बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७८ नारदीयपुराणम् कृतार्थोऽस्मि कृतार्थोऽस्मि कृतार्थोऽस्मि न संशयः। तस्मात्तुभ्यं नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं नमो नमः ॥११२॥ त्वदाज्ञया त्वन्नियोगं साधयामीति मन्मनः। अत्युत्साहसमायुक्तं समाज्ञापय मां प्रभो ॥११३॥ एवमुक्तो दीक्षितेन प्रहसन्वामनोऽब्रवीत् । देहि मे तपसि स्थातुं भूमिं त्रिपदसंमिताम् ॥११४॥ एतच्छ्रुत्वा बलिः प्राह राज्यं याचितवान्नहि। ग्रामं वा नगरं वापि धनं वा किं कृतं त्वया ॥११५॥ तन्निशम्य बलिं प्राह विष्णुःसर्वशरीरभृत् । आसन्नभ्रष्टराज्यस्य वैराग्यं जनयन्निव ॥११६॥ श्रीभगवानुवाच शृणुदैत्येन्द्र वक्ष्यामि गुह्याद्गुह्यतमं परम्। सर्वसंगविहीनानां किमर्थैः साध्यते वद ॥११७॥ अहं तु सर्वभूतानामन्तर्यामीति भावय। मयि सर्वमिदं दैत्य ! किमन्यैः साध्यते वद ॥११८॥ रागद्वेषविहीनानां शान्तानां त्यक्तमायिनाम् । नित्यानन्दस्वरूपाणां किमन्यैः साध्यते धनैः ॥११९॥ आत्मवत्सर्वभूतानि पश्यतां शान्तचेतसाम् । अभिन्नमात्मनः सर्वं को दाता दीयते च किम् ॥१२०॥ पृथ्वीयं क्षत्रियवंशा इति शास्त्रेषु निश्चितम् । तदाज्ञायां स्थिताः सर्वे लभन्ते परमं सुखम् ॥१२१॥ दातव्यो मुनिभिश्चापि षष्ठांशो भूभुजे बले ! । महीयं ब्राह्मणानां तु दातव्या सर्वयत्नतः ॥१२२॥ भूमिदानस्य माहात्म्यं न भूतं न भविष्यति। परं निर्वाणमाप्नोति भूमिदो नात्र संशयः ॥१२३॥ स्वल्पामपि महीं दत्त्वा श्रोत्रियायाहिताग्नये । ब्रह्मलोकमवाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥१२४॥ भूमिदः सर्वदः प्रोक्तो भूमिदो मोक्षभाग्भवेत् । अतिदानं तु तज्ज्ञेयं सर्वपापप्रणाशनम् ॥१२५॥ महापातकयुक्तो वा युक्तो वा सर्वपातकैः। दशहस्तां महीं दत्त्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥१२६॥
की थी उनकी तपस्या सफल हो गई, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं। मैं कृतार्थ हो गया, इसमें सन्देह नहीं, इसलिए भगवन् ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है, बार-बार नमस्कार है। आपकी आज्ञा के अनुसार आपके आदेशों का पालन करूँ, यही मेरी इच्छा है। प्रभो ! मुझ सेवक को आज्ञा दीजिए, मैं उत्साह के साथ पालन करूँगा। ॥११०६-११३॥ यजमान की ऐसी बातें सुनकर भगवान् वामन हँसते हुए बोले— तो मुझे तपस्या करने के लिए केवल तीन पग भूमि दे दो। यह सुनकर बलि ने कहा 'न तो आपने राज्य मांगा, न ग्राम, न नगर और न धन ही; आपने यह क्या किया ? बलि की बातें सुनकर अखिल जीव को धारण और पोषण करने वाले विष्णु ने बलि से इस प्रकार कहा मानो निकट भविष्य में राज्यच्युत होने वाले को आश्वा- सन देने के लिए वे वैराग्य उत्पन्न कर रहे हों ॥११४-११६॥ श्रीभगवान् बोले— दैत्येन्द्र ! सुनो, आज मैं परम गुह्य रहस्य को कह रहा हूँ। सब प्रकार की आसक्तियों से परे रहने वालों का धन से कौन सा प्रयोजन सिद्ध हो सकता है ? बताओ ! मैं सब प्राणियों का अन्तर्यामी हूँ, ऐसा समझो । दैत्य ! यह सारा जगत् मुझमें ही स्थित है, तो बताओ, मुझे अन्य वस्तुओं से क्या लाभ होगा ? राग द्वेष से रहित, शान्त, मायामुक्त और नित्यानन्द-स्वरूप व्यक्तियों को अन्य धन से क्या लाभ होगा ? कहो सब प्राणियों को अपने समान देखने वाले, शान्तचित्त और सबको अपने से अभिन्न समझने वाले के लिए कौन दाता है और क्या दे सकता है ? यह पृथ्वी क्षत्रियों के अधिकार में रहती है, ऐसा शास्त्रों में निश्चित किया गया है। उसी क्षत्रिय की आज्ञा में रहकर सारे प्राणी सुख प्राप्त करते हैं। बलि ! मुनियों को भी भूमिपति राजा को उपज का छठा भाग देना चाहिए। ब्राह्मणों के लिए यह पृथ्वी दान में सब प्रकार से देनी चाहिए। भूमिदान का बहुत बड़ा महत्त्व है, ऐसा दान न तो हुआ है न होगा। भूमिदाता परममोक्ष को प्राप्त करता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं ॥११७-१२३॥ किसी श्रोत्रिय अग्निहोत्र करने वाले ब्राह्मण को थोड़ा भी भूदान करने से दाता आवागमन से रहित ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है। भूमि दाता ही सब कुछ का दाता कहा जाता है।