भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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त्रयोदशोऽध्यायः ८७

तस्य पुण्यफलं राजञ्छृणु वक्ष्यामि तत्त्वतः । एकतः क्रतवः सर्वे समग्रवरदक्षिणाः ॥८८॥ एकतो भयभीतस्य प्राणिनः प्राणरक्षणम् । संरक्षति महीपाल यो विप्रं भयविह्वलम् ॥८९॥ स स्नातः सर्वतीर्थेषु सर्वयज्ञेषु दीक्षितः । वस्त्रदो रुद्रभवनं कन्यादो ब्रह्मणः पदम् ॥९०॥ हेमदो विष्णुभवनं प्रयाति स्वकुलान्वितः । यस्तु कन्यामलंकृत्य दद्यादध्यात्मवेदिने ॥९१॥ शतवंशसमायुक्तः स व्रजेद्ब्रह्मणः पदम् । कात्तिक्यां पौर्णमास्यां वा आषाढ्यां वापि भूपते ॥९२॥ वृषभं शिवतुष्ट्यर्थमुत्सृजेत्तत्फलं शृणु । सप्तजन्मार्जितैः पापैर्विमुक्तो रुद्ररूपभाक् ॥९३॥ कुलसप्ततिसंयुक्तो रुद्रेण सह मोदते । शिवलिङ्गाङ्कितं कृत्वा महिषं यः समुत्सृजेत् ॥९४॥ न तस्य यातनालोको भवेन्नृपतिसत्तम । ताम्बूलदानं यः कुर्याच्छक्तितो नृपसत्तम ॥९५॥ तस्य विष्णुः प्रसन्नात्मा दद्यादायुर्यशः श्रियम् । क्षीरोदो घृतदश्चैव मधुदो दधिदस्तथा ॥९६॥ दिव्याब्दयुतपर्यन्तं स्वर्गलोके महीयते । प्रयाति ब्रह्मसदनमिक्षुदाता नृपोत्तम ॥९७॥ गन्धदः पुण्यफलदः प्रयाति ब्रह्मणः पदम् । गुडेक्षुरसदश्चैव प्रयाति चोत्तमोत्तमम् ॥९८॥ घटानां जलदो याति सूर्यलोकमनुत्तमम् । विद्यादानेन सायुज्यं माधवस्य व्रजेन्नरः ॥९९॥ विद्यादानं महीदानं गोदानं चोत्तमोत्तमम् । नरकादुद्धरन्त्येव जपवाहनदोहनात् ॥१००॥ सर्वेषामपि दानानां विद्यादानं विशिष्यते । विद्यादानेन सायुज्यं विष्णोर्याति नृपोत्तम ॥१०१॥ नरस्त्विन्धनदानेन मुच्यते ह्युपपातकैः । शालग्रामशिलादानं महादानं प्रकीर्तितम् ॥१०२॥

है, उसकी गणना मैं सो वर्षों में भी नहीं कर सकता हूँ। राजन् ! उसके पुण्य फल को संक्षेप में कह रहा हूँ सुनो- एक ओर अत्यन्त विपुल दक्षिणा वाले यज्ञों का फल और दूसरी ओर भयभीत प्राणियों की प्राण रक्षा करने का फल, दोनों कदाचित् ही तुलना प्राप्त कर सकें। महीपाल ! जो भयाकुल विप्र की रक्षा करता है वह सब तीर्थों में स्नान करने का और सब यज्ञों में दीक्षित होने का फल पा जाता है। वस्त्र दान देने वाला, रुद्रलोक को और कन्यादान करने वाला ब्रह्मलोक को जाता है ॥८६-६०॥ सुवर्ण दान करने वाला अपने कुल के सहित विष्णुलोक को चला जाता है। जो कन्या को अलङ्कारों से भूषित करके अध्यात्मज्ञानी ब्राह्मण को अर्पित कर देता है, वह अपने सौ कुलों के सहित ब्रह्मलोक को चला जाता है। भूपते ! जो कार्तिक पूर्णिमा और आषाढ़ी पूर्णिमा को शिव की प्रसन्नता के लिए साँड़ को छोड़ता है, उसके फल को सुनो-वह अपने सात जन्मों के पापों से मुक्त हो कर रुद्र रूप हो जाता है और सत्तर कुलों के सहित रुद्रलोक में रुद्र के साथ आनन्द प्राप्त करता है ॥६१-६३॥ नृपतिवर ! जो शिव लिंग का चिह्न भैंसे के शरीर पर बनाकर उसको छोड़ देता है उसको किसी लोक में (नरक में) यातना नहीं दी जाती । नृपश्रेष्ठ ! जो शक्ति के अनुसार ताम्बूल दान करता है, उसके ऊपर विष्णु प्रसन्न होकर उसको दीर्घायु, यश और सम्पत्ति प्रदान करते हैं। दूध दान करने वाला घी, मधु और दही का दान करने वाला व्यक्ति सहस्र दिव्य वर्षों तक स्वर्ग लोक में पूजित होता है । नृपोत्तम ! गन्ना दान करने वाला ब्रह्मलोक को जाता है, गन्ध और पवित्र फलों का दान करने वाला ब्रह्मपद को प्राप्त करता है। गुड़, गन्ना और रस का दान करने वाला उत्तमोत्तम लोक को प्राप्त करता है ॥६४-६८॥ घड़ों का जल दान करने वाला उस परमोत्तम सूर्यलोक को जाता है जहाँ वीर रणभूमि में मर कर जाते हैं। नर विद्या दान से माधव का सायुज्य प्राप्त करता है। विद्या दान, भूदान और गोदान परमोत्तम दान हैं। जप, वाहन तथा दोहन दान से नरक से उद्धार होता ही है । सब दानों में विद्यादान उत्तम दान है। नृपोत्तम ! विद्या दान से मनुष्य विष्णु का सायुज्य प्राप्त करता है। मनुष्य इन्धन (लकड़ी) दान से सब उपपातकों से छूट जाता है। शालिग्राम शिला (वह पत्थर जिससे विष्णु की मूर्ति बनती है)दान महादान कहा गया है। उस दान को देकर मनुष्य मोक्ष प्राप्त करता है। इसी प्रकार शिव लिङ्ग

१२-नार०