बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८८ नारदीयपुराणम् समस्तदेवतारूपो ब्राह्मणः परिकीर्तितः । जीवनं ददतस्तस्य कः पुण्यं गदितुं क्षमः ॥५१॥ यो विप्रहितकृन्नित्यं स सर्वान्कृतवान्मखान् । स स्नातः सर्वतीर्थेषु तप्तं तेनाखिलं तपः ॥५२॥ यो ददस्वेति विप्राणां जीवनं प्रेरयेत्परम् । सोऽपि तत्फलमाप्नोति किमन्यैर्बहुभाषितैः ॥५३॥ तडागं कारयेद्यस्तु स्वयमेवापरेण वा । वक्तुं तत्पुण्यसंख्यानं नालं वर्षशतायुषा ॥५४॥ एकश्चेदध्वगो राजंस्तडागस्य जलं पिवेत् । तत्कर्तुः सर्वपापानि नश्यन्त्येव न संशयः ॥५५॥ एकाहमपि यत्कुर्याद्भूमिस्थमुदकं नरः । स मुक्तः सर्वपापेभ्यः शतवर्षं वसेद्दिवि ॥५६॥ कर्तुं तडागं यो मर्त्यः साहाय्यकः शक्तितो भवेत् । सोऽपि तत्फलमाप्नोति तुष्टः प्रेरक एव च ॥५७॥ मृदं सिद्धार्थमात्रां वा तडागाद्यो बहिः क्षिपेत् । तिष्ठत्यब्दशतं स्वर्गे विमुक्तः पापरकोटिभिः ॥५८॥ देवता यस्य तुष्यन्ति गुरवो वा नृपोत्तम । तडागपुण्यभाक्स स्यादित्येषा शाश्वती श्रुतिः ॥५९॥ इतिहास प्रवक्ष्यामि तवात्र नृपसत्तम । यं श्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ॥६०॥ गौडदेशेऽतिविख्यातो राजासीद्वीरभद्रकः । महाप्रतापी विद्वान्सदा विप्रप्रपूजकः ॥६१॥ वेदशास्त्रकुलाचारयुक्तो मित्रविवर्धनः । तस्य राज्ञी महाभागा नाम्ना चम्पकमञ्जरी ॥६२॥ तस्य राज्ञो महामात्याः कृत्याकृत्यविचारणाः । धर्मार्णा धर्मशास्त्रैस्तु सदा कुर्वन्ति निश्चयम् ॥६३॥ प्रायश्चित्तं चिकित्सां च ज्योतिषे धर्मनिर्णयम् । विना शास्त्रेण यो ब्रूयात्तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥६४॥ इति निश्चित्य मनसा मन्वादीरितधर्मकान् । आचार्येभ्यः सदा भूपः शृणोति विधिपूर्वकम् ॥६५॥
ब्राह्मण को वृत्ति देने के फल की गणना नहीं कर सकते । ब्राह्मण सब देवताओं का रूप कहा गया है, उसको जीविका देने वाले पुरुष के पुण्यों को कौन गिनने में समर्थ हो सकता है ? जो सर्वदा ब्राह्मणों का हित करता है उसने मानो सब यज्ञों का अनुष्ठान कर लिया, सब तीर्थों में स्नान कर लिया और सम्पूर्ण तपस्यायें भी कर लीं । जो ब्राह्मणों को कुछ देने के लिए दूसरों को प्रेरित करता है वह भी दान का फल पाता है । अब इस विषय में अधिक क्या कहा जाय ? जो स्वयं तालाब बनाता या दूसरों से बनवाता है, उसके पुण्यों की गिनती सौ वर्ष की पूरी आयु में नहीं हो सकती है ॥५०-५४॥ एक भी पथिक यदि उस तालाब का जल पी लेगा तो उसको बनाने वाले के सारे पाप धुल जायँगे, इसमें सन्देह नहीं । जो एक दिन के लिए भी जल को किसी गड्ढे या निम्न भूमि में रहने के योग्य बना देता है, वह अपने पापों से मुक्त हो जाता और सौ वर्ष तक स्वर्ग में रहता है। जो मनुष्य तालाब बनवाने में अपनी शक्ति के अनुसार सहायता पहुँचाता है वह भी तालाब बनाने वाले के समान ही फल पाता है और उस कार्य को देखकर प्रसन्न होने वाला या प्रेरित करने वाला भी वही फल पाता है । जो तालाब से थोड़ी सी भी मिट्टी बाहर फेंक देता है वह अपने कोटि पापों से मुक्त हो कर सौ वर्षों तक स्वर्ग में निवास करता है ॥५५-५८॥ नृपोत्तम ! जिसके ऊपर देवता या गुरु प्रसन्न होते हैं, वही तडाग बनवाने का यश प्राप्त करता है, ऐसी श्रुति-परम्परा सुनी जाती है । नृपसत्तम ! इस विषय में तुमसे एक प्राचीन इतिहास कह रहा हूँ, जिसको सुनकर निःसन्देह मनुष्य पापों से छूट जाता है । गौड़ देश में अति विख्यात वीरभद्रक नामक राजा था। वह महाप्रतापी, विद्वान् और ब्राह्मणों का पूजक था ॥५६-६१॥ वह वेद-शास्त्रों तथा अपने कुलाचार से युक्त था और मित्रों को बढ़ाने वाला था । उसकी महाभाग्यशालिनी रानी का नाम चंपकमंजरी था । उस राजा के कर्त्तव्या- कर्त्तव्य का विवेक करने वाले महामन्त्री थे। वे धर्मशास्त्रों के अनुसार न्याय का निर्णय करते थे। प्रायश्चित्त, चिकित्सा और ज्योतिष शास्त्र सम्बन्धी धर्मनिर्णय जो शास्त्र के अनुकूल नहीं करता है, उसको ब्रह्मघाती कहा जाता है, ऐसा मन में निश्चय कर वह आचार्यों से मनु आदि धर्माचार्यों के बारे में सर्वदा विधिपूर्वक