भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 98, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 98

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दशमोऽध्यायः ७६ सत्पात्रे भूमिदाता यः सर्वदानफलं लभेत् । भूमिदानसमं नान्यत्त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥१२७॥ द्विजाय वृत्तिहीनाय यः प्रदद्यान्महीं बले । तस्य पुण्यफलं वक्तुं न क्षमोऽब्दशतैरहम् ॥१२८॥ सक्ताय देवपूजासु वृत्तिहीनाय दैत्यप । स्वल्पामपि महीं दद्याद्यः स विष्णुर्न संशयः ॥१२९॥ इक्षुगोधूमतुवरीपूगवृक्षादिसंयुता । पृथ्वी प्रदीयते येन स विष्णुर्नात्र संशयः ॥१३०॥ वृत्तिहीनाय विप्राय दरिद्राय कुटुम्बिने । स्वल्पामपि महीं दत्त्वा विष्णुसायुज्यमाप्नुयात् ॥१३१॥ सक्ताय देवपूजासु विप्रायाढकिकां महीम् । दत्त्वा लभेत गङ्गायां त्रिरात्रस्नानजं फलम् ॥१३२॥ विप्राय वृत्तिहीनाय सदाचाररताय च । द्रोणिकां पृथिवीं दत्त्वा यत्फलं लभते शृणु ॥१३३॥ गङ्गातीर्थाश्वमेधानां शतानि विधिवन्नरः । कृत्वा यत्फलमाप्नोति तदाप्नोति स पुष्कलम् ॥१३४॥ ददाति खारिकां भूमिं दरिद्राय द्विजाय यः । तस्य पुण्यं प्रवक्ष्यामि वदतो मे निशामय ॥१३५॥ अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयशतानि च । विधाय जाह्नवीतीरे यत्फलं तल्लभेदध्रुवम् ॥१३६॥ भूमिदानं महादानमतिदानं प्रकीर्तितम् । सर्वपापप्रशमनमपवर्गफलप्रदम् ॥१३७॥ अत्रेतिहासं वक्ष्यामि शृणु दैत्यकुलेश्वर । यच्छ्रुत्वा श्रद्धया युक्तो भूमिदानफलं लभेत् ॥१३८॥ आसीत्पुरा द्विजवरो ब्राह्मकल्पे महामतिः । दरिद्रो वृत्तिहीनश्च नाम्ना भद्रमतिर्बले ॥१३९॥ श्रुतानि सर्वशास्त्राणि तेन वेदविदानिशम् । श्रुतानि च पुराणानि धर्मशास्त्राणि सर्वशः ॥१४०॥ अभवंस्तस्य षट्पत्न्यः श्रुतिः सिन्धुर्यशोवती । कामिनी मालिनी चैव शोभा चेति प्रकीर्तिताः ॥१४१॥ भूमिदाता ही मोक्ष का भागी होता है। इसी को सब पापों को नष्ट करने वाला श्रेष्ठ दान कहा गया है। सब पापों का करने वाला अथवा महापापी भी केवल दश हाथ भूमि का दान करने से पापों से मुक्त हो जाता है। योग्य व्यक्ति को भूमि दान करने से दाता सब दानों का फल पा जाता है। भूमिदान के समान तीनों लोकों में कोई दान नहीं है ॥१२४-१२७॥ बलि ! जीविकाहीन ब्राह्मण को जो भूमि दान करता है, उसके पुण्य फल को सौ वर्षों में भी मैं नहीं कह सकता हूँ ।१२८। दैत्यपति ! जीविकाहीन और सर्वदा देवाराधन में लगा रहने वाले ब्राह्मण को थोड़ी सी भी पृथ्वी का दान देने से दाता विष्णुतुल्य हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं। ईख, गेहूँ, अरहर और सुपारी के वृक्ष से युक्त पृथ्वी का जो दान करता है वह विष्णुरूप हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं ॥१२९-१३०॥ जीविकाहीन, दरिद्र और बहुकुटुम्बी ब्राह्मण को थोड़ी सी भी पृथ्वी का दान देने से मनुष्य विष्णुलीन हो जाता है। देवाराधन में तत्पर रहने वाले विप्र को अरहर वाली भूमि देने से गंगा में तीन रात्रि स्नान करने के समान फल मिलता है। जीविकाहीन, सदाचारी विप्र को द्रोणिका (एक नाप) परिमित भूमि देने से जो फल मिलता है उसको सुनो—गंगा तीर्थ और विधिपूर्वक सौ अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न करने से जो अक्षय फल मनुष्य को मिलता है वह फल उस दानी को मिलता है। जो दरिद्र ब्राह्मण को खारिका परिमित भूमि प्रदान करता है उसके पुण्यों को मैं बतला रहा हूँ सुनो—गंगा तट पर सहस्र अश्वमेध, सौ वाजपेय करने से जो फल प्राप्त होता है वह उसको मिलता है, यह ध्रुव है ॥१३१-१३६॥ भूमिदान, महादान और परमोत्कृष्ट दान कहा गया है, यह सब पापों को मिटाने वाला और मोक्ष फल देने वाला है। दैत्य कुल के स्वामी ! सुनो, मैं इस विषय में एक प्राचीन आख्यान सुना रहा हूँ जिसको श्रद्धापूर्वक सुनने से भी भूमिदान का फल मिलता है ॥१३७-१३८॥ बले ! प्राचीन काल में ब्राह्मकल्प में भद्रमति नामक एक महाबुद्धिमान् ब्राह्मण था। वह अति दरिद्र और आश्रय- हीन था। वह रात-दिन सब शास्त्रों का अध्ययन किया करता था, और सब धर्मशास्त्रों तथा पुराणों का भी श्रवण करता था। उसकी श्रुति, सिन्धु, यशोवती, कामिनी, मालिनी और शोभा नाम की छः पत्नियाँ थीं। असुरश्रेष्ठ !

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