भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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७६ नारदीयपुराणम् अहं जन्मद्वये त्वेवं युवयोः पुत्रतां गतः । अस्मिञ्जन्मन्यपि तथा साधयाम्युत्तमं सुखम् ॥८४॥ अत्रान्तरे बलिर्दैत्यो दीर्घसत्रं महामखम् । आरभे गुरुणा युक्तः काव्येन च मुनीश्वरैः ॥८५॥ तस्मिन्मखे समाहूतो विष्णुर्लक्ष्मीसमन्वितः । हविः स्वीकरणार्थाय ऋषिभिर्ब्रह्मवादिभिः ॥८६॥ प्रवृद्धैश्वर्यदैत्यस्य वर्त्तमाने महाक्रतौ । आमंत्र्य मातापितरौ स वटुर्वामनो ययौ ॥८७॥ स्मितेन मोहयँल्लोकं वामनो भक्तवत्सलः । हविर्भोक्तुमिवायातो बलेः प्रत्यक्षतो हरिः ॥८८॥ दुर्वृत्तो वा सुवृत्तो वा जडो वा पण्डितोऽपि वा । यो भक्तियुक्तस्तस्यान्तः सदा संनिहितो हरिः ॥८९॥ आयान्तं वामनं दृष्ट्वा ऋषयो ज्ञानचक्षुषः । ज्ञात्वा नारायणं देवमुद्ययुः सभ्यसंयुताः ॥९०॥ एतज्ज्ञात्वा दैत्यगुरुरेकांते बलिमब्रवीत् । स्वसारमविचार्यैव खलाः कार्याणि कुर्वते ॥९१॥ शुक्र उवाच भो भो दैत्यपते सौम्य ह्यपहर्त्ता तव श्रियम् । विष्णुर्वामनरूपेण ह्यदितेः पुत्रतां गतः ॥९२॥ तवाध्वरं स आयाति त्वया तस्यासुरेश्वर । न किंचिदपि दातव्यं मन्मतं शृणु पण्डित ॥९३॥ आत्मबुद्धिः सुखकरी गुरुबुद्धिर्विशेषतः । परबुद्धिर्विनाशाय स्त्रीबुद्धिः प्रलयंकरी ॥९४॥ शत्रूणां हितकृद्य॑स्तु स हन्तव्यो विशेषतः ॥९५॥ बलिरुवाच एवं गुरो न वक्तव्यं धर्ममार्गविरोधतः । यदादत्ते स्वयं विष्णुः किमस्मादधिकं वरम् ॥९६॥ कुर्वन्ति विदुषो यज्ञान्विष्णुप्रीणनकारणात् । स चेत्साक्षाद्धविर्भागी मत्तः कोऽप्यधिको भुवि ॥९७॥ मैं पूरा करूँगा। मैं इस प्रकार और दो जन्मों में आपका पुत्र बन चुका हूँ। इस जन्म में भी पूर्व की ही भाँति आपको उत्तम सुख प्रदान करूँगा। इसी बीच दैत्यराज बलि ने गुरु शुक्र और महामुनियों की सहायता से अधिक दिनों तक चलने वाला महायज्ञ प्रारम्भ किया। उस यज्ञ में लक्ष्मी के सहित विष्णु भी हवि ग्रहण करने के लिए ब्रह्मवादी ऋषियों द्वारा आवादित थे। अनेकों ऐश्वर्य-शाली राक्षसों से भरे हुए उस यज्ञ में माता-पिता की अनु- मति लेकर वटु वामन भी गये ॥८७॥ उस भक्तवत्सल वटु के मन्द हास्य से संसार मोहित हो गया। मानों बलि की हवि ग्रहण करने के लिए हरि स्वयं ही वहाँ आ गए। दुराचारी, सदाचारी, मूर्ख अथवा पंडित जो कोई भी हो उसको, भक्ति को देखकर भगवान् सर्वदा उसके समीप उपस्थित रहते हैं। ज्ञान-चक्षु ऋषियों ने साक्षात् नारायण को वामन रूप में वहाँ आते देखकर बड़े सम्मान के साथ उनका सत्कार किया। दैत्य-गुरु शुक्र इस रहस्य को ताड़ गए, उन्होंने एकान्त में बलि से कहा, क्योंकि दुष्ट जन अपनी शक्ति को समझे बिना ही कार्य करते हैं । ॥८८-९१॥ शुक्र बोले- दैत्यपते ! सौम्य ! तुम्हारी सम्पत्ति को अपहरण करने वाले विष्णु वामन के रूप में अदिति के पुत्र हुए हैं। असुरेश्वर ! वही तुम्हारे यज्ञ में आ रहे हैं, परन्तु उनको कुछ भी न देना। पंडित ! मेरे सुझाव को सुनो, अपना विवेक सुखकर होता है, किन्तु गुरु का उपदेश और भी कल्याणप्रद होता है। दूसरे की बुद्धि से काम करने वाला विनष्ट होता है और स्त्री की बुद्धि तो प्रलय मचा देती है। जो शत्रुओं का हितैषी हो उसे विशेष रूप से मारना चाहिए ॥९२-९५॥ बलि बोला- गुरुदेव ! इस प्रकार स्वयं आप धर्म विरोधी चर्चा न करें। स्वयं विष्णु यदि मेरे अतिथि या याचक बनें तो इससे बढ़कर दूसरा क्या वर या श्रेय हो सकता है। विद्वान् विष्णु की प्रसन्नता के लिए ही