भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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६२ नारदीयपुराणम् त्रिगुणं चेष्टकाभिस्तु शिलाभिस्तच्चतुर्गुणम् । स्फाटिकाभिः शिलाभिस्तु ज्ञेयं दशगुणेतरम् ॥८॥ ताम्रीभिस्तच्छतगुणं हेम्ना कोटिगुणं भवेत् । देवालयं तडागं वा ग्रामं वा पालयेत्तु यः ॥१०॥ कर्तुः शतगुणं तस्य पुण्यं भवति भूपते । देवालयस्य शुश्रूषां लेपसेचनलंडनैः ॥११॥ कुर्याद्यस्सततं भक्त्या तस्य पुण्यमनन्तकम् । वेतनाद्विष्टितो वापि पुण्यकर्मप्रवर्त्तिताः ॥१२॥ ते गच्छंति धराधाराः शाश्वतं वैष्णवं पदम् । तडागार्द्धफलं राजन्कासारे परिकीर्तितम् ॥१३॥ कूपे पादफलं ज्ञेयं वाप्यां पद्माकरोन्मितम् । वापीशतगुणं प्रोक्तं कुल्यायां भूपतेः फलम् ॥१४॥ दृषद्विभस्तु धनी कुर्यान्मृदा निष्किञ्चनो जनः । तयोः फलं समानं स्यादित्याह कमलोद्भवः ॥१५॥ दद्यादाढ्यस्तु नगरं हस्तमात्रमकिंचनः । भुवं तयोः समफलं प्राहुर्वेदविदो जनाः ॥१६॥ धनाढ्यः कुरुते यस्तु तडागं फलसाधनम् । दरिद्रः कुरुते कूपं समं पुण्यं प्रकीर्तितम् ॥१७॥ आश्रमं कारयेद्यस्तु बहुजन्तूपकारकम् । स याति ब्रह्मभुवनं कुलत्रयसमन्वितः ॥१८॥ धेनुर्वा ब्राह्मणो वापि यो वा को वापि भूपते । क्षणार्द्धं तस्य छायायां तिष्ठन्स्वर्गं नयेत्प्रभुम् ॥१९॥ आरामारका राजन्देवतागृहकारिणः । तडागग्रामकर्त्तारः पूज्यन्ते हरिणा सह ॥२०॥ सर्वलोकोपकारार्थं पुष्पारामं जनेश्वर । कुर्वते देवतार्थं वा तेषां पुण्यफलं शृणु ॥२१॥ तत्र यावन्ति पर्णानि कुसुमानि भवन्ति च । तावद्वर्षाणि नाकस्थो मोदते कुलकोटिभिः ॥२२॥ प्राकारकारिणस्तस्य कंटकावरणप्रदाः । प्रयान्ति ब्रह्मणः स्थानं युगानामेकसप्ततिम् ॥२३॥ तुलसीरोपणं ये तु कुर्वते मनुजेश्वर । तेषां पुण्यफलं राजन्वदतो मे निशामय ॥२४॥ और सुवर्ण से बनवाने वाले को करोड़ गुना फल मिलता है। जो बने हुए तड़ाग, मन्दिर या ग्राम की रक्षा या पुनः निर्माण कराता है उसको बनवाने वाले की अपेक्षा सौगुना अधिक फल मिलता है ॥७-१०१/२॥ जो स्वच्छता लिपाई और सजावट के द्वारा देव मन्दिर की भक्ति से सेवा करता है, उसको तो असंख्य पुण्य मिलता है। जो स्वयं अपनी इच्छा से अथवा प्रतियोगिता की भावना से पुण्य कर्मों में प्रवृत्त होते हैं वे पृथ्वी को सुशोभित करने करने वाले महापुरुष शाश्वत वैष्णव पद को प्राप्त करते हैं। राजन् ! तड़ाग की अपेक्षा कासार (छोटा तालाब) बनवाने में आधा फल, कुआँ बनवाने में चौथाई और बावली बनवाने में सरोवर-निर्माण तुल्य फल मिलता है। भूपते ! बावली से सौगुना फल कुल्या बनवाने से मिलता है। धनी लोग यदि पत्थर से बँधे घाट वाले तालाब आदि बनवावें और साधारण व्यक्ति मिट्टी का ही बनवावें तो भी दोनों को समान ही फल मिलता है, ऐसा स्वयं ब्रह्मा ने कहा है ॥११-१५॥ वेदज्ञों ने बतलाया है कि धनी व्यक्ति बड़े नगर का दान करे और दरिद्र व्यक्ति यदि एक हाथ भूमि का दान करे तो भी बराबर ही फल मिलता है। जो धनाढ्य व्यक्ति पुण्य देने वाले तड़ाग को बनवाता है उसको भी उतना ही फल मिलता है जितना एक साधारण व्यक्ति को कुआँ बनवाने से। जो बहुत लोगों की भलाई के लिए सत्यता पूर्वक किसी वस्तु की स्थापना करता है वह अपनी तीन पीढ़ियों के साथ ब्रह्म लोक को चला जाता है। धेनु और ब्राह्मण चाहे कैसा ही क्यों न हो, उस (वृक्ष आदि) की छाया में क्षण भर रह प्रतिष्ठापक को स्वर्ग को प्राप्त कराता है। राजन् ! वाटिका लगाने वाले, देवमन्दिर बनवाने वाले तड़ाग और गाँव बनवाने वाला व्यक्ति विष्णु के साथ पूजित होता है ॥१६-२०॥ जो सबकी भलाई के लिए या देवता की पूजा के लिए पुष्पवाटिका निर्माण कराता है उनके पुण्य फल को सुनो ॥२१॥ उस पुष्प वाटिका में जितनी पत्तियां या फूल होते हैं उतने वर्षों तक अपने कोटि वंशों के साथ आनन्द पूर्वक स्वर्ग में निवास करता है। उस वाटिका की रक्षा के लिए चहारदीवारी बनवाने वाले या कँटीले तार से घेर कर सुरक्षित बनाने वाले इकहत्तर युग तक ब्रह्म लोक में रहते हैं। मनुजेश्वर ! जो तुलसी का पौधा लगाते