बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८२ नारदीयपुराणम् काव्यं हस्तस्थदर्भग्रं तच्छिद्रे संन्यवेशयत् । दर्भाग्रेडभून्महाशस्त्रं कोटिसूर्यसमप्रभम् ॥१७५॥ अमोघं ब्राह्ममत्युग्रं काव्याक्षिग्रासलोलुपम् । आदाय भार्गवमुरानसुरानेकचक्षुषा ॥१७६॥ पश्येति व्यादिदेश च दर्भाग्रं शस्त्रसन्निभम् । बलिर्ददौ महाविष्णोर्महीं त्रिपदसंमिताम् ॥१७७॥ ववृधे सोऽपि विश्वात्मा आब्रह्मभुवनं तदा । अमिमीत महीं द्वाभ्यां पद्भ्यां विश्वतनुर्हरिः ॥१७८॥ स आब्रह्मकटाहांतपदान्येतानि सप्रभः । पादाङ्गुष्ठाग्रनिर्भिन्नं ब्रह्माण्डं बिभिदे द्विधा ॥१७९॥ तद्वारा बाह्यसलिलं बहुधारं समागतम् । धौतविष्णुपदं तोयं निर्मलं लोकपावनम् ॥१८०॥ अजाण्डबाह्यनिलयं धाराशरूपमवर्त्तत । तज्जलं पावनं श्रेष्ठं ब्रह्मादीन्पावयत्सुरान् ॥१८१॥ सप्तर्षिसेवितं चैव न्यपतन्मेरूमूर्द्धनि । एतद्दृष्ट्वाद्वभुतं कर्म ब्रह्माद्या देवतागणाः । ऋषयो मनवश्चैव ह्यस्तुवन्हर्षविह्वलः ॥१८३॥ देवा ऊचुः नमः परेशाय परात्मरूपिणे परात्परायावररूपधारिणे । ब्रह्मरात्मने ब्रह्मरतात्मबुद्धये नमोऽस्तु तेऽव्याहतकमेकशीलिने ॥१८४॥ परेश परमानन्द परमात्मन्परात्पर । सर्वात्मने जगन्मूर्त्ते प्रमाणातीत ते नमः ॥१८५॥ विश्वतश्चक्षुषे तुभ्यं विश्वतो बाहवे नमः । विश्वतः शिरसे चैव विश्वतो गतये नमः ॥१८६॥ एवं स्तुतो महाविष्णुर्ब्रह्माद्यैः स्वर्द्दिवौकसाम् । दत्त्वाभयं च मुमुदे देवदेवः सनातनः ॥१८७॥ पृथिवी दान देने के लिए हाथ में पकड़ा। सर्वज्ञ विष्णु ने जलधारा को रोकने के लिए कमण्डल के छिद्र पर बैठे शुक्र को जान लिया और अपने हाथ के कुश के अग्रभाग को उस कमण्डलु की नलिका में चुभो दिया उस कुश की नोक कोटि सूर्य के समान प्रभावान्, अति कठोर, अमोघ तथा शुक्राचार्य के नेत्र को कवलित करने के लिए लोलुप ब्रह्म अस्त्र के समान कोई महान् शस्त्र हो गई । तब शस्त्र के समान उस कुश के अग्रभाग को वामन ने यह कहते हुए कि हे शुक्राचार्य ! देवों और असुरों को एक आँख से देखो, शुक्राचार्य के नेत्र में घुसेड़ दिया। तब बलि ने महाविष्णु को तीन पद परिमित पृथ्वी दे दी ॥१६६-१७७॥ तत्पश्चात् विश्वात्मा हरि ने ब्राह्म लोक तक अपना आकार बढ़ा दिया और उस विश्वरूप हरि ने दो ही डगों से पृथ्वी को नाप डाला। उस परम तेजस्वी ने अपने डगों से सारे ब्रह्माण्ड को नाप दिया। उसी समय उसके पैर के अंगूठे के नख से ब्रह्माण्ड दो भागों में बँट गया। उस ब्रह्माण्ड के मध्य से जल की अनेक धारायें बह निकलीं। विष्णु के चरण को धोने वाली जलधारा ब्रह्माण्ड के बाह्य आश्रयभूत धारा रूप में बहने लगी और वह पुनीत धारा ब्रह्मा आदि सुरों को पवित्र करती हुई सप्तर्षि से सुशोभित सुमेरु पर्वत के शिखर पर गिरी ॥१७८-१८२॥ इस आश्चर्य-जनक कार्य को देखकर देवगण, ऋषि, मुनि और मनुगण आनन्द से विह्वल होकर भगवान् की स्तुति करने लगे ॥१८३॥ देवगण बोले-महाप्रभु, परात्मस्वरूप, परात्पर और अपर रूपधारी को नमस्कार है। ब्रह्मस्वरूप, ज्ञानरत, आत्मबुद्ध और अबाध कर्म करने वाले को नमस्कार है। परेश ! परमानन्द ! परमात्मन् ! परात्पर ! प्रमाण से परे ! जगन्मूर्त्ति ! सर्वात्मा ! प्रमाणातीत ! आपको नमस्कार है। विश्वतश्चक्षु (चारों ओर दृष्टि रखने वाले) विश्वतो बाहु (अनन्त भुजवाले) तुमको नमस्कार है। विश्वतः शिरस् (अनन्त शिर वाले) सर्वत्र गति वाले तुमको नमस्कार है। ब्रह्मा आदि देवों की ऐसी स्तुति सुनकर देवाधिदेव सनातन देव प्रसन्न हो गए और देवताओं को अभय वर दिया। अब तृतीय डग के लिए उपयुक्त भूमि न पाकर उन्होंने बलि को नांध दिया। इस प्रकार बलि को सर्वथा शरणागत