बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८७ द्वादशोऽध्यायः कीर्तिर्नीतिश्च संपत्तिर्वर्तते यत्र भूपते । वसन्ति तत्र नियतं गुणास्सन्तश्च देवताः ॥३८॥ अहो राजन्महाभाग शोभनं चरितं तव । सर्वभूतहितत्वादि मादृशामपि दुर्लभम् ॥३६॥ इत्युक्तवन्तं तं धर्मं प्रणिपत्य भगीरथः । प्रोवाच विनयाविष्टः संहृष्टः श्लक्ष्णया गिरा ॥४०॥ भगीरथ उवाच भगवन्सर्वधर्मज्ञ समदर्शिन् सुरेश्वर । कृपया परयाविष्टो यत्पृच्छामि वदस्व तत् ॥४१॥ धर्मा कीदृग्विधाः प्रोक्ताः के लोका धर्मशालिनाम् । ॥४२॥ कियत्यो यातनाः प्रोक्ताः केषां ताः परिकीर्तिताः त्वया संमाननीया ये शासनीयाश्च ये यथा । तत्सर्वं मे महाभाग विस्तराद्वक्तुमर्हसि ॥४३॥ धर्मराज उवाच साधु साधु महाबुद्धे मतिस्ते विमलोर्जिता । धर्माधर्मांन्प्रवक्ष्यामि तत्त्वतः शृणु भक्तितः ॥४४॥ धर्मा बहुविधाः प्रोक्ताः पुण्यलोकप्रदायकाः । तथैव यातनाः प्रोक्ता असंख्या घोरदर्शनाः ॥४५॥ विस्तराद्गदितुं नालमपि वर्षशतायुतैः । तस्मात्समासतो वक्ष्ये धर्माधर्मनिदर्शनम् ॥४६॥ वृत्तिदानं द्विजानां वै महापुण्यं प्रकीर्तितम् । तथैवाध्यात्मविदुषो दत्तं भवति चाक्षयम् ॥४७॥ कुटुम्बिनं वा शास्त्रज्ञं श्रोत्रियं वा गुणान्वितम् । यो दत्त्वा स्थापयेद्वृत्तिं तस्य पुण्यफलं शृणु ॥४८॥ मातृतः पितृतश्चैव द्विजः कोटिकुलान्वितः । निर्विश्य विष्णुभवनं कल्पं तत्रैव मोदते ॥४६॥ गण्यन्ते पांसवो भूमेर्गण्यन्ते वृष्टिबिन्दवः । न गण्यन्ते विधात्रापि ब्रह्मवृत्तिफलानि वै ॥५०॥ कीर्ति, नीति के साथ सम्पत्ति रहती है वहाँ सभी गुण, सज्जन पुरुष और देवगण सर्वदा निवास करते हैं। अहो ! राजन् ! महाभाग ! आपका चरित्र परमशोभन है। सब प्राणियों की रक्षा आदि गुण मेरे समान देवों में भी दुर्लभ हैं। धर्म के इस प्रकार कहने पर भगीरथ उनके चरणों पर गिर पड़े और प्रसन्न होकर विनम्र भाव से मधुर शब्दों में बोले ॥३६-४०॥ भगीरथ बोले—भगवन् ! सब धर्म के जानने वाले समदर्शी ! सुरेश्वर ! मैं जो पूछ रहा हूँ, वह कृपया बताइए। धर्म कितने प्रकार के हैं, धर्माचरण करने वालों को कौन लोक प्राप्त होते और यातनाएं (नरक) कितनी होती हैं, किन लोगों को यातनाएं दी जाती हैं, आपका किसके ऊपर सम्मान भाव रहता और किसको आप दण्ड देते हैं ? हे महाभाग ! आप इन विषयों को विस्तृत व्याख्या कीजिए ॥४१-४३॥ धर्मराज बोले—महाबुद्धिमान् ! धन्य हो, धन्य हो क्योंकि तुमने विमल बुद्धि प्राप्त की है, मैं धर्म और अधर्म की यथार्थ रूप से व्याख्या कर रहा हूँ, तुम ध्यानपूर्वक सुनो। पुण्य लोकों के देने वाले धर्म बहुत प्रकार के कहे गये हैं। उसी प्रकार अत्यन्त भयङ्कर दीखने वाली यातनायें (नरक) भी असंख्य कही गयी हैं। इस विषय पर विस्तार पूर्वक कुछ कहना सैकड़ों, हजारों वर्षों में भी सम्भव नहीं हो सकता। इसलिए संक्षेप में धर्म और अधर्म का दिग्दर्शन करा रहा हूँ। ब्राह्मणों को जीविका निर्वाह के लिए कुछ देना अत्यन्त पुण्य-प्रद कहा गया है। उसी प्रकार अध्यात्मज्ञाताओं को भी दिया हुआ दान अक्षय पुण्य को देने वाला होता है। जो किसी कुटुम्बी शास्त्रज्ञ अथवा गुणी वेदपाठी को कुछ देकर उसकी जीविका का स्थायी प्रबन्ध कर देता है, उसके पुण्य के फल को सुनो—वह व्यक्ति मातृकुल और पितृकुल के करोड़ों पुरखों सहित विष्णु लोक को जाता है और वहाँ कल्प पर्यन्त सुख भोग करता है ॥४४-४६॥ पृथ्वी के रेणुकण गिने जा सकते हैं और वर्षा की बूंदें भी गिनी जा सकती हैं परन्तु ब्रह्मा भी