भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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त्रयोदशोऽध्यायः ६५ घृतेन स्नापयेल्लिङ्गमुत्थाने द्वादशीदिने । क्षीरेण वा महाभाग तत्फलं शृणु मद्गिरा ॥५७॥ जन्मायुतकृतैः पापैर्विमुक्तो मनुजो नृप । कोटिसंख्यं समुद्धृत्य स्वकुलं शिवतां व्रजेत् ॥५८॥ सम्पूज्य गन्धकुसुमैर्विष्णुं विष्णुतियौ नृपः । जन्मायुताजितैः पापैर्मुक्तो व्रजति तत्पदम् ॥५६॥ पद्मपुष्पेण यो विष्णुं शिवं वा पूजयेन्नरः । स याति विष्णुभवनं कुलकोटिसमन्वितः ॥६०॥ हरिं च केतकीपुष्पैः शिवं धत्तूरजैर्निशि । संपूज्य पापनिर्मुक्तो वसेद्विष्णुपुरे युगम् ॥६१॥ हरिं तु चाम्पकैः पुष्पैर्धर्कपुष्पैश्च शंकरम् । समभ्यर्च्य महाराज तत्तत्सालोक्यमाप्नुयात् ॥६२॥ शंकरस्याथवा विष्णोर्घृतयुक्तं च गुग्गुलुम् । दत्त्वा धूपो नरो भक्त्या सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥६३॥ तिलतैलान्वितं दीपं विष्णोर्वा शंकरस्य वा । दत्त्वा नरः सर्वकामान्संप्राप्नोति नृपोत्तम ॥६४॥ घृतेन दीपं यो दद्याच्छंकरायाथ विष्णवे । स मुक्तः सर्वपापेभ्यो गङ्गास्नानफलं लभेत् ॥६५॥ ग्राम्येण वापि तैलेन राजन्नन्येन वा पुनः । दीपं दत्त्वा महाविष्णोः शिवस्यापि फलं शृणु ॥६६॥ सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वैश्वर्यसमन्वितः । तत्तत्सालोक्यमाप्नोति त्रिःसप्तपुरुषान्वितः ॥६७॥ यद्यदिष्टतमं भोज्यं तत्तदीशाय विष्णवे । दत्त्वा तत्तत्पदं याति चत्वारिंशत्कुलान्वितः ॥६८॥ यद्यदिष्टतमं वस्तु तत्तद्विप्राय दापयेत् । स याति विष्णुभवनं पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥६६॥ भ्रूणहा स्वर्णदानेन शुद्धो भवति भूपते । अन्नतोयसमं दानं न भूतं न भविष्यति ॥७०॥ अन्नदः प्राणदः प्रोक्तः प्राणदश्चापि सर्वदः । सर्वदानफलं यस्मादन्नदस्य नृपोत्तम ॥७१॥ द्वादशी के दिन दूध अथवा घी से शिवलिंग को नहलाता है, महाभाग, उसके फल को मैं कह रहा हूँ सुनो । नृप ! वह मनुष्य हजार जन्म के पापों से मुक्त होकर अपने करोड़ कुलों का उद्धार कर शिव स्वरूप हो जाता है । ॥५७-५८॥ नृप ! जो विष्णु-तिथि (एकादशी) को गंध और फूल से विष्णु की पूजा करता है वह हजार जन्म के पापों से मुक्त होकर विष्णु पद को प्राप्त करता है । जो मनुष्य कमल पुष्प से विष्णु या शिव की पूजा करता है, वह अपने करोड़ कुलों के सहित विष्णु लोक को जाता है । जो विष्णु को केवड़े के फूल से और शिव को धतूरे के फूल से रात में पूजा करता है वह अपने पापों से मुक्त होकर युग पर्यन्त विष्णु लोक में निवास करता है । ॥५६-६०॥ महाराज ! जो हरि को चम्पे के फूल से और शिव को मदार के फूल से पूजा करता है वह उसकी सालोक्य रूप मुक्ति पाता है । जो मनुष्य घृत युक्त गुग्गुल से विष्णु या शिव को भक्ति पूर्वक धूप देता है वह सब पापों से मुक्त हो जाता है । नृपोत्तम ! जो तिल-तैल से भरे हुए दोपक से विष्णु अथवा शंकर को दीप दिखलाता है वह अपने सब मनोरथों को प्राप्त करता है । जो शंकर अथवा विष्णु को घी का दीपक देता है, वह सब पापों से मुक्त होकर गंगा-स्नान का फल पाता है । राजन् ! जो ग्राम्य या किसी अन्य तेल से विष्णु या शिव को दीपक दिखाता है, उससे जो फल मिलता है, उसको सुनो ॥६१-६६॥ वह व्यक्ति सब प्रकार के पापों से छूट जाता और सब प्रकार के ऐश्वर्यों को प्राप्त कर अपने इक्कीस कुलों के साथ उन देवों का सालोक्य प्राप्त करता है ॥६७॥ अपने जो प्रिय भोज्य पदार्थ हैं उनको अपने इष्ट देवता शिव या विष्णु के लिए अर्पित करने से मनुष्य अपने चालीस कुलों के सहित शिव और विष्णुलोक को जाता है । जो पदार्थ अपने को प्रिय लगते हैं उन उनको ब्राह्मणों के लिए अर्पित कर देना चाहिए, ऐसा करने से वह व्यक्ति आवागमन से रहित विष्णुलोक को प्राप्त कर लेता है । भूपते ! भ्रूण हत्या करने वाला व्यक्ति सुवर्णदान से पुनीत हो जाता है । भूपते ! जल और अन्न दान के समान कोई भी दान इस संसार में नहीं है। अन्न दान करने वाला प्राणदाता कहा गया है और जो प्राणदाता है वह सर्वदाता है । नृपोत्तम ! इसलिये अन्न दान करने वाले को सब दानों का फल प्राप्त होता है ॥६८-७१॥ अन्नदाता अपने परिवार सहित ब्रह्मलोक को जाता है। वह संसार