भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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द्वादशोऽध्यायः ८६ न कोऽप्यन्यायवर्ती च तस्य राज्येऽवरोऽपि च। धर्मेण पाल्यमानस्य तस्य देशस्य भूपतेः ॥६६॥ जातं समत्वं स्वर्गस्य सौराज्यस्य शुभावहम्। स चैकदा तु नृपतिर्मृगयायां महावने ॥६७॥ मन्त्र्यादिभिः परिवृतो बभ्राम मध्यभास्करम्। दैवादाखेटशून्यस्य ह्यतिश्रान्तस्य यत्र वै ॥६८॥ नृपरीतस्य संजातं सरसो दर्शनं नृप। ततः शुष्कां तु सरसीं दृष्ट्वा तत्र व्यचिन्तयत् ॥६९॥ किमियं सरसी शृङ्गे भुवः केन विनिर्मिता। कथं जलं भवेदत्र येन जीवेदयं नृपः ॥७०॥ ततो बुद्धिः समभवत्खाते तस्या नृपोत्तम। हस्तमात्रं ततो गर्तं खात्वा तोयमवाप्तवान् ॥७१॥ तेन तोयेन पीतेन राजंस्तृप्तिरजायत। मन्त्रिणश्चापि भूमीश बुद्धिसागरसंज्ञिनः ॥७२॥ स बुद्धिसागरो भूपं प्राह धर्मार्थकोविदः। राजन्नीयं पुष्करिणी वर्षाजलवती पुरा ॥७३॥ अद्यैनां बद्धवप्रां च कर्तुं जाता मतिर्मम। तद्भवन्मोदतां देव दत्तादाज्ञां च मेऽनघ ॥७४॥ इति श्रुत्वा वचस्तस्य मन्त्रिणो नृपसत्तमः। मुमुदेऽतितरां भूपः स्वयं कर्तुं समुद्यतः ॥७५॥ तमेव मन्त्रिणं तत्र युयोज शुभकर्मणि। ततो राजाज्ञया सोऽपि बुद्धिसागरको मुदा ॥७६॥ सरसीं सागरं कर्तुमुद्यतः पुण्यकृत्तमः। धनुषां चैव पञ्चाशत्सर्वतो विस्तृतायताम् ॥७७॥ सरसीं बद्धसुशिलां चकरागाधशम्बराम्। तां विनिर्माय सरसीं राज्ञे सर्वं न्यवेदयत् ॥७८॥ तस्यां ततः प्रभृति वै सर्वेऽपि वनचारिणः। पान्थाः पिपासिता भूप लभन्ते स्म जलं शुभम् ॥७९॥ कदाचित्स्वायुषश्चान्ते स मन्त्री बुद्धिसागरः। प्रमृतो गतवाँल्लोकं लोकशास्तुर्मम प्रभो ॥८०॥ तदर्थं तु मया पृष्टो धर्मो धर्मलिपिकरः। चित्रगुप्तस्तु तत्कर्म मह्यं सर्वं न्यवेदयत् ॥८१॥ सुना करता था ॥६१-६५॥ धर्म पूर्वक प्रजापालन करने वाले उस भूपति के देश में कोई भी अन्याय नहीं करता था और न कोई अधम था। उसका राज्य शुभ दायक स्वर्ग की कोटि में गिना जाने लगा। वह राजा एक दिन मृगया के लिए महावन में गया। वहाँ दुपहरी में मन्त्रियों के साथ इधर उधर घूमने लगा। दैवयोग से आखेट न पाकर अपने अनुचरों के सहित वह थक गया। उसी समय उसको एक सरोवर दिखाई दिया। उस सरोवर को सूखा देखकर सभी विचार करने लगे कि इस ऊँची भूमि पर किसने इस सरोवर को बनवाया। किस प्रकार इस सरोवर में जल प्राप्त किया जा सकता है, जिससे कि यह राजा अपनी पिपासा शान्त कर जीवित रह सके। नृपोत्तम ! शीघ्र ही उनको उसको खनने की युक्ति सूझ गई। तदनन्तर एक हाथ भूमि के खनने से जल निकल आया ॥६६-७१॥ उस जल को पीकर राजा तृप्त हो गया। भूमेश ! उसके बुद्धिसागर नामक मन्त्री को भी उस पानी के पीने से तृप्ति हुई। उस धर्मतत्त्वों के जानने वाले बुद्धिसागर ने राजा से कहा— राजन् ! यह पुष्करिणी (पोखरी) पहले वर्षा के जल से भरी हुई थी। आज इसको चारों ओर से बांध कर उत्तम बनवाने की मेरी इच्छा हो रही है, देव ! आप भी इसका अनुमोदन करें और हे अनघ ! इसके लिये मुझे आदेश दें ॥७२-७४॥ नृपसत्तम अपने मन्त्री की बातों को सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुये और स्वयं उस निर्माण कार्य के लिए तैयार हो गए और शुभ कर्म में उसी मन्त्री को नियुक्त कर दिया। तत्पश्चात् वह पुण्य- शील मन्त्री बुद्धिसागर भी प्रसन्न होकर उस सरसी को सागर (झील) बनाने के लिए उद्यत हो गया। चारों ओर पचास धनुष लम्बा और उतना ही चौड़ा सरोवर खनवाया और चारों ओर पत्थर से उसको बँधवा कर अगाध जल से परिपूर्ण करा दिया। इस प्रकार उस सरसी को सागर बनवा देने के बाद राजा से निवेदन किया। तब से उस सागर के स्वच्छ जल को सभी प्यासे जंगली जीव और पथिक पीने लगे। कुछ दिनों के अनन्तर आयु के क्षीण हो जाने से वह मन्त्री बुद्धिसागर मर गया और लोकों पर शासन करने वाले मेरे लोक में आया। उसके विषय में मैंने धर्मलिपिक चित्रगुप्त से पूछा। उसने उसके कर्मों को मुझसे कहा कि इसने १२-ना० पु०