचास धनुष (दो सौ-हाथ) लम्बा और उतना चौड़ा खुदवा दिया और वह झील के रूप में हो गया। पुनः पत्थरों से चारों ओर बँध जाने के कारण वह एक बहुत बड़ा और रमणीय सरोवर हो गया। पुनः सबका भला करने वाले वृक्ष भी किनारे पर लगा दिये गये ॥६१-६३॥ जगतीपते ! अपने-अपने उस पुण्य के प्रभाव से ये सभी धर्म विमान पर आरूढ़ हो गये हैं। तुम भी इस विमान पर चढ़ो। मेरी इन बातों को सुनकर वह राजा, जो उस पुण्य के समान अंश का छठा अधिकारी था, उस विमान पर आरूढ़ हुआ। तुमसे मैंने तड़ाग बनवाने से कुछ फल होता है, उसको इस कथा के द्वारा कह दिया। इस आख्यान को सुनकर मनुष्य अपने जन्म-मरण के बन्धन में

त्रयोदशोऽध्यायः ६१ इति ते सर्वमाख्यातं तडागजनितं फलम् । श्रुत्वैतन्मुच्यते पापादाजन्ममरणान्तिकात् ॥६६॥ यो नरः श्रद्धया युक्तो व्याख्यानं शृणुयात्पठेत् । सोऽप्याप्नोत्यखिलं पुण्यं सरोनिर्माणसंभवम् ॥६७॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे धर्माख्याने द्वादशोऽध्यायः ॥१२॥ अथ त्रयोदशोऽध्यायः धर्मराज उवाच देवायतनं यस्तु कुरुते कारयत्यपि । शिवस्यापि हरेर्वापि तस्य पुण्यफलं शृणु ॥१॥ मातुतः पितृतश्चैव लक्षकोटिकुलान्वितः । कल्पत्रयं विष्णुपदं तिष्ठत्येव न संशयः ॥२॥ मृदैव कुरुते यस्तु देवायतनं नरः । यावत्पुण्यं भवेत्तस्य तन्मे निगदतः शृणु ॥३॥ दिव्यदेहधरो भूत्वा विमानवरमास्थितः । कल्पत्रयं विष्णुपदे तिष्ठत्येव न संशयः ॥४॥ सृदैव कुरुते यस्तु देवायतनं नरः । यावत्पुण्यं भवेत्तस्य तन्मे निगदतः शृणु ॥५॥ दिव्यदेहधरो भूत्वा विमानवरमास्थितः । कल्पत्रयं विष्णुपदे स्थित्वा ब्रह्मपुरं व्रजेत् ॥६॥ कल्पद्वयं स्थितस्तत्र पुनः कल्पं वसेद्दिवि । ततस्तु योगिनामेव कुले जातो दयान्वितः ॥७॥ वैष्णवं योगमास्थाय मुक्तिं व्रजति शाश्वतीम् । दारुभिः कुरुते यस्तु तस्य स्याद्द्विगुणं फलम् ॥८॥ डालने वाले पापों से छूट जाता है। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक इस आख्यान को पढ़ता है, वह भी सरोवर बनवाने से जो कुछ फल मिलता है उसको प्राप्त करता है ॥६४-६८॥ श्रीनारदीयमहापुराण में धर्माख्यान नामक बारहवाँ अध्याय समाप्त ॥१२॥ अध्याय १३ धर्मराज बोले—जो मनुष्य शिव अथवा विष्णु का मन्दिर बनवाता है या बनाता है, उसको कौन सा पुण्य फल मिलता है, इसको सुनो ॥१॥ वह व्यक्ति मातृ और पितृ कुलकी लाखों पीढ़ियों के सहित तीन कल्प तक विष्णु लोक में रहता है, इसमें सन्देह नहीं । जो केवल मिट्टी से ही देव-मन्दिर बनवाता है, उससे जो पुण्य होता है, उसको कह रहा हूँ सुनो--वह व्यक्ति दिव्य रूप धारण कर उत्तम विमान पर आरूढ़ होता है और तीन कल्पों तक विष्णुलोक में सुखोपभोग कर पुनः ब्रह्मलोक में चला आता है ॥२-६॥ वहाँ दो कल्प तक रहकर पुनः स्वर्ग में चला आता और एक कल्प तक वहाँ रहता है । पुनः वह भाग्यशाली वहाँ से मृत्युलोक में आकर योगिकुल में जन्म लेता है और वैष्णव योग को प्राप्त कर शाश्वत मुक्ति को प्राप्त करता है । जो लकड़ी से मन्दिर बनवाता है उसको दूना फल मिलता है । ईंटों से मन्दिर बनवाने वाले को तिगुना और पत्थर से बनवाने वाले को चौगुना फल मिलता है, स्फटिक शिला से बनाने वाले को दशगुना फल मिलता है । ताम्रपत्र से बनवाने वाले को सौगुना

