बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७४ नारदीयपुराणम् पुण्यतीर्थरता नित्यं सत्सङ्गनिरतास्तथा । लोकानुग्रहशीलाश्च सततं ते वहन्ति माम् ॥६१॥ परोपकारनिरताः परद्रव्यपराङ्मुखाः । नपुंसकाः परस्त्रीषु ते वहन्ति च मां सदा ॥६२॥ तुलस्युपासनरताः सदा नामपरायणाः । गोरक्षणपरा ये च सततं मां वहन्ति ते ॥६३॥ प्रतिग्रहनिवृत्ता ये परान्नविमुखास्तथा । अन्नोदकप्रदातारो वहन्ति सततं हि माम् ॥६४॥ त्वं तु देवि ! पतिप्राणा साध्वी भूतहिते रता । संप्राप्य पुत्रभावं ते साधयिष्ये मनोरथम् ॥६५॥ इत्युक्त्वा देवदेवेशो ह्रार्दित देवमातरम् । दत्त्वा कण्ठगतां मालामभयं च तिरोदधे ॥६६॥ सा तु संहृष्टमनसा देवसुदर्शनन्दिनी । प्रणम्य कमलाकान्तं पुनः स्वस्थानमाव्रजत् ॥६७॥ ततोऽदितिर्महाभागा सुप्रीता लोकवन्दिता । असूत समये पुत्रं सर्वलोकनमस्कृतम् ॥६८॥ शङ्खचक्रधरं शान्तं चन्द्रमण्डलमध्यगम् । सुधाकलशदध्यन्नकरं वामनसंज्ञितम् ॥६९॥ सहस्रादित्यसंकाशं व्याकोशकमलेक्षणम् । सर्वाभरणसंयुक्तं पीताम्बरधरं हरिम् ॥७०॥ स्तुत्यं मुनिगणैर्युक्तं सर्वलोकैकनायकम् । आविर्भूतं हरिं ज्ञात्वा कश्यपो हर्षविह्वलः । प्रणम्य प्राञ्जलिर्भूत्वा स्तोतुं समुपचक्रमे ॥७१॥ कश्यप उवाच नमो नमस्तेऽखिलकारणाय नमोनमस्तेऽखिलपालकाय । नमो नमस्तेऽमरनायकाय नमो नमो दैत्यविनाशनाय ॥७२॥ नमो नमो भक्तजनप्रियाय नमोनमः सज्जनरंजिताय । नमो नमो दुर्जननाशनाय नमोऽस्तु तस्मै जगदीशवराय ॥७३॥ में लगातार रहने वाला और सर्वदा लोक पर अनुग्रह करने वाला व्यक्ति मुझको अपने हृदय में ढोता रहता है। परोपकार-परायण, पर की थोड़ी भी आकांक्षा न रखने वाले और परस्त्री के प्रति नपुंसक-सा व्यवहार करने वाले मुझे सर्वदा ढोते हैं ॥६०-६२॥ तुलसी की उपासना में सर्वदा लगे रहने वाले हरिनाम का उच्चारण करने वाले और गोरक्षक सर्वदा मुझको ढोते रहते हैं। जो दान लेने का नाम तक नहीं लेते, जो दूसरों के दिये अन्न की इच्छा नहीं रखते और जो स्वयं अन्न और जल का दान करते हैं वे सर्वदा मुझको ढोते रहते हैं ॥६३-६४॥ देवि ! तुम तो पतिव्रता, साध्वी और सब प्राणियों के हित में निरत रहने वाली हो मैं तुम्हारा पुत्र बनकर तुम्हारे सब मनोरथों को पूर्ण करूँगा ॥६५॥ देवदेवेश ने देवमाता अदिति से इस प्रकार कहकर अपने कंठ की माला उसको दे दी और अभय वरदान देकर स्वयं अन्तर्हित हो गए। वह देव-जननी, दक्षकन्या अदिति प्रसन्न मन से कमलापति को प्रणाम कर अपने स्थान पर लौट आई ॥६६-६७॥ तदन्तर अनुकूल समय पर महाभागशालिनी, प्रसन्नवदना और लोकपूज्या अदिति ने सबलोकों से वन्दित, शंखचक्रधारी, शान्त, चन्द्रमण्डल (प्रभामण्डल) से आवृत्त, सुधा कलश एवं दधि मिश्रित अन्न हाथ में लिये हुए वामन नामक पुत्र को उत्पन्न किया जो सहस्रसूर्य के समान तेजस्वी, विकसित कमल के समान नेत्र वाला सब प्रकार के आभूषणों से सुशोभित, पीताम्बरधारी, मुनि- गणों से वन्द्य और सब लोकों के नायक स्वयं हरि थे । भगवान् को अपने पुत्ररूप में प्रकट हुए देखकर महात्मा कश्यप ने आनन्द विभोर हो प्रणाम किया और हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे ॥६८-७१॥ कश्यप बोले—अखिल जगत के कारण हरि को नमस्कार है । अखिल लोक के पालक को बार-बार नमस्कार करते हैं । देवेश, दैत्य-विनाशक को नमस्कार है । भक्त जनों के प्रिय को नमस्कार है । सज्जन को सुख