बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७५ दशमोऽध्यायः नमो नमः कारणवामनाय नारायणायामितविक्रमाय । सशार्ङ्गचक्रासिगदाधराय नमोऽस्तु तस्मै पुरुषोत्तमाय ॥७४॥ नमः पथोराशिनिवासनाय नमोऽस्तु सद्धृत्कमलस्थिताय । नमोऽस्तु सूर्याद्यमितप्रभाय नमो नमः पुण्यकथागताय ॥७५॥ नमो नमोऽर्केन्दुविलोचनाय नमोऽस्तु ते यज्ञफलप्रदाय । नमोऽस्तु यज्ञाङ्गविराजिताय नमोऽस्तु ते सज्जनवल्लभाय ॥७६॥ नमो जगत्कारणकारणाय नमोस्तु शब्दादिविवर्जिताय । नमोऽस्तु ते दिव्यसुखप्रदाय नमो नमो भक्तमनोगताय ॥७७॥ नमोऽस्तु ते ध्वान्तविनाशकाय नमोऽस्तु ते मन्दरधारकाय । नमोऽस्तु ते यज्ञवराहनाम्ने नमो हिरण्याक्षविदारकाय ॥७८॥ नमोऽस्तु ते वामनरूपभाजे नमोऽस्तु ते क्षत्रकुलान्तकाय । नमोऽस्तु ते रावणमर्दनाय नमोऽस्तु ते नन्दसुताग्रजाय ॥७९॥ नमस्ते कमलाकान्त नमस्ते सुखदायिने । स्मृतार्तिनाशिने तुभ्यं भूयो भूयो नमो नमः ॥८०॥ यज्ञेश यज्ञविन्यास यज्ञविघ्नविनाशन । यज्ञरूप यज्ञद्रूप यज्ञाङ्ग त्वां यजाम्यहम् ॥८१॥ इति स्तुतः स देवेशो वामनो लोकपावनः । उवाच प्रहसन्हर्षं वर्द्धयन्कश्यपस्य सः ॥८२॥ श्रीभगवानुवाच तात तुष्टोऽस्मि भद्रं ते भविष्यति सुरार्चित ! । अचिरात्साधयिष्यामि निखिलं त्वन्मनोरथम् ॥८३॥
देने वाले को नमस्कार है । दुष्ट जनों के नाश करने वाले को बार-बार नमस्कार है। जगदीश्वर को नमस्कार करते हैं । जगत् के आदि कारण वामन को नमस्कार करते हैं । अमित विक्रम शील नारायण को नमस्कार है । धनुष के सहित चक्र, खङ्ग और गदा के धारण करने वाले को नमस्कार है । उस पुरुषोत्तम को नमस्कार है । ॥७४॥ अगाध जल राशि में निवास करने वाले को नमस्कार है । सज्जनों के हृदय-कमल में निवास करने वाले को नमस्कार है । सूर्य से भी अधिक प्रभावान् को नमस्कार है । पुण्य कथा स्थान पर सर्वदा निवास करने वाले को हमारा नमस्कार है । सूर्य और चन्द्र रूपी नेत्र वाले को नमस्कार करते हैं । यज्ञ फल को देने वाले तुमको हमारे असंख्य नमस्कार हैं । यज्ञांग से सुशोभित और सज्जनों के प्रिय को हम नमस्कार करते हैं । जगत् के आदि कारण के भी कारण को नमस्कार है । शब्दादि विषयों के अविष्य को नमस्कार है । स्वर्गीय सुखों के देने वाले तुमको हमारा नमस्कार है । भक्तों के मन में रहने वाले को नमस्कार है । अज्ञान तिमिर का नाश करने वाले तुमको नमस्कार है । मन्दराचल को धारण करने वाले कूर्म को नमस्कार है । यज्ञ वराह नाम से प्रसिद्ध, हिरण्याक्ष को विदीर्ण करने वाले को नमस्कार है ॥७२-७८॥ वामन रूप धारण करने वाले, क्षत्रिय कुल के विनाशक को नमस्कार है । रावण का मर्दन करने वाले को नमस्कार है । नन्द के पुत्र कृष्ण के अग्रज बलराम को नमस्कार है । कमलाकान्त ! तुमको नमस्कार है । सुखदाता को नमस्कार है । स्मरण मात्र से दुःखों को दूर कर देने वाले तुमको बार-बार नमस्कार है । यज्ञेश ! यज्ञविन्यास ! यज्ञविघ्नहर ! यज्ञरूप ! यज्ञविधि ! यज्ञांग ! तुम्हारी हम वन्दना कर रहे हैं । इस प्रकार कश्यप ने लोक पावन देवेश वामन की स्तुति की । यह सुनकर कश्यप के आनन्द को और बढ़ाते हुए वामन ने हंसकर कहा ॥७६-८२॥ श्री भगवान् बोले—तात ! मैं प्रसन्न हूँ, सुर पूजित ! आपका कल्याण होगा, आपके सब मनोरथों को