६२ नारदीयपुराणम् त्रिगुणं चेष्टकाभिस्तु शिलाभिस्तच्चतुर्गुणम् । स्फाटिकाभिः शिलाभिस्तु ज्ञेयं दशगुणेतरम् ॥८॥ ताम्रीभिस्तच्छतगुणं हेम्ना कोटिगुणं भवेत् । देवालयं तडागं वा ग्रामं वा पालयेत्तु यः ॥१०॥ कर्तुः शतगुणं तस्य पुण्यं भवति भूपते । देवालयस्य शुश्रूषां लेपसेचनलंडनैः ॥११॥ कुर्याद्यस्सततं भक्त्या तस्य पुण्यमनन्तकम् । वेतनाद्विष्टितो वापि पुण्यकर्मप्रवर्त्तिताः ॥१२॥ ते गच्छंति धराधाराः शाश्वतं वैष्णवं पदम् । तडागार्द्धफलं राजन्कासारे परिकीर्तितम् ॥१३॥ कूपे पादफलं ज्ञेयं वाप्यां पद्माकरोन्मितम् । वापीशतगुणं प्रोक्तं कुल्यायां भूपतेः फलम् ॥१४॥ दृषद्विभस्तु धनी कुर्यान्मृदा निष्किञ्चनो जनः । तयोः फलं समानं स्यादित्याह कमलोद्भवः ॥१५॥ दद्यादाढ्यस्तु नगरं हस्तमात्रमकिंचनः । भुवं तयोः समफलं प्राहुर्वेदविदो जनाः ॥१६॥ धनाढ्यः कुरुते यस्तु तडागं फलसाधनम् । दरिद्रः कुरुते कूपं समं पुण्यं प्रकीर्तितम् ॥१७॥ आश्रमं कारयेद्यस्तु बहुजन्तूपकारकम् । स याति ब्रह्मभुवनं कुलत्रयसमन्वितः ॥१८॥ धेनुर्वा ब्राह्मणो वापि यो वा को वापि भूपते । क्षणार्द्धं तस्य छायायां तिष्ठन्स्वर्गं नयेत्प्रभुम् ॥१९॥ आरामारका राजन्देवतागृहकारिणः । तडागग्रामकर्त्तारः पूज्यन्ते हरिणा सह ॥२०॥ सर्वलोकोपकारार्थं पुष्पारामं जनेश्वर । कुर्वते देवतार्थं वा तेषां पुण्यफलं शृणु ॥२१॥ तत्र यावन्ति पर्णानि कुसुमानि भवन्ति च । तावद्वर्षाणि नाकस्थो मोदते कुलकोटिभिः ॥२२॥ प्राकारकारिणस्तस्य कंटकावरणप्रदाः । प्रयान्ति ब्रह्मणः स्थानं युगानामेकसप्ततिम् ॥२३॥ तुलसीरोपणं ये तु कुर्वते मनुजेश्वर । तेषां पुण्यफलं राजन्वदतो मे निशामय ॥२४॥ और सुवर्ण से बनवाने वाले को करोड़ गुना फल मिलता है। जो बने हुए तड़ाग, मन्दिर या ग्राम की रक्षा या पुनः निर्माण कराता है उसको बनवाने वाले की अपेक्षा सौगुना अधिक फल मिलता है ॥७-१०१/२॥ जो स्वच्छता लिपाई और सजावट के द्वारा देव मन्दिर की भक्ति से सेवा करता है, उसको तो असंख्य पुण्य मिलता है। जो स्वयं अपनी इच्छा से अथवा प्रतियोगिता की भावना से पुण्य कर्मों में प्रवृत्त होते हैं वे पृथ्वी को सुशोभित करने करने वाले महापुरुष शाश्वत वैष्णव पद को प्राप्त करते हैं। राजन् ! तड़ाग की अपेक्षा कासार (छोटा तालाब) बनवाने में आधा फल, कुआँ बनवाने में चौथाई और बावली बनवाने में सरोवर-निर्माण तुल्य फल मिलता है। भूपते ! बावली से सौगुना फल कुल्या बनवाने से मिलता है। धनी लोग यदि पत्थर से बँधे घाट वाले तालाब आदि बनवावें और साधारण व्यक्ति मिट्टी का ही बनवावें तो भी दोनों को समान ही फल मिलता है, ऐसा स्वयं ब्रह्मा ने कहा है ॥११-१५॥ वेदज्ञों ने बतलाया है कि धनी व्यक्ति बड़े नगर का दान करे और दरिद्र व्यक्ति यदि एक हाथ भूमि का दान करे तो भी बराबर ही फल मिलता है। जो धनाढ्य व्यक्ति पुण्य देने वाले तड़ाग को बनवाता है उसको भी उतना ही फल मिलता है जितना एक साधारण व्यक्ति को कुआँ बनवाने से। जो बहुत लोगों की भलाई के लिए सत्यता पूर्वक किसी वस्तु की स्थापना करता है वह अपनी तीन पीढ़ियों के साथ ब्रह्म लोक को चला जाता है। धेनु और ब्राह्मण चाहे कैसा ही क्यों न हो, उस (वृक्ष आदि) की छाया में क्षण भर रह प्रतिष्ठापक को स्वर्ग को प्राप्त कराता है। राजन् ! वाटिका लगाने वाले, देवमन्दिर बनवाने वाले तड़ाग और गाँव बनवाने वाला व्यक्ति विष्णु के साथ पूजित होता है ॥१६-२०॥ जो सबकी भलाई के लिए या देवता की पूजा के लिए पुष्पवाटिका निर्माण कराता है उनके पुण्य फल को सुनो ॥२१॥ उस पुष्प वाटिका में जितनी पत्तियां या फूल होते हैं उतने वर्षों तक अपने कोटि वंशों के साथ आनन्द पूर्वक स्वर्ग में निवास करता है। उस वाटिका की रक्षा के लिए चहारदीवारी बनवाने वाले या कँटीले तार से घेर कर सुरक्षित बनाने वाले इकहत्तर युग तक ब्रह्म लोक में रहते हैं। मनुजेश्वर ! जो तुलसी का पौधा लगाते

६३ त्रयोदशोऽध्यायः सप्तकोटिकुलैर्युक्तो मातृतः पितृतस्तथा । वसेत्कल्पशतं साग्रं नारायणपदे नृप ॥२४॥ ऊर्ध्वपुण्ड्रधरो यस्तु तुलसीमूलमृत्स्नया । गोपिकाचन्दनेनापि वा चित्रकूटमृदापि वा । गङ्गामृत्सिकया चैव तस्य पुण्यफलं शृणु ॥२६॥ विमानवरमारूढो गन्धर्वाप्सरसां गणैः । संगीयमानचरितो मोदते विष्णुमंदिरे ॥२७॥ पत्राणि तुलसीमूलाद्यावन्ति पतितानि वै । तावन्ति ब्रह्महत्यादिपातकानि हतानि च ॥२८॥ तुलस्यां सेचयेद्यस्तु जलं चुलुकमात्रकम् । क्षीरोदवासिना सार्द्धं वसेदाचंद्रतारकम् ॥२६॥ ददाति ब्राह्मणानां यः कोमलं तुलसीदलम् । स याति ब्रह्मसदने कुलत्रितयसंयुतः ॥३०॥ शालग्रामेऽर्पयेद्यस्तु तुलस्यास्तु दलानि च । स वसेद्विष्णुभवने यावदाहूतसंप्लवम् ॥३१॥ कण्टकावरणं यस्तु प्राकारं वापि कारयेत् । सोऽप्येकविंशतिकुलैर्मोदते विष्णुमंदिरे ॥३२॥ योऽर्चयेद्धरिपादाब्जं तुलस्याः कोमलैर्दलैः । न तस्य पुनरावृत्तिर्विष्णुलौकान्नरेश्वर ॥३३॥ द्वादश्यां पौर्णमास्यां यः क्षीरेण स्नापयेद्धरिम् । कुलायुतयुतः सोऽपि मोदते वैष्णवे पदे ॥३४॥ प्रस्थमात्रेण पयसा यः स्नापयति केशवम् । कुलायुतायुतवृतः सोऽपि विष्णुपुरे वसेत् ॥३५॥ घृतप्रस्थेन यो विष्णुं द्वादश्यां स्नापयेन्नरः । कुलकोटियुतो राजन्सायुज्यं लभते हरेः ॥३६॥ पञ्चामृतेन यः स्नानमेकादश्यां तु कारयेत् । विष्णोः सायुज्यकं तस्य भवेत्कुलशतायुतैः ॥३७॥ एकादश्यां पौर्णमास्यां द्वादश्यां वा नृपोत्तम । नालिकेरोदकैर्विष्णुं स्नापयेत्तत्फलं शृणु ॥३८॥ दशजन्मार्जितैः पापैर्विमुक्तो नृपसत्तम । शतद्वयकुलैर्युक्तो मोदते विष्णुना सह ॥३६॥ हैं राजन् ! उनके पुण्यों को बता रहा हूँ सुनो ॥२२-२४॥ हे नृप ! वह माता और पिता कुल की सात करोड़ पीढ़ियों के सहित सौ कल्पों तक नारायण लोक में निवास करता है। जो तुलसी मूल की मिट्टी से ऊर्ध्व पुण्ड्र लगाता है, अथवा गोपी चन्दन या चित्रकूट की मिट्टी या गंगा की मिट्टी का चन्दन लगाता है उसके पुण्य फल को सुनो--वह श्रेष्ठ विमान पर आरूढ़ होकर गन्धर्व और अप्सराओं के द्वारा अपनी स्तुति सुनता हुआ विष्णु भवन में आनन्द प्राप्त करता है। तुलसी वृक्ष के मूल से जितनी पत्तियां गिरती हैं उतने ब्रह्महत्यादि पातक नष्ट हो जाते हैं । जो तुलसी की जड़ को एक चुल्लू जल से भी सींचता है, वह प्रलय पर्यन्त क्षीरशायी विष्णु के साथ निवास करता है ॥२५-२६॥ जो ब्राह्मणों को तुलसी की कोमल पत्तियां प्रदान करता है वह अपनी तीन पीढ़ियों के साथ ब्रह्मलोक में निवास करता है। जो शालग्राम की मूर्ति पर तुलसी पत्र समर्पित करता है, वह कल्प पर्यन्त विष्णु भवन में रहता है। जो कांटेदार तार से घेराव करा देता या चहारदीवारी बनवा देता है वह अपनी इक्कीस कुल परम्परा के साथ विष्णु मन्दिर में आनन्द पूर्वक निवास करता है । जो भगवान् के कमलवत् चरणों की तुलसी की कोमल पत्तियों से पूजा करता है, नरेश्वर ! उसको पुनः विष्णु लोक से लौटना नहीं पड़ता ॥३०-३३॥ द्वादशी और पूर्णमासी के दिन जो दूध से भगवान् को नहलाता है वह अपने दश हजार कुलों के सहित विष्णुलौक में सुख भोग करता है। जो केशव को एक प्रस्थ (सेर) दूध से स्नान कराता हे वह भी अपनी एक लाख वंश परम्परा के साथ विष्णु लोक में निवास करता है। जो मनुष्य एक सेर घी से द्वादशी के दिन विष्णु को स्नान करता है, वह अपने कोटि कुल के साथ विष्णु की सायुज्य मुक्ति प्राप्त करता है। जो एकादशी के दिन पंचामृत से विष्णु भगवान् को नहलाता है वह अपने सौ कुल के साथ विष्णु की सायुज्य मुक्ति प्राप्त करता है ॥३४-३७॥ नृपोत्तम ! जो एकादशी, द्वादशी और पूर्णिमा के दिन नारियल के जल से विष्णु को स्नान कराता है उसका फल सुनो-नृपोत्तम ! वह अपने दश जन्म के पापों से मुक्त होकर अपनी दो सौ कुल परम्परा के साथ विष्णुलौक में भगवान् के साथ परमानन्द प्राप्त करता है। भूपते ! गन्ने के

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[पृष्ठ शीर्ष] ६४ नारदीयपुराणम्


संस्कृत श्लोक

इक्षुतोयेन देवेशं यः स्नापयति भूपते । केशवं लक्षपितृभिः सार्द्धं विष्णुपदं व्रजेत् ॥४०॥ पुष्पोदकेन गोविन्दं तथा गन्धोदकेन च । स्नापयित्वा हरिं भक्त्या वैष्णवं पदमाप्नुयात् ॥४१॥ जलेन वस्त्रपूतेन यः स्नापयति माधवम् । सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुना सह मोदते ॥४२॥ क्षीराद्यैः स्नापयेद्यस्तु रविसंक्रमणे हरिम् । स वसेद्विष्णुसदने त्रिसप्तपुरुषैः सह ॥४३॥ शुक्लपक्षे चतुर्दश्यामष्टम्यां पूर्णिमादिने ॥४४॥ एकादश्यां भानुवारे द्वादश्यां पञ्चमीतियौ । सोमसूर्योपरागे च मन्वादिषु युगादिषु ॥४५॥ अर्द्धोदये च सूर्यस्य पुष्यार्के रोहिणीबुधे । तथैव शनिरोहिण्यां भौमाश्विन्यां तथैव च ॥४६॥ शन्य भार्गवमृगे चैव भृगुरेवतिसङ्गमे । तथा बुधानुराधायां श्रवणार्के तथैव च ॥४७॥ तथा च सोमश्रवणे हस्तयुक्ते बृहस्पतौ । बुधाष्टम्यां बुधाषाढे पुण्ये चान्ये दिने तथा ॥४८॥ स्नापयेत्पयसा विष्णुं शान्तिमान् वाग्यतः शुचिः । घृतेन मधुना वापि दध्ना वा तत्फलं शृणु ॥