भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 112, कुल 1008 में से

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६३ त्रयोदशोऽध्यायः सप्तकोटिकुलैर्युक्तो मातृतः पितृतस्तथा । वसेत्कल्पशतं साग्रं नारायणपदे नृप ॥२४॥ ऊर्ध्वपुण्ड्रधरो यस्तु तुलसीमूलमृत्स्नया । गोपिकाचन्दनेनापि वा चित्रकूटमृदापि वा । गङ्गामृत्सिकया चैव तस्य पुण्यफलं शृणु ॥२६॥ विमानवरमारूढो गन्धर्वाप्सरसां गणैः । संगीयमानचरितो मोदते विष्णुमंदिरे ॥२७॥ पत्राणि तुलसीमूलाद्यावन्ति पतितानि वै । तावन्ति ब्रह्महत्यादिपातकानि हतानि च ॥२८॥ तुलस्यां सेचयेद्यस्तु जलं चुलुकमात्रकम् । क्षीरोदवासिना सार्द्धं वसेदाचंद्रतारकम् ॥२६॥ ददाति ब्राह्मणानां यः कोमलं तुलसीदलम् । स याति ब्रह्मसदने कुलत्रितयसंयुतः ॥३०॥ शालग्रामेऽर्पयेद्यस्तु तुलस्यास्तु दलानि च । स वसेद्विष्णुभवने यावदाहूतसंप्लवम् ॥३१॥ कण्टकावरणं यस्तु प्राकारं वापि कारयेत् । सोऽप्येकविंशतिकुलैर्मोदते विष्णुमंदिरे ॥३२॥ योऽर्चयेद्धरिपादाब्जं तुलस्याः कोमलैर्दलैः । न तस्य पुनरावृत्तिर्विष्णुलौकान्नरेश्वर ॥३३॥ द्वादश्यां पौर्णमास्यां यः क्षीरेण स्नापयेद्धरिम् । कुलायुतयुतः सोऽपि मोदते वैष्णवे पदे ॥३४॥ प्रस्थमात्रेण पयसा यः स्नापयति केशवम् । कुलायुतायुतवृतः सोऽपि विष्णुपुरे वसेत् ॥३५॥ घृतप्रस्थेन यो विष्णुं द्वादश्यां स्नापयेन्नरः । कुलकोटियुतो राजन्सायुज्यं लभते हरेः ॥३६॥ पञ्चामृतेन यः स्नानमेकादश्यां तु कारयेत् । विष्णोः सायुज्यकं तस्य भवेत्कुलशतायुतैः ॥३७॥ एकादश्यां पौर्णमास्यां द्वादश्यां वा नृपोत्तम । नालिकेरोदकैर्विष्णुं स्नापयेत्तत्फलं शृणु ॥३८॥ दशजन्मार्जितैः पापैर्विमुक्तो नृपसत्तम । शतद्वयकुलैर्युक्तो मोदते विष्णुना सह ॥३६॥ हैं राजन् ! उनके पुण्यों को बता रहा हूँ सुनो ॥२२-२४॥ हे नृप ! वह माता और पिता कुल की सात करोड़ पीढ़ियों के सहित सौ कल्पों तक नारायण लोक में निवास करता है। जो तुलसी मूल की मिट्टी से ऊर्ध्व पुण्ड्र लगाता है, अथवा गोपी चन्दन या चित्रकूट की मिट्टी या गंगा की मिट्टी का चन्दन लगाता है उसके पुण्य फल को सुनो--वह श्रेष्ठ विमान पर आरूढ़ होकर गन्धर्व और अप्सराओं के द्वारा अपनी स्तुति सुनता हुआ विष्णु भवन में आनन्द प्राप्त करता है। तुलसी वृक्ष के मूल से जितनी पत्तियां गिरती हैं उतने ब्रह्महत्यादि पातक नष्ट हो जाते हैं । जो तुलसी की जड़ को एक चुल्लू जल से भी सींचता है, वह प्रलय पर्यन्त क्षीरशायी विष्णु के साथ निवास करता है ॥२५-२६॥ जो ब्राह्मणों को तुलसी की कोमल पत्तियां प्रदान करता है वह अपनी तीन पीढ़ियों के साथ ब्रह्मलोक में निवास करता है। जो शालग्राम की मूर्ति पर तुलसी पत्र समर्पित करता है, वह कल्प पर्यन्त विष्णु भवन में रहता है। जो कांटेदार तार से घेराव करा देता या चहारदीवारी बनवा देता है वह अपनी इक्कीस कुल परम्परा के साथ विष्णु मन्दिर में आनन्द पूर्वक निवास करता है । जो भगवान् के कमलवत् चरणों की तुलसी की कोमल पत्तियों से पूजा करता है, नरेश्वर ! उसको पुनः विष्णु लोक से लौटना नहीं पड़ता ॥३०-३३॥ द्वादशी और पूर्णमासी के दिन जो दूध से भगवान् को नहलाता है वह अपने दश हजार कुलों के सहित विष्णुलौक में सुख भोग करता है। जो केशव को एक प्रस्थ (सेर) दूध से स्नान कराता हे वह भी अपनी एक लाख वंश परम्परा के साथ विष्णु लोक में निवास करता है। जो मनुष्य एक सेर घी से द्वादशी के दिन विष्णु को स्नान करता है, वह अपने कोटि कुल के साथ विष्णु की सायुज्य मुक्ति प्राप्त करता है। जो एकादशी के दिन पंचामृत से विष्णु भगवान् को नहलाता है वह अपने सौ कुल के साथ विष्णु की सायुज्य मुक्ति प्राप्त करता है ॥३४-३७॥ नृपोत्तम ! जो एकादशी, द्वादशी और पूर्णिमा के दिन नारियल के जल से विष्णु को स्नान कराता है उसका फल सुनो-नृपोत्तम ! वह अपने दश जन्म के पापों से मुक्त होकर अपनी दो सौ कुल परम्परा के साथ विष्णुलौक में भगवान् के साथ परमानन्द प्राप्त करता है। भूपते ! गन्ने के

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