बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदशमोऽध्यायः ७३ अदितिरुवाच नाहं वोढुं क्षमा देव त्वामाद्यं पुरुषं परम् । असंख्याताण्डरोमाणं सर्वेशं सर्वकारणम् ॥४६॥ यत्प्रभावं न जानन्ति श्रुतयः सर्वदेवताः । तमहं देवदेवेशं धारयामि कथं प्रभो ॥५०॥ अणोरणीयांसमजं परात्परतरं प्रभुम् । धारयामि कथं देव त्वामहं पुरुषोत्तमम् ॥५१॥ महापातकयुक्तोऽपि यन्नामस्मृतिमात्रतः । मुच्यते स कथं देवो ग्राम्येषु जनिमर्हति ॥५२॥ यथा शूकरमत्स्याद्या अवतारास्तव प्रभो । तथायमपि को वेद तव विश्वेश ! चेष्टितम् ॥५३॥ त्वत्पादपद्मप्रणता त्वन्नामस्मृतितत्परा । त्वामेव चिंतये देव ! यथेच्छसि तथा कुरु ॥५४॥ सनक उवाच तयोक्तं वचनं श्रुत्वा देवदेवो जनार्दनः । दत्त्वाभयं देवमातुरिदं वचनमब्रवीत् ॥५५॥ श्रीभगवानुवाच सत्यमुक्तं महाभागे त्वया नास्त्यत्र संशयः । तथापि शृणु वक्ष्यामि गुह्याद्गुह्यतरं शुभे ॥५६॥ रागद्वेषविहीना ये मद्भक्ता मत्परायणाः । वहन्ति सततं ते मां गतासूया अदांभिकाः ॥५७॥ परोपतापविमुखाः] शिवभक्तिपरायणाः । मत्कथाश्रवणासक्ता वहन्ति सततं हि माम् ।५८॥ पतिव्रताः पतिप्राणाः पतिभक्तिपरायणाः । वहन्ति सततं देवि स्त्रियोऽपि त्यक्तमत्सराः ॥५९॥ मातापित्रोश्च शुश्रूषुर्गुरुभक्तोऽतिथिप्रियः । हितकृद्ब्राह्मणानां यः स मां वहति सर्वदा ॥६०॥ अदिति बोली--देव ! आदि, परम पुरुष तुमको मैं गर्भ में धारण करने में समर्थ नहीं हूँ। जिसके रोम-रोम में असंख्य ब्रह्माण्ड भूलते रहते, जो सर्वेश और सब का आदि कारण है, जिसकी महिमा को श्रुतियाँ और सब देवता नहीं जान पाते हैं, प्रभो ! उस देवदेवेश को मैं कैसे गर्भ में धारण कर सकती हूँ ? ॥४६-५०॥ देव ! अणु से भी अणुतम, अज, परात्पर, प्रभु और पुरुषोत्तम देव तुमको कैसे मैं धारण कर सकती हूँ ? जिसके नाम स्मरण मात्र से महापापों में फँसा प्राणी भी शीघ्र मुक्त हो जाता है वह आदि देव किस प्रकार मेरे समान ग्राम्य मानवी की कुक्षि से उत्पन्न हो सकता है ? प्रभो ! जिस प्रकार शूकर, मत्स्य (मछली) आदि तुम्हारे अन्य अवतार हुए हैं इसी प्रकार यह तुम्हारा कोई अवतार होगा ? भला तुम्हारे रहस्यमय व्यापार को कौन जान सकता है ? देव ! मैं तो केवल तुम्हारे चरण-कमलों में ही सर्वदा विनत रहने वाली, तुम्हारे नामों के रटने में ही लीन रहने वाली और सर्वदा तुम्हारा हो चिन्तन करने वाली एक किङ्करी हूँ, तुम्हारी जैसी इच्छा हो करो ॥५१-५४॥ सनक बोले-उसकी कही हुई बातों को सुनकर देवाधिदेव जनार्दन ने देवमाता को अभय वरदान दिया और कहा--॥५५॥ श्री भगवान् बोले--महाभाग्यशालिनि ! तुमने जो कुछ कहा सत्य है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं । फिर भो शुभे ! सुनो, आज तुमको अत्यन्त रहस्यमय तत्त्व बता रहा हूँ । जो राग द्वेष से हीन मेरे भक्त, मुझमें ही विरत रहने वाले तथा ईर्ष्या और दंभ से रहित हैं, वे सर्वदा मुझको ढोते रहते हैं। दूसरों को पीड़ा न पहुँचाने वाले, शिव-भक्ति में अनन्य भाव रखने वाले और मेरी कथा में सर्वदा तल्लीन रहने वाले भक्त सर्वदा मुझको ढोते हैं । पतिव्रता, पतिप्रिया, पतिभक्ति को ही अपना सर्वस्व समझने वाली और ईर्ष्या से सर्वथा दूर रहने वाली स्त्रियां भी मुझको अपने हृदय में रखती है ॥५६-५६॥ माता पिता की सेवा करने वाला, गुरुभक्त, अतिथिसवो और ब्राह्मणों का हित करने वाला मनुष्य सर्वदा मुझको ढोता है । नित्य पुण्य तीर्थों में रत रहने वाला, सत्संग १०-नार०