४९॥ सर्वयज्ञफलं प्राप्य सर्वपापविवर्जितः । वसेद्विष्णोः पुरे सार्द्धं त्रिसप्तपुरुषैर्नृप ॥५०॥ तत्रैव ज्ञानमासाद्य योगिनामपि दुर्लभम् । मोक्षमाप्नोति नृपते पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥५१॥ कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां सोमवारे च भूपते । शिवं संस्नाप्य दुग्धेन शिवसायुज्यमाप्नुयात् ॥५२॥ नालिकेरोदकेनापि शिवं संस्नाप्य भक्तितः । अष्टम्यामिन्दुवारे वा शिवसायुज्यमश्नुते ॥५३॥ शुक्लपक्षे चतुर्दश्यामष्टम्यां वापि भूपते । घृतेन मधुना स्नाप्य शिवं तत्साम्यतां व्रजेत् ॥५४॥ तिलतैलेन संस्नाप्य विष्णुं वा शिवमेव च । स याति तत्तत्सारूप्यं पितृभिः सह सप्तभिः ॥५५॥ शिवमिक्षुरसेनापि यः स्नापयति भक्तितः । शिवलोके वसेत्कल्पं स सप्तपुरुषैः सह ॥५६॥


हिन्दी अनुवाद

रस से जो देवेश विष्णु को को नहलाता है वह अपने लाख पितरों के सहित विष्णुलोक को जाता है। जो पुष्प मिश्रित जल और सुगन्धित जल से हरि को भक्ति पूर्वक स्नान कराता है वह वैष्णव पद को प्राप्त करता है। ॥३८-४१॥ जो मनुष्य कपड़े से छने हुए जल से माधव को नहलाता है वह सब पापों से मुक्त होकर विष्णु के साथ आनन्द प्राप्त करता है। जो सूर्य ग्रहण के समय दूध आदि से भगवान् हरि को नहलाता है, वह इक्कीस कुल पुरुषों के साथ विष्णुलोक में निवास करता है ॥४२-४३॥ शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी, अष्टमी, पूर्णमासी एकादशो, रविवार, द्वादशी और पंचमी तिथि को, एवं चन्द्र और सूर्य के ग्रहण के समय, मन्वादि काल, युगादिकाल, सूर्य के अर्द्धोदय काल में, पुष्य के सूर्य, रोहिणी के बुध और शनि, अश्विनी के मंगल, शनि के शुक्र और चन्द्रमा, रेवती और शुक्र के संगम, अनुराधा के बुध, श्रवण के सूर्य एवं चन्द्रमा, हस्तनक्षत्र के बृहस्पति अष्टमीतिथि को बुध पड़ने पर, आषाढ़ में बुध के दिन अथवा अन्य पुण्य पर्वों पर जो मनुष्य शान्त और मौन होकर पवित्र भाव से दूध, घी, मधु या दही से भगवान् विष्णु को नहलाता हैं, उसका फल सुनो ॥४४-४६॥ नृप ! वह व्यक्ति सब पापों से मुक्त हो जाता और सब यज्ञों का फल पाकर अपने इक्कीस कुलों के साथ विष्णुलोक में निवास करता है। वहीं योगियों के लिए भी दुर्लभ ज्ञान को प्राप्त कर आवागमन से रहित निर्वाण को प्राप्त करता है। भूपते ! कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी और सोमवार के दिन शिव को दूध से नहलाने से शिवसायुज्य प्राप्त होता है। अष्टमी या सोमवार को भक्ति पूर्वक नारियल के जल से शिव को नहलाने से शिव सायुज्य प्राप्त होता है। शुक्ल-पक्ष की चतुर्दशी या अष्टमी को घृत और मधु से शिव को स्नान कराने से शिव साम्य प्राप्त होता है ॥५०-५४॥ तिल के तेल से विष्णु अथवा शिव को नहलाने से वह व्यक्ति अपनी सात पीढ़ियों के साथ शिव या विष्णु का सारूप्य प्राप्त करता है। जो शिव को गन्ने के रस से भक्ति पूर्वक स्नान कराता है, वह कल्पान्त तक सात कुलों के साथ शिव लोक में निवास करता है। जो देवोत्थान एकादशो और