भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 105, कुल 1008 में से

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८६ नारदीयपुराणम् दानभोगविनाशाश्च त्रयः स्युर्गतयस्त्रिधा ॥२३॥ यो ददाति च नो भुंक्ते तद्धनं नाशकारणम् । धनं धर्मफलं विप्र धर्मो माधवतुष्टिकृत् ॥२४॥ तरवः किं न जीवन्ति तेऽपि लोके परार्थकाः । यत्र मूलफलैर्वृक्षाः परकार्यं प्रकुर्वते ॥२५॥ मनुष्या यदि विप्राग्र्य न परार्थास्तदा मृताः । परकार्यं न ये मर्त्याः कायेनापि धनेन वा ॥२६॥ मनसा वचसा वापि ते ज्ञेयाः पापकृत्तमाः । अत्रेतिहास वक्ष्यामि शृणु नारद तत्त्वतः ॥२७॥ यत्र दानादिकानां तु लक्षणं परिकीर्तितम् । गङ्गामाहात्म्यसहितं सर्वपापप्रणाशनम् ॥२८॥ भगीरथस्य धर्मस्य संवादं पुण्यकारकम् । आसीद् भगीरथो राजा सागरान्वयसंभवः ॥२९॥ शशास पृथिवीमेतां सप्तद्वीपां ससागराम् । सर्वधर्मरतो नित्यं सत्यसंधः प्रतापवान् ॥३०॥ कन्दर्पसदृशो रूपे यायजूको विचक्षणः । प्रालेयाद्रिसमो धैर्ये धर्मे धर्मसमो नृपः ॥३१॥ सर्वलक्षणसंपन्नः सर्वशास्त्रार्थपारगः । सर्वसंपत्समायुक्तः सर्वानन्दकरो मुने ॥३२॥ आतिथ्यप्रयतो नित्यं वासुदेवार्चने रतः । पराक्रमी गुणनिधिर्मैत्रः कारुणिकः सुधीः ॥३३॥ एतादृशं तं राजानं ज्ञात्वा हृष्टो भगीरथम् । धर्मराजो द्विजश्रेष्ठ कदाचिद्द्रष्टुमागतः ॥३४॥ समागतं धर्मराजमर्हयामास भूपतिः । शास्त्रदृष्टेन विधिना धर्मः प्रीत उवाच तम् ॥३५॥ धर्मराज उवाच राजन्र्धमविदां श्रेष्ठ प्रसिद्धोऽसि जगत्त्रये । धर्मराजोऽथ कीर्ति ते श्रुत्वा त्वां द्रष्टुमागतः ॥३६॥ सन्मार्गानिरतं सत्यं सर्वभूतहिते रतम् । द्रष्टुमिच्छन्ति विबुधास्तवोत्कृष्टगुणप्रियाः ॥३७॥ यही तीन धन की उपयोग-विधियाँ हैं। जो धन दान या भोग में नहीं लगाया जाता है वह यों ही नष्ट हो जाता है। विप्र ! धन के द्वारा धर्म किया जाता है और धर्म से विष्णु प्रसन्न होते हैं। वृक्ष क्या इस संसार में नहीं जीते हैं ? वे भी तो दूसरों के लिए ही हैं, जो (वृक्ष) अपने मूल और फलों से सर्वदा परोपकार किया करते हैं ॥२०-२५॥ विप्रवर्य ! मनुष्य यदि परोपकार नहीं करते तो वे मृततुल्य हैं जो मनुष्य शरीर धन से अथवा मन और वचन से परोपकार नहीं करते हैं वे पापी समझे जाते हैं। नारद ! इस विषय में एक इतिहास बतला रहा हूँ, सुनो, जिसमें दान आदि के लक्षण और सब पापों को नष्ट करने वाले गंगा-माहात्म्य का वर्णन भी प्रसङ्गवश हो जाता है। यह आख्यान भगीरथ और धर्म के पुण्य जनक संवाद से सम्बन्ध रखता है। सगर-वंश में उत्पन्न भगीरथ नाम के राजा थे, उन्होंने सप्त सागर पर्यन्त पृथ्वी पर शासन किया। वे नित्य धर्म कार्यों में निरत रहने वाले, प्रतापी और सत्यप्रतिज्ञ थे ॥२६-३०॥ रूप में कामदेव के समान, धैर्य में हिमालय के समान और धर्म में साक्षात् धर्म के समान एवं विद्वान् और अनेकों यज्ञों के करने वाले थे। मुने ! वे सब लक्षणों से युक्त, सब शास्त्रों के पारगामी विद्वान्, सब ऐश्वर्यों से सम्पन्न और सब के आनन्द देने वाले थे। अतिथि सत्कार में विशेष ध्यान देने वाला, पराक्रमी, गुणवान्, मन्त्रियों से सर्वदा परामर्श करने वाला, कारुणिक और बुद्धिमान् राजा सर्वदा वासुदेव की पूजा में लगा रहता था। द्विजवर्य ! ऐसे भगीरथ राजा का यश सुनकर धर्मराज किसी समय उनसे मिलने के लिए आये। भूपाल ने अतिथिरूप से आये हुए धर्मराज का शास्त्रोक्त विधि से सत्कार किया। धर्मराज स्वागत विधि से प्रसन्न हो बोले ॥३१-३५॥ धर्मराज बोले—राजन् ! धर्मज्ञों में श्रेष्ठ ! तुम जगद् विख्यात हो, इसीलिए तुम्हारी कीर्ति को सुनकर मै (धर्मराज) (तुमको देखने के लिए) तुमसे मिलने के लिए आया हूँ। तुम्हारे उत्कृष्ट गुणों से प्रसन्न होकर देवता भी सन्मार्ग और सब प्राणियों के हित में तत्पर रहने वाले सत्य-प्रेमी तुमको देखना चाहते हैं। भूपते ! जहाँ

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