बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८० नारदीयपुराणम् आसु पत्नीषु तस्यासञ्चत्वारिंशच्छतद्वयम् । पुत्राणामसुरश्रेष्ठ सर्वे नित्यं बुभुक्षिताः ॥१४२॥ अकिञ्चनो भद्रमतिः क्षुधार्त्तानात्मजाञ्श्रियः । पश्यन्स्वयं क्षुधार्त्तश्च विललापाकुलेन्द्रियः ॥१४३॥ धिग्जन्म भाग्यसहितं धिग्जन्म धनवर्जितम् । धिग्जन्म धर्मरहितं धिग्जन्म ख्यातिवर्जितम् ॥१४४॥ नरस्य बह्वपत्यस्य धिग्जन्मैश्वर्यवर्जितम् । अहो गुणाः सौम्यता च विद्वत्ता जन्म सत्कुले ॥१४५॥ दारिद्र्याम्बुधिमग्नस्य सर्वमेतन्न शोभते । प्रियाः पुत्राश्च पौत्राश्च बान्धवा भ्रातरस्तथा ॥१४६॥ शिष्याश्च सर्वमनुजास्त्यजन्त्यैश्वर्यवर्जितम् । चाण्डालो वा द्विजो वापि भाग्यवानेव पूज्यते ॥१४७॥ दरिद्रः पुरुषो लोके शववल्लोकनिन्दितः । अहो संपत्समायुक्तो निष्ठुरो वाप्यनिष्ठुरः ॥१४८॥ गुणहीनोऽपि गुणवान्मूर्खो वाप्यथ पण्डितः । ऐश्वर्यगुणयुक्तश्चेत्पूज्य एव न संशयः ॥१४९॥ अहो दरिद्रता दुःखं तत्राप्याशातिदुःखदा । आशाभिभूताः पुरुषा दुःखमश्नुवतेऽक्षयम् ॥१५०॥ आशाया दासा ये दासास्ते सर्वलोकस्य । आशा दासी येषां तेषां दासायते लोकः ॥१५१॥ मानो हि महतां लोके धनमक्षयमुच्यते । तस्मिन्नाशाख्यरिपुणा माने नष्टे दरिद्रता ॥१५२॥ सर्वशास्त्रार्थवेत्तापि दरिद्रो भाति मूर्खवत् । नैष्किञ्चन्यमहाग्राहग्रस्तानां को विमोचकः ॥१५३॥ अहो दुःखमहो दुःखमहो दुःखं दरिद्रता । तत्रापि पुत्रभार्याणां बाहुल्यमतिदुःखदम् ॥१५४॥ एवमुक्त्वा भद्रमतिः सर्वशास्त्रार्थपारगः । अन्यमैश्वर्यदं धर्मं मनसाऽचिन्तयत्तदा ॥१५५॥ भूमिदानं विनिश्चित्य सर्वदानोत्तमोत्तमम् । दानेन योऽनुमंताति स एव कृतवान्पुरा ॥१५६॥ प्रापकं परमं धर्मं सर्वकामफलप्रदम् । दानानामुत्तमं दानं भूदानं परिकीर्तितम् ॥१५७॥ इन पत्नियों से उसको दो सौ चालीस पुत्र हुए जो द्रव्याभाव के कारण सर्वदा भूखे रह जाते थे ॥१३६-१४२॥ दरिद्र और क्षुधातुर भद्रमति अपने पुत्रों और प्रिय पत्नियों को भूख से पीड़ित देखकर घबराकर विलाप करने लगा १४३॥ भाग्यहीन जीवन को धिक्कार है । धनहीन जीवन को धिक्कार है। इसी प्रकार यशहीन और अधार्मिक जीवन को भी धिक्कार है । अधिक पुत्रवाले परन्तु दरिद्र पिता के जीवन को धिक्कार है। अहो ! दरिद्रता के समुद्र में डूबे हुए व्यक्ति के लिए उसके सद्गुण, सौम्य स्वभाव, विद्वत्ता और उत्तम कुल में जन्म आदि सब कुछ व्यर्थ है । प्रिय पत्नी, पुत्र, पौत्र, बन्धु तथा भाई, शिष्य और सभी मनुष्य दरिद्र व्यक्ति को सर्वथा छोड़ देते हैं। भाग्यवान् चाहे चाण्डाल हो या ब्राह्मण उसी की पूजा होती है ॥१४४-१४७॥ इस लोक में दरिद्र व्यक्ति शव के समान निन्दित होता है । आश्चर्य है कि धनी व्यक्ति कठोर होते हुए भी दयालु है, गुणहीन होते हुए भी गुणी है और मूर्ख होते हुए भी पण्डित है । सत्य भी है, ऐश्वर्य रूपी गुण के कारण वह पूज्य ही है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं । अहो ! दरिद्रता भी क्या महान् दुःख है ? इस पर भी आशा तो और अधिक दुःखदायिनी है । आशा से ग्रस्त मानव सर्वदा दुःख का ही भोग करता है । जो आशा के दास हैं वे सबके दास हैं, और आशा जिसकी दासी है (अर्थात् जो आशा हीन हैं) उनका सारा संसार दास है। संसार में प्रतिष्ठा ही अक्षय धन कहा गया है। आशारूपी शत्रु के द्वारा उस मान के नष्ट हो जाने पर दरिद्रता निश्चित रूप से आ जाती है ॥१४८-१५२॥ सर्व शास्त्रों का ज्ञाता भी दरिद्र होने के कारण मूर्ख के समान ही है। दरिद्रतारूपी महाग्राह के मुख में फँसे व्यक्ति का कौन उद्धारक है ? अहो ! दरिद्रता भी क्या ही दुःख है ? दुःख ही नहीं, महान् दुःख है, तिस पर भी अधिक पुत्र और पत्नी का होना तो और कष्टकर है।' इस प्रकार कहकर सब शास्त्रों का पारगामी विद्वान् भद्रमति ऐश्वर्य देने वाला कौन-सा धर्म है, इसको सोचने लगा ॥१५३-१५५॥ निश्चय किया कि भूमिदान ही सब दानों में उत्तम दान है । जो पहले दान के द्वारा दूसरों को सन्तुष्ट करता है वही कृतकृत्य होता है। दानों में सर्वोत्तम दान भूमि दान ही कहा गया है । यही सब कामनाओं को देनेवाला, परम पुण्यप्रद धर्म है, जिसको देकर मनुष्य अपने