भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 115, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 115

६६ नारदीयपुराणम् अन्नदो ब्रह्मसदनं याति वंशायुतान्वितः । न तस्य पुनरावृत्तिरिति शास्त्रेषु निश्चितम् ॥७२॥ सद्यस्तुष्टिकरं ज्ञेयं जलदानं यतोऽधिकम् । अन्नदानान्नृपश्रेष्ठ निर्दिष्टं ब्रह्मवादिभिः ॥७३॥ महापातकयुक्तो वा युक्तो वाप्युपपातकैः । जलदो मुच्यते तेभ्य इत्याह कमलोद्भवः ॥७४॥ शरीरमन्नजं प्राहुः प्राणानप्यन्नजान्विदुः । तस्मादन्नप्रदो ज्ञेयः प्राणदः पृथिवीपते ॥७५॥ यद्यत्तुष्टिकरं दानं सर्वकामफलप्रदम् । तस्मादन्नसमं दानं नास्ति भूपाल भूतले ॥७६॥ अन्नदस्य कुले जाता आसहस्रं नृपोत्तम । नरकं ते न पश्यन्ति तस्मादन्नप्रदो वरः ॥७७॥ पादाभ्यङ्गं भक्तियुक्तो यदतिथेः कुरुते नरः । स स्नातः सर्वतीर्थेषु गङ्गास्नानपुरःसरम् ॥७८॥ तैलाभ्यङ्गं महाराज ब्राह्मणानां करोति यः । स स्नातोऽष्टशतं साग्रं गङ्गायां नात्र संशयः ॥७९॥ रोगितान्ब्राह्मणान्यस्तु प्रेम्णा रक्षति रक्षकः । स कोटिकुलसंयुक्तो वसेद्ब्रह्मपुरे युगम् ॥८०॥ यो रक्षेत्पृथिवीपाल रङ्कं वा रोगिणं नरम् । तस्य विष्णुः प्रसन्नात्मा सर्वान्कामान्प्रयच्छति ॥८१॥ मनसा कर्मणा वाचा यो रक्षेद्दामयान्वितम् । सर्वान्कामानवाप्नोति सर्वपापविवर्जितः ॥८२॥ यो ददाति महीपाल निवासं ब्राह्मणाथ वै । तस्य प्रसन्नो देवेशः स्वलोकं संप्रयच्छति ॥८३॥ ब्राह्मणाय ब्रह्मविदे यो दद्याद्गां पयस्विनीम् । स याति ब्रह्मसदनमन्येषामतिदुर्लभम् ॥८४॥ अन्येभ्यः प्रतिगृह्यापि यो दद्याद्गां पयस्विनीम् । तस्य पुण्यफलं वक्तुं नाहं शक्तोऽस्मि पण्डित ॥८५॥ कपिलां वेदविदुषे यो ददाति पयस्विनीम् । स एव रुद्रो भूपाल सर्वपापविवर्जितः ॥८६॥ विप्राय वेदविदुषे दद्यादुभयतोमुखीम् । यस्तस्य पुण्यं संख्यातुं न शक्तोऽब्दशतैरपि ॥८७॥ के आवागमन से मुक्त हो जाता है, ऐसा शास्त्रों का निर्णय है । यतः जल दान से मनुष्य को शीघ्र प्यास बुझ जाती है और उसको सन्तोष मिलता है, अतः हे नृपश्रेष्ठ ! ब्रह्मवादियों ने उसको अन्नदान से भी श्रेष्ठ माना है। महापापों अथवा उप पातक करने वाला मनुष्य जल का दान करने से अपने पापों से मुक्त हो जाता है, ऐसा ब्रह्माजी ने स्वयं कहा है ॥७२-७४॥ शरीर को अन्न से उत्पन्न (बना हुआ) कहा जाता है और प्राणों की उत्पत्ति अन्न से ही बताई गई है। इसलिये, पृथ्वोपते ! अन्नदाता को प्राणदाता समझना चाहिए। भूपाल ! जिन-जिन दानों से मनुष्य की तृप्ति होती है वह दान सब मनोरथों को सिद्ध करने वाला माना जाता है। अतएव अन्नदान के समान इस भूतले पर कोई दान नहीं है ॥७५-७६॥ नृपोत्तम ! अन्नदान करने वाले के कुल में हजार पीढ़ी तक जो उत्पन्न होते हैं, वे भी नरक नहीं देखते हैं । इसलिए अन्नदाता इस संसार में श्रेष्ठ माना गया है । जो मनुष्य भक्ति पूर्वक अतिथि का पैर धोता है, वह मानों गंगा सहित सब तीर्थों में स्नान कर चुका । महाराज ! जो व्यक्ति ब्राह्मणों के शरीर में तेल लगाता है, वह तत्काल गंगा में एक सौ आठ बार स्नान का फल पा लेता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं । जो रोगी ब्राह्मण को प्रेम पूर्वक सेवा-शुश्रूषा द्वारा रक्षा करता है, वह युगों तक करोड़ों कुलों के साथ ब्रह्मलोक में निवास करता है ॥७७-८०॥ पृथ्वीपाल ! जो मनुष्य दरिद्र अथवा रोगी की रक्षा करता है उसके ऊपर विष्णु प्रसन्न होकर उसके सब मनोरथों को पूर्ण कर देते हैं । जो मन, वचन और कर्म से किसी रोगी की रक्षा करता है वह अपने सब पापों से मुक्त होकर सब मनोरथों को प्राप्त करता है । महीपाल ! जो ब्राह्मण को रहने के लिए घर देता है, विष्णु उसके ऊपर प्रसन्न होकर अपना लोक उसको दे देते हैं । जो वेदज्ञ ब्राह्मण को दुधार गौ देता है वह ब्रह्मलोक को जाता है, जो दूसरों के लिए दुर्लभ है । पण्डित ! जो दूसरे से दान लेकर भी दुधार गौ का दान करता है, उसके पुण्य का वर्णन करने में मैं समर्थ नहीं हूँ ॥८१-८५॥ जो वेद-विद् ब्राह्मण को कपिला गाय देता है, भूपाल ! वही रुद्र है और वही पाप मुक्त धार्मिक पुरुष है । जो मनुष्य द्विमुखी गौ (जो बच्चा जन रही हो) किसी ब्राह्मण को देता है और उससे उसको जो पुण्य मिलता