बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 113, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंयहाँ दिए गए पृष्ठ का संपूर्ण पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति (Line-by-line) रूप में प्रस्तुत है:
[पृष्ठ शीर्ष] ६४ नारदीयपुराणम्
संस्कृत श्लोक
इक्षुतोयेन देवेशं यः स्नापयति भूपते । केशवं लक्षपितृभिः सार्द्धं विष्णुपदं व्रजेत् ॥४०॥ पुष्पोदकेन गोविन्दं तथा गन्धोदकेन च । स्नापयित्वा हरिं भक्त्या वैष्णवं पदमाप्नुयात् ॥४१॥ जलेन वस्त्रपूतेन यः स्नापयति माधवम् । सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुना सह मोदते ॥४२॥ क्षीराद्यैः स्नापयेद्यस्तु रविसंक्रमणे हरिम् । स वसेद्विष्णुसदने त्रिसप्तपुरुषैः सह ॥४३॥ शुक्लपक्षे चतुर्दश्यामष्टम्यां पूर्णिमादिने ॥४४॥ एकादश्यां भानुवारे द्वादश्यां पञ्चमीतियौ । सोमसूर्योपरागे च मन्वादिषु युगादिषु ॥४५॥ अर्द्धोदये च सूर्यस्य पुष्यार्के रोहिणीबुधे । तथैव शनिरोहिण्यां भौमाश्विन्यां तथैव च ॥४६॥ शन्य भार्गवमृगे चैव भृगुरेवतिसङ्गमे । तथा बुधानुराधायां श्रवणार्के तथैव च ॥४७॥ तथा च सोमश्रवणे हस्तयुक्ते बृहस्पतौ । बुधाष्टम्यां बुधाषाढे पुण्ये चान्ये दिने तथा ॥४८॥ स्नापयेत्पयसा विष्णुं शान्तिमान् वाग्यतः शुचिः । घृतेन मधुना वापि दध्ना वा तत्फलं शृणु ॥४९॥ सर्वयज्ञफलं प्राप्य सर्वपापविवर्जितः । वसेद्विष्णोः पुरे सार्द्धं त्रिसप्तपुरुषैर्नृप ॥५०॥ तत्रैव ज्ञानमासाद्य योगिनामपि दुर्लभम् । मोक्षमाप्नोति नृपते पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥५१॥ कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां सोमवारे च भूपते । शिवं संस्नाप्य दुग्धेन शिवसायुज्यमाप्नुयात् ॥५२॥ नालिकेरोदकेनापि शिवं संस्नाप्य भक्तितः । अष्टम्यामिन्दुवारे वा शिवसायुज्यमश्नुते ॥५३॥ शुक्लपक्षे चतुर्दश्यामष्टम्यां वापि भूपते । घृतेन मधुना स्नाप्य शिवं तत्साम्यतां व्रजेत् ॥५४॥ तिलतैलेन संस्नाप्य विष्णुं वा शिवमेव च । स याति तत्तत्सारूप्यं पितृभिः सह सप्तभिः ॥५५॥ शिवमिक्षुरसेनापि यः स्नापयति भक्तितः । शिवलोके वसेत्कल्पं स सप्तपुरुषैः सह ॥५६॥
हिन्दी अनुवाद
रस से जो देवेश विष्णु को को नहलाता है वह अपने लाख पितरों के सहित विष्णुलोक को जाता है। जो पुष्प मिश्रित जल और सुगन्धित जल से हरि को भक्ति पूर्वक स्नान कराता है वह वैष्णव पद को प्राप्त करता है। ॥३८-४१॥ जो मनुष्य कपड़े से छने हुए जल से माधव को नहलाता है वह सब पापों से मुक्त होकर विष्णु के साथ आनन्द प्राप्त करता है। जो सूर्य ग्रहण के समय दूध आदि से भगवान् हरि को नहलाता है, वह इक्कीस कुल पुरुषों के साथ विष्णुलोक में निवास करता है ॥४२-४३॥ शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी, अष्टमी, पूर्णमासी एकादशो, रविवार, द्वादशी और पंचमी तिथि को, एवं चन्द्र और सूर्य के ग्रहण के समय, मन्वादि काल, युगादिकाल, सूर्य के अर्द्धोदय काल में, पुष्य के सूर्य, रोहिणी के बुध और शनि, अश्विनी के मंगल, शनि के शुक्र और चन्द्रमा, रेवती और शुक्र के संगम, अनुराधा के बुध, श्रवण के सूर्य एवं चन्द्रमा, हस्तनक्षत्र के बृहस्पति अष्टमीतिथि को बुध पड़ने पर, आषाढ़ में बुध के दिन अथवा अन्य पुण्य पर्वों पर जो मनुष्य शान्त और मौन होकर पवित्र भाव से दूध, घी, मधु या दही से भगवान् विष्णु को नहलाता हैं, उसका फल सुनो ॥४४-४६॥ नृप ! वह व्यक्ति सब पापों से मुक्त हो जाता और सब यज्ञों का फल पाकर अपने इक्कीस कुलों के साथ विष्णुलोक में निवास करता है। वहीं योगियों के लिए भी दुर्लभ ज्ञान को प्राप्त कर आवागमन से रहित निर्वाण को प्राप्त करता है। भूपते ! कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी और सोमवार के दिन शिव को दूध से नहलाने से शिवसायुज्य प्राप्त होता है। अष्टमी या सोमवार को भक्ति पूर्वक नारियल के जल से शिव को नहलाने से शिव सायुज्य प्राप्त होता है। शुक्ल-पक्ष की चतुर्दशी या अष्टमी को घृत और मधु से शिव को स्नान कराने से शिव साम्य प्राप्त होता है ॥५०-५४॥ तिल के तेल से विष्णु अथवा शिव को नहलाने से वह व्यक्ति अपनी सात पीढ़ियों के साथ शिव या विष्णु का सारूप्य प्राप्त करता है। जो शिव को गन्ने के रस से भक्ति पूर्वक स्नान कराता है, वह कल्पान्त तक सात कुलों के साथ शिव लोक में निवास करता है। जो देवोत्थान एकादशो और