भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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एकादशोऽध्यायः ८१

यद्दत्त्वा समवाप्नोति यद्यदिष्टतमं नरः । इति निश्चित्य मतिमान्धीरो भद्रमतिर्बले ।।१५८।। कौशाम्बींनाम नगरीं कलत्रापत्ययुग्गयौ । सुघोषं नामविप्रेन्द्रं सर्वैश्वर्यसमन्वितम् ।।१५९।। गत्वा याचितवान्भूमिं पञ्चहस्तायतां बले । सुघोषो धर्मनिरतस्तं निरीक्ष्य कुटुम्बिनम् ।।१६०।। मनसा प्रीयमाणेन समभ्यर्च्येदमब्रवीत् । कृतार्थोऽहं भद्रमते सफलं मम जन्म च ।।१६१।। मत्कुलं पावनं जातं त्वदनुग्रहतो द्विज । इत्युक्त्वा तं समभ्यर्च्य सुघोषो धर्मतत्परः ।।१६२।। पञ्चहस्तस्थितां भूमिं ददौ तस्मै महामतिः । पृथिवी वैष्णवी पुण्या पृथिवी विष्णुपालिता ।।१६३।। पृथिव्यास्तु प्रदानेन प्रीयतां मे जनार्दनः । मन्त्रेणानेन दैत्येन्द्र सुघोषस्तं द्विजोत्तमम् ।।१६४।। विष्णुबुद्ध्या समभ्यर्च्य तावतीं पृथिवीं ददौ । सोऽपि भद्रमतिर्विप्रो धीमता याचितां भुवम् ।।१६५।। दत्त्वान्हरिभक्ताय श्रोत्रियाय कुटुम्बिने । सुघोषो भूमिदानेन कोटिवंशसमन्वितः ।।१६६।। प्रपेदे विष्णुभवनं यद् गत्वा न शोचति । बले भद्रमतिश्चापि यतः प्रार्थितवाञ्छ्रियम् ।।१६७।। स्थितवान्विष्णुभवने सकुंटुम्बो युगायुतम् । तथैव ब्रह्मसदने स्थित्वा कोटियुगायुतम् ।।१६८।। ऐन्द्रं पदं समासाद्य स्थितवान्कल्पपञ्चकम् । ततो भुवं समासाद्य सर्वैश्वर्यसमन्वितः ।।१६९।। जातिस्मरो महाभागो बुभुजे भोगमुत्तमम् । ततो भद्रमतिर्दैत्यो निष्कामो विष्णुतत्परः ।।१७०।। पृथिवीं वृत्तिहीनेभ्यो ब्राह्मणेभ्यः प्रदत्तवान् । तस्य विष्णुः प्रसन्नात्मा तस्मैश्वर्यमनुत्तमम् ।।१७१।। कोटिवंशसमेतस्य ददौ मोक्षमनुत्तमम् । तस्माद्दैत्यपते मह्यं सर्वधर्मपरायण ।।१७२।। तपश्चरिष्ये मोक्षाय देहि मे त्रिपदां महीम् । वैरोचनिस्ततो हृष्टः कलशं जलपूरितम् ।।१७३।। आददे पृथिवीं दातुं वर्णिने वामनाय हि । विष्णुः सर्वगतो ज्ञात्वा जलधारावरोधिनम् ।।१७४।।

अभीष्ट को प्राप्त करता है । बलि ! इस प्रकार मतिमान् भद्रमति अपने मन में निश्चय कर अपनी स्त्री और सन्तति के साथ कौशाम्बी नगर में गया । बलि ! जहाँ जाकर सब ऐश्वर्यों से विभूषित सुघोष नामक विप्रेन्द्र के पास जाकर पाँच हाथ परिमित भूमि की याचना की । धार्मिक सुघोष उस बहुकुटुम्बी ब्राह्मण को देखकर मन ही मन बहुत प्रसन्न हुआ और उस सौम्य अतिथि की पूजा कर बोला— 'भद्रमति ! आज मैं कृतार्थ हो गया, मेरा जन्म सफल हो गया ।।१५६-१६१।। द्विज ! तुम्हारे इस अनुग्रह से मेरा कुल पवित्र हो गया ।' यह कहकर धार्मिक सुघोष ने उस विप्र की पूजा की और उस महामति ने— 'पृथ्वी वैष्णवी है, पवित्र और और विष्णु द्वारा रक्षित है, इस पृथ्वी के दान से जनार्दन मेरे ऊपर प्रसन्न हों' इस मन्त्र को पढ़कर विष्णु भावना से उस द्विजवर की पूजा कर उतनी भूमि दे दी । उस भद्रमति ने भी उस दान में प्राप्त पृथ्वी को किसी कुटुम्बी वेदपाठी हरि भक्त को दे दिया ।।१६२-१६५।। सुघोष ने उस भूदान के प्रभाव से करोड़ों वंशजों से युक्त होकर विष्णुलोक को प्राप्त किया जहाँ जाकर मनुष्य शोक-मोह से मुक्त हो जाता है । बलि ! यतः भद्रमति ने भी लक्ष्मी की कामना की अतः वह विष्णुलोक में कुटुम्ब सहित दस हजार वर्ष तक निवास किया, उसी प्रकार ब्रह्मलोक में दस हजार करोड़ युग तक रहने के बाद पाँच कल्प तक इन्द्र- पद पाकर सुख भोगता रहा । तदनन्तर पृथ्वी पर आकर सब प्रकार के विभवों का भोग करने वाला ब्राह्मण हुआ, पूर्व पुण्य के प्रभाव से उसको इस जीवन में भी पूर्व जन्मों का ज्ञान था । अनेकों प्रकार के भोग करने के बाद उस विष्णुभक्त भद्रमति निष्काम भावना में जीविकाहीन दरिद्र ब्राह्मणों को पृथ्वी का दान किया । उस पर विष्णु प्रसन्न हो गए और उन्होंने करोड़ वंश सन्तति सहित उस ब्राह्मण को परमोत्तम मोक्ष रूपी ऐश्वर्य दे दिया । इसलिए दैत्यपति ! सर्व-धर्म-परायण ! मैं मोक्ष के लिए तपस्या करूँगा, तुम मुझे तीन पग परिमित भूमि दे दो । बलि यह सुनकर प्रसन्न हो गया और उसने जल से भरे कमण्डल को उस ब्रह्मचारी वामन को

११—ना० पु०