भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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७२ नारदीयपुराणम् ऋग्यजुः सामरूपाय सत्यस्वरगतात्मने । षडङ्गरूपिणे तुभ्यं भूयोभूयो नमो नमः ॥३५॥ त्वमिन्द्रः पवनः सोमस्त्वमीशानस्त्वमन्तकः । त्वमग्निर्निऋतिश्चैव वरुणस्त्वं दिवाकरः ॥३६॥ देवाश्च स्थावराश्चैव पिशाचाश्चैव राक्षसाः । गिरयः सिद्धगंधर्वा नद्यो भूमिश्च सागराः ॥३७॥ त्वमेव जगतामीशो यत्रासि त्वं परात्परः । त्वद्रूपमखिलं देव तस्मान्नित्यं नमोऽस्तु ते ॥३८॥ अनाथनाथसर्वज्ञ भूतदेवेन्द्रविग्रह । दैत्यैर्बाधितान्पुत्रान्मम पाहि जनार्दन ॥३६॥ इति स्तुत्वा देवमाता देवं नत्वा पुनः पुनः । उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा हर्षाश्रुक्षालितस्तनी ॥४०॥ अनुग्राह्यास्मि देवेश त्वया सर्वादिकारण । अकण्टकां श्रियं देहि मत्सुतानां दिवौकसाम् ॥४१॥ अन्तर्यामिञ्जगद्रूप सर्वज्ञ परमेश्वर । अज्ञातं किं तव श्रीश किं मामीहयसि प्रभो ॥४२॥ तथापि तव वक्ष्यामि यन्मे मनसि रोचते । वृथापुत्रास्मि देवेश दैत्यैः परिपीडिता ॥४३॥ तान्न हिंसितुमिच्छामि यस्ततेऽपि सुता मम । तानहत्वा श्रियं देहि मत्सुतेभ्यः सुरेश्वर ॥४४॥ इत्युक्तो देवेदेवेशः पुनः प्रीतिमुपागतः । उवाच हर्षयन्विप्र देवमातरमादरात् ॥४५॥ श्रीभगवानुवाच प्रीतोऽस्मि देवि भद्रं ते भविष्यामि सुतो ह्यहम् । यतः सपत्निपुत्रेषु वात्सल्यं देवि दुर्लभम् ॥४६॥ त्वया तु यत्कृतं स्तोत्रं तत्पठन्ति नरास्तु ये । तेषां संपद्वरा पुत्रा न हीयन्ते कदाचन ॥४७॥ स्वात्मजे वान्यपुत्रे वा यः समत्वेन वर्तते । न तस्य पुत्रशोकः स्यादेष धर्मः सनातनः ॥४८॥

उस ऋक् यजु और सामरूप, सत्य स्वर को प्राप्त आत्मावाले षडङ्ग ब्रह्म को बार बार नमस्कार है। तुम इन्द्र हो, पवन, ईशान, सोम और यम हो, तुम अग्नि, निर्ऋति, वरुण और दिवाकर भी हो, देव, स्थावर, पिशाच राक्षस, गिरि सिद्ध, गन्धर्व, नदियाँ, भूमि, सागर आदि तुम्हीं हो ॥३४-३७॥ समस्त जगत् के ईश और परात्पर ब्रह्म भी तुम्हीं हो। देव ! यह समस्त जगत् तुम्हारा ही रूप है, इसलिए तुमको सतत नमस्कार है। अनाथों के नाथ ! सर्वज्ञ ! सब प्राणियों और देवेन्द्र के रूप में रहने वाले ! जनार्दन ! दैत्यों से पीड़ित मेरे पुत्रों की रक्षा करो । । ३८-३६॥ देवमाता ने इस प्रकार भगवान् की स्तुति की और बार बार भगवान् को प्रणाम किया । फिर हाथ जोड़कर आनन्दाश्रु से अपने हृदय को धोती हुई वह बोली- देवेश ! सबके आदि कारण ! इस समय तुम्हारे अनुग्रह का एकमात्र पात्र मैं हूँ, मेरे स्वर्गस्थ पुत्रों (देवों) को अक्षय श्री प्रदान करो । जगद्रूप ! सर्वज्ञ ! परमेश्वर ! श्रीश ! तुमसे कौन सा रहस्य अज्ञात है ? अतः प्रभो ! तुम मुझसे क्या पूछ रहे हो ? तथापि मेरे मन को जो अच्छा लग रहा है, उसको कह रही हूँ। देवेश ! इस समय मैं दैत्यों से पीड़ित पुत्रों की माता हूँ, जिनकी शक्ति व्यर्थ सी हो गई है । उन दैत्यों का वध नहीं चाहती क्योंकि वे भी मेरे पुत्र हैं; परन्तु उनकी हिंसा न करते हुए भी आप मेरे पुत्रों को ऐश्वर्य और इन्द्र पद प्रदान कीजिए। देवदेवेश इतनी बातें सुनकर पुनः और अधिक प्रसन्न हो गए । विप्रनारद ! तब वे आदर पूर्वक देवमाता का हर्ष बढ़ाते हुए बोले ॥४०-४५॥ श्री भगवान् बोले-- देवि ! मैं तुम पर प्रसन्न हूँ, तुम्हारा कल्याण होगा। तुम्हारा सौत के पुत्रों पर भी अनुपम वात्सल्य है, अतः मैं स्वयं तुम्हारा पुत्र बनूँगा । तुमने जिस स्तोत्र से मेरा स्तवन किया है उस स्तोत्र को जो मनुष्य पढ़ेंगे उनकी भी श्रेष्ठ सम्पत्ति और सन्तति का क्षय कभी भी नहीं होगा। जो अपने और दूसरे के पुत्रों पर समान भाव रखता है उसको कभी भी पुत्रशोक नहीं होता, यह एक सनातन नियम है ॥४६-४८॥