बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८५ द्वादशोऽध्यायः पाककर्तुः परस्यार्थे कवये गदहारिणे । अभक्ष्यभक्षकस्यापि दत्तं भवति निष्फलम् ॥११॥ शूद्रान्नभोजिनश्चैव शूद्राणां शवदाहिनः । पौंश्चलान्नभुजश्चापि दत्तं भवति निष्फलम् ॥१२॥ नामविक्रयिणो विष्णोः संध्याकर्मोज्झितस्य च । दुष्प्रतिग्रहदग्धस्य दत्तं भवति निष्फलम् ॥१३॥ दिवाशयनशीलस्य तथा मैथुनकारिणः । संध्याभोजिन एवापि दत्तं भवति निष्फलम् ॥१४॥ महापातकयुक्तस्य त्यक्तस्य ज्ञातिबान्धवैः । कुण्डस्य चापि गोलस्य दत्तं भवति निष्फलम् ॥१५॥ परिवित्तिः शठस्यापि परिवेत्तुः प्रमादिनः । स्त्रीजितस्यातिदुष्टस्य दत्तं भवति निष्फलम् ॥१६॥ मद्यमांसाशिनश्चापि स्त्रीविटस्यातिलोभिनः । चौरस्य पिशुनस्यापि दत्तं ० ॥१७॥ ये केचित्पापनिरता निन्दिताः सुजनैः सदा । न तेभ्यः प्रतिगृह्णीयान्न च दद्याद्द्विजोत्तम । सत्कर्मनिरतायापि देयं यत्नेन नारद ॥१८॥ यद्दानं श्रद्धया दत्तं तथा विष्णुसमर्पणम् । याचि वापि पात्रे ण भवेत्तद्दानमुत्तमम् ॥१९॥ परलोकं समुद्दिश्य ह्यैहिकं वापि नारद । यद्दानं दीयते पात्रे तद्दानं मध्यमं स्मृतम् ॥२०॥ दम्भेन चापि हिंसार्थं परस्याविधिनापि च । क्रूद्धेनाश्रद्धयापात्रे तद्दानं मध्यमं स्मृतम् ॥२१॥ अधमं बलितोषाय मध्यमं स्वार्थसिद्धये । उत्तमं हरिप्रीत्यर्थं प्राहुर्वेदविदां वराः ॥२२॥
१०॥ दूसरे का भोजन बनाने वाले (रसोइया) कवि (भांट), वैद्य और अभक्ष्य-भक्षक को दान देना व्यर्थ होता है । शूद्रों का अन्न खाने वाले, शूद्रों के शव का दाह करने वाले और वेश्या का अन्न खाने वाले विप्र को दान देना निष्फल है । विष्णु के नाम को बेचने वाले (पैसे लेकर हरिकीर्तन करने वाले), सन्ध्या न करने वाले, अनुचित दान रूपी अग्नि में अपने आचार और जीवन को जला देने वाले विप्र को दान देना व्यर्थ हो जाता है । दिन में सोने वाले और स्त्री भोग करने वाले, संध्या समय भोजन करनेवाले ब्राह्मण को दिया हुआ दान निरर्थक है । महापापी, बन्धु-बान्धवों से बहिष्कृत, कुण्ड¹ और गोलक² को दान देना निष्फल होता है ॥११-१५॥ परिवेत्ता, शठ, परिवित्त³, प्रमादी स्त्री के वश में रहने वाले और अतिदुष्ट विप्र को दान देना निष्फल होता है । मद्य मांस खाने वाले, अति लोभी, स्त्रीविट (स्त्रियों के दलाल) चोर और अति लोभी को दान देना निष्फल होता है । द्विजोत्तम ! जो कोई पाप करने पर ही तुले रहते अथवा सर्वदा सज्जन जिसकी निन्दा करते हैं उनसे भी न तो दान लेना चाहिए और न देना ही चाहिए । नारद ! सत्कर्म करने वाले विप्र को प्रयत्नपूर्वक ढूंढ कर दान देना चाहिए, श्रद्धापूर्वक जो दान दिया जाता है अथवा जो विष्णु को समर्पित किया जाता है, अथवा स्वयं सत्पात्र की याचना पर जो दिया जाता है वह उत्तम दान कहा जाता है ॥१६-१६॥ नारद ! परलोक अथवा संसार सुख की कामना से जो दान सत्पात्र को दिया जाता है, वह काम्य दान है और वह मध्यम श्रेणी का है । दम्भ-पूर्वक, दूसरे की हिंसा के लिए (दूसरे को चिढ़ाने की दृष्टि से अथवा कष्ट देने की दृष्टि से), अविधि पूर्वक, क्रोधपूर्वक, अश्रद्धा से अपात्र में दिया हुआ दान मध्यम कोटि का माना गया है। बलि के लिए दिया हुआ दान अधम कोटि का और स्वार्थ सिद्धि के निमित्त दिया हुआ दान मध्यम कोटि का होता है। वेदज्ञों में श्रेष्ठ पण्डितों ने विष्णु प्रीति के लिए दिये हुए दान को उत्तम माना है । दान, भोग और विनाश
१. पति के रहते अन्यपति से उत्पन्न पुत्र । २. पति के मर जाने पर उत्पन्न किया हुआ पुत्र ३. वह बड़ा भाई जिससे पहले उसके छोटे भाई ने ब्याह कर लिया हो ।