बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशोऽध्यायः ८३ विरोचनात्मजं दैत्यं पदैकार्थं बबन्ध ह । ततः प्रपन्नं तु बलिं ज्ञात्वा चास्मै रसातलम् । ददौ तद्द्वारपालश्च भक्तवश्यो बभूव ह ॥१८८॥ नारद उवाच रसातले महाविष्णुर्विरोचनसुतस्य वै । किं भोज्यं कल्पयामास घोरे सर्पभयाकुले ॥१८६॥ सनक उवाच अमन्त्रितं हविर्यत्तु हूयते जातवेदसि । अपात्रे दीयते यच्च तद्घोरं भोगसाधनम् ॥१९०॥ हुतं हविरशुचिना दत्तं सत्कर्म यत्कृतम् । तत्सर्वं तत्र भोगार्हमधःपातफलप्रदम् ॥१९१॥ एवं रसातलं विष्णुर्बलये सासुराय तु । दत्त्वाभयं च सर्वेषां सुराणां त्रिदिवं ददौ ॥१९२॥ पूज्यमानोऽमरगणैः स्तूयमानो महर्षिभिः । गन्धर्वैर्गीयमानश्च पुनर्वामनतां गतः ॥१९३॥ एतद्दृष्ट्वा महत्कर्म मुनयो ब्रह्मवादिनः । परस्परं स्मितमुखाः प्रणेमुः पुरुषोत्तमम् ॥१९४॥ सर्वभूतात्मको विष्णुर्वामनत्वमुपागतः । मोहयन्निखिलं लोकं प्रपेदे तपसे वनम् ॥१९५॥ एवं प्रभावा सा देवी गङ्गा विष्णुपदोद्भवा । यस्याः स्मरणमात्रेण मुच्यते सर्वपातकैः ॥१९६॥ इदं तु गङ्गामाहात्म्यं यः पठेच्छृणुयादपि । देवालये नदीतीरे सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥१९७॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे गङ्गोत्पत्तिर्गङ्गामाहात्म्यं नामैकादशोऽध्यायः ॥११॥ समझकर उसको रसातल भेज दिया और उसका द्वारपाल बनकर उस भक्त की सेवा भी स्वीकार की ॥१८४-१८८॥ नारद बोले—महाविष्णु ने सर्पों से भरे अतएव भयङ्कर उस रसातल में विरोचन पुत्र बलि के लिए भोजन की क्या व्यवस्था की ? ॥१८६॥ सनक बोले—बिना मन्त्र के जिस हवि को अग्नि में छोड़ा जाता है, अथवा अपात्र को जो दान दिया जाता है वही बलि के लिये भयंकर भोग का साधन बनता है। अपवित्र भाव से हवन में दी हुई हवि और किये हुए सत्कर्म,जो अधःपतन रूप फल के देने वाले हैं, बलि के लिए भोगोपयोगी होते हैं । इस प्रकार बलि को रसातल पहुँचाकर विष्णु ने सब देवों को निर्भय करके स्वर्गलोक का अधिकारी बना दिया । पुनः देवगणों ने उनकी पूजा की, महर्षियों ने स्तुति की और गन्धर्वों ने उनका यशोगान किया । इस प्रकार भक्तों से आदर प्राप्त कर पुनः उन्होंने अपना वामनरूप बना लिया ॥१९०-१९३॥ विष्णु के इस महान् अद्भुत कार्य को देखकर ब्रह्मज्ञानी मुनिगण परस्पर एक दूसरे को देखकर मुस्कराने लगे और उन पुरुषोत्तम को प्रणाम किया । इस प्रकार सब प्राणियों के रूप में और अन्तःकरण में विराजमान रहने वाले विष्णु अपना वामन रूप धारण कर सब लोकों को मन्त्र-मुग्ध करते हुए तपस्या के लिए वन को चले गये । विष्णु के चरणों से निकलने वाली गंगा का ऐसा प्रभाव है, जिसके स्मरणमात्र से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है । जो कोई इस गंगा-माहात्म्य को नदी तीर पर अथवा देवालय में सुनता है वह भी अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है ॥१९४-१९७॥ श्रीनारदीयपुराण में गंगा-माहात्म्य-वर्णन नामक ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त ॥११॥