भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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७७ दशमोऽध्यायः दरिद्रेणापि यत्किंचिद्दीयते विष्णवे गुरो । तदेव परमं दानं दत्तं भवति चाक्षयम् ॥९८॥ स्मृतोऽपि परया भक्त्या पुनाति पुरुषोत्तमः । येन केनाप्यर्चितश्चेद्ददाति परमां गतिम् ॥९९॥ हरिर्हरति पापानि दुष्टचित्तैरपि स्मृतः । अनिच्छयापि संस्पृष्टो दहत्येव हि पावकः ॥१००॥ जिह्वाग्रे वसते यस्य हरिरित्यक्षरद्वयम् । स विष्णुलोकमाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥१०१॥ गोविन्देति सदा ध्यायेद्यस्तु रागातिवर्जितः । स याति विष्णुभवनमिति प्राहुर्मनीषिणः ॥१०२। अग्नौ वा ब्राह्मणे वापि हूयते यद्धविर्गु रो ! । हरिभक्त्या महाभाग तेन विष्णुः प्रसीदति ॥१०३॥ अहं तु हरितुष्ट्यर्थं करोम्यध्वरमुत्तमम् । स्वयमायाति चेद्विष्णुः कृतार्थोऽस्मि न संशयः ॥१०४॥ एवं वदति दैत्येन्द्रे विष्णुर्वामनरूपधृक् । प्रविवेशाध्वरस्थानं हुतवह्निमनोरमम् ॥१०५॥ तं दृष्ट्वा कोटिसूर्याभं योग्यावयवसुन्दरम् । वामनं सहसोत्थाय प्रत्यगृह्णात्कृताञ्जलिः ॥१०६॥ दत्त्वाऽसनं च प्रक्षाल्य पादौ वामनरूपिणम् । सकुटुम्बो वहन्मूर्ध्ना परमां मुदमाप्तवान् ॥१०७॥ विष्णवेऽस्मै जगद्धाम्ने दत्त्वाऽर्घ्यं विधिवद्बलिः । रोमाञ्चिततनुर्भूत्वा हर्षाश्रुनयनोऽब्रवीत् ॥१०८॥ बलिरुवाच अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे सफलो मखः । जीवितं सफलं मेऽद्य कृतार्थोऽस्मि न संशयः ॥१०८½॥ अमोघामृतवृष्टिर्मे समायातातिदुर्लभा । त्वदागमनमात्रेण ह्यनायासो महोत्सवः ॥११०॥ एते च ऋषयः सर्वे कृतार्था नात्र संशयः । यैः पूर्वं हि तपस्तप्तं तदद्य सफलं प्रभो ॥१११॥

यज्ञ करते हैं । यदि मेरे यज्ञ में वही साक्षात् हवि के भोक्ता बन जायें तो मुझसे बढ़कर संसार में और दूसरा कौन भाग्यवान् होगा ? दरिद्र भी जो कुछ गुरु विष्णु को देता है वही परम दान है, वही अक्षय होता है । अनन्य भाव से स्मरण करने पर भी पुरुषोत्तम लोगों को पवित्र करते हैं। चाहे कोई किसी प्रकार से भगवान् की पूजा करे उसे हरि अवश्य परमगति देते हैं ॥९६-९९॥ दुष्ट चित्त लोगों के स्मरण करने पर भी हरि उनके पापों को दूर कर देते हैं, क्योंकि बिना इच्छा के भी छू देने पर अग्नि जला ही देती है । जिसकी जिह्वा पर दो अक्षरों का हरि-नाम सदा वास करता है, वह उस विष्णुलोक को प्राप्त करता है जहां से पुनः लौटना नहीं पड़ता । जो राग-द्वेष दूर रह कर गोविन्द का ध्यान करता है वह विष्णु-भवन को प्राप्त करता है, ऐसा मनीषी कहते हैं । गुरुदेव ! अग्नि या ब्राह्मण के मुख में जो हवि भगवद्-भक्ति पूर्वक दी जाती है, उससे भगवान् अत्यन्त प्रसन्न होते हैं ॥१००-१०३॥ मैं तो केवल भगवत्-प्रीति के लिए ही उस उत्तम यज्ञ को कर रहा हूँ। यदि विष्णु स्वयं मेरे यज्ञ में आ रहे हैं। तब तो मैं कृतार्थ हो गया, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं ! इस प्रकार दैत्यपति बलि की गुरु जी से वार्ता हो रही थी कि इतने में प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी वामन रूप धारी विष्णु यज्ञमण्डप में चले आये । करोड़ों सूर्य के समान तेजस्वी वामन के परम मनोहर रूप को देखकर बलि बड़ी शीघ्रता से उठकर हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और आसन पर बैठाकर भगवान् वामन के चरणों को धोया, भगवान् के चरणोदक को कुटुम्ब सहित अपने शिर पर चढ़ा परम आनन्द प्राप्त किया । तत्पश्चात् विधि पूर्वक जगद्धाम विष्णु को अर्घ्य प्रदान कर आनन्द-मग्न हो गया । उसके नेत्रों से आनन्द के आंसू बहने लगे और रोमाञ्च हो आया । किसी प्रकार अपने को सम्हाल कर बोला ॥१०४-१०८॥ आज मेरा जन्म सफल हो गया, आज मेरा यज्ञ सफल हो गया, मेरा जीवन सफल हो गया और मैं कृतार्थ हो गया, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं । अति दुर्लभ अमोघ अमृत की वर्षा मेरे यहाँ हो गई । तुम्हारे आगमन मात्र से ही अनायास महोत्सव हो गया । ये सभी ऋषि भी आज कृतार्थ हो गए । प्रभो ! जिन ऋषियों ने तपस